सुर्खियों से यूं रिश्ता बना रहा जस्टिस टी. एस. ठाकुर का

इमेज कॉपीरइट PTI

जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर ने साल 2015 के दिसंबर माह में भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी जिसके बाद से ही वो लगातार चर्चा में बने रहे हैं.

चाहे वो अपने फैसलों की वजह से हों या फिर न्यायालयों में जजों की कमी की वजह से मामले लंबित रहने के सवाल पर उनकी सरकार से तकरार हो, मुख्य न्यायाधीश ठाकुर सुर्ख़ियों में बने