उड़ी हमले के बाद भारत को शांत रहना चाहिए?

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले के दौरान मारे गए सैनिकों के ताबूत पर फूल चढ़ातीं मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती.

भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी में सेना के शिविर पर रविवार को हुए हमले के बाद क्या भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई है? रविवार को हुए इस हमले में 18 सैनिक मारे गए थे.

भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान के एक गुट को ज़िम्मेदार ठहराया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाने की नीति की वकालत कर 2014 में हुआ आम चुनाव जीता था. उन्होंने उन लोगों को सज़ा देने की क़समें खाई हैं, जो इस "घिनौने हमले" के पीछे थे.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने कहा है कि भारत के "तथाकथित रणनीतिक संयम रखने के दिन लद गए." सेना के पूर्व अफ़सरों ने सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि भारत को पलटवार करना चाहिए.

रक्षा मामलों के विश्लेषक राहुल बेदी के मुताबिक़, ''सेना इस हालिया हमले के जवाब देने के लिए आतुर है. इससे परमाणु हथियारों से लैस दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ जाएगा.''

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले के दौरान मारे गए सैनिक का शव ले जाते सैनिक.

पर अहम और ज़्यादा गंभीर मुद्दा यह सोचना है कि क्या भारत के पास यह क्षमता है कि वह पाकिस्तान के अंदर पहले से तय ठिकानों पर हमला कर दे या उसकी ज़मीन पर सीमित युद्ध छेड़ दे?

अधिकतर विशेषज्ञों के मुताबिक़, ऐसा नहीं लगता है कि भारत में एक के बाद एक आई सरकारों ने यह क्षमता विकसित की है.

मीडिया में इस पर बहस छिड़ी हुई है कि भारतीय वायु सेना को पाकिस्तान स्थित ठिकानों पर क्यों अचूक और सटीक हमले करने चााहिए. पर ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना आसान नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान के पास हवाई सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम हैं. इस पर भी संदेह जताया जा रहा है कि क्या भारत ने ग़ैर पारंपरिक शक्ति संतुलन की क्षमता विकसित की है.

रक्षा विश्लेषक अजय शुक्ला के मुताबिक़, ''मोदी सरकार के साथ समस्या यह है कि इसने "पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पुरज़ोर तरीक़े से बात तो कही है, पर उसे ज़ोरदार तरीक़े से जवाब देने के लिए सैनिक ताक़त हासिल करने की दिशा में पिछली सरकार से ज़्यादा कुछ नहीं किया है."

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले के दौरान तैनात सैनिक.

अब यह सरकार धमकी देने के अपने जाल में ख़ुद फंस गई है. शुक्ला कहते हैं, "बढ़ा चढ़ा कर बात कहने के अपने ही जाल में फंसने का ख़तरा यह है कि आप ज़ोरदार जवाब देने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं. उसके बाद बढ़े हुए तनाव को संभालने की तैयारी आपकी नहीं होती है."

तो क्या भारत को "रणनीतिक संयम" बरतने के पारंपरिक राह पर ही चलना होगा? इस पर बहस छिड़ी हुई है कि यह नीति कारगर है या नहीं. इसका कोई आसान जवाब नहीं है.

दिल्ली स्थित थिक टैंक 'सेटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च' के भानु प्रताप मेहता का मानना है कि रणनीतिक संयम की नीति से भारत को फ़ायदा हुआ है. उनका यह भी मानना है कि कश्मीर पर हुए हालिए हमले से पाकिस्तान कठघरे में होगा और अगले हफ़्ते होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में कश्मीर पर इसके बनाए गए दबाव की हवा निकल जाएगी.

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले के दौरान तैनात सैनिक.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "दरअसल सार्वजनिक बहस के ज़रिए हमने अपने आप को एक कोने में धकेल दिया है, जहां कुछ ग़ैर ज़िम्मेदाराना काम कर गुज़रने का हल्ला मचा हुआ है, वर्ना हम तो लंबी लड़ाई जीत रहे हैं."

रक्षा विशेषज्ञ और 'फ़ेथ दू द एंड' किताब की लेखिका सी क्रिस्टीन फ़ेयर जैसे लोग इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वे कहती हैं, "यदि इसका उद्येश्य भारत में आतंकवादी गतिविधियां चलाने से पाकिस्तान को रोकना है, तो यह मक़सद पूरा नहीं हुआ है. क्या रणनीतिक जवाब की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत का पक्ष लेने के लिए पहले से अधिक मजबूर है? ऐसा नहीं है."

दूसरों का मानना है कि रणनीतिक संयम तो भारत के बेहद ठंडे तर्क का मुखौटा भर है.

तर्क यह है कि भारत की आाबादी एक अरब से ज़्यादा है. इसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना है. यह देश अपने कुछ सैनिकों की मौत को झेल सकता है और इस पर कोई राजनीतिक बवंडर नहीं खड़ा होगा.

एक विशेषज्ञ ने कहा, "भारत आर्थिक रूप से बढ़ रहा है, पाकिस्तान नहीं. इसलिए बग़ैर युद्धा का ख़तरा उठाए हम अपने सौ- दो सौ सैनिकों को क़ुर्बान कर सकते हैं. रणनीतिक संयम के पीछे की सोच यही है, हालांकि कोई यह कहता नहीं है."

तो भारत के पास वास्तविक विकल्प क्या बचा हुआ है?

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले के विरोध में अमृतसर में प्रदर्शन करते लोग.

भौगोलिक रणनीतिकार और लेखक ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि भारत "कमज़ोर रवैया अपनाने और खुले तौर पर लड़ाई छेड़ देने के बीच चुनाव नहीं कर सकता."

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह एक झूठा और अनैतिक विकल्प है, जो पारंपरिक और परमाणु शक्ति संतुलन रखने की भारत की साख की अनदेखी करता है. यह दुश्मन को आक्रामक रवैया बनाए रखने के लिए उत्साहित भी करता है. यह तर्क भी झूठा है कि भारत के पास इसका कोई विकल्प नहीं है कि वह अपनी ही सरज़मीं पर पाकिस्तान को ग़ैर पारंपरिक युद्ध चलाते रहने दे."

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत को पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक संबंध कम कर देना चाहिए. उसे पाकिस्तान को "सबसे ज़्यादा फ़ायदा पंहुचाने वाले" चीन, अमरीका और सऊदी अरब पर दबाव डालना चाहिए. वे यह भी कहते हैं कि भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाने और उसे आतंक को बढ़ावा देने वाला देश घोषित घोषित करवाने के लिए लॉबिंग करे.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को "बग़ैर सोचे समझे दोस्ती और दुश्मनी" नहीं करनी चाहिए.

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देती महिला.

इन लोगों का इशारा उस ओर है जब मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के जन्मदिन पर उनसे मिलने उनके घर चले गए और उसके तुरंत बाद पठानकोट पर हमले के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तल्ख़ी भी आ गई.

लगभग सभी विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत यह लगातार बताता रहे कि वह सीमा पार आतंकवाद का शिकार है.

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Image caption भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के उड़ी में भारतीय सेना का वह कैंप जिसपर रविवार को चरमपंथी हमला हुआ था.

फ़ेयर का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में बलोचिस्तान का मुद्दा उठाने से भारत को कोई फ़ायदा नहीं होगा क्योंकि इससे लगेगा कि भारत क्षेत्र के आपसी झगड़े में लगा हुआ है. वो कहती हैं, "भारत को अपना ध्यान कश्मीर पर केंद्रित करना चाहिए, बलोचिस्तान पर नहीं."

दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ स्टीफ़न कोहन का मानना है कि भारत-पाकिस्तान का कलह दुनिया के उन विवादों में एक है, जिनका निपटारा नहीं हो सकता है. हो सकता है कि कभी ख़त्म ही न हो. उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह ऐसा विवाद है जो पाकिस्तान जीत नहीं सकता और भारत हार नहीं सकता."

ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि ठंढे दिमाग़ से सोची-समझी नीति के तहत की गई कार्रवाई का विकल्प धमकाना और बढ़ा चढ़ा कर बात कहना नहीं है. इससे भारत की साख को नुक़सान ही पंहुचेगा.

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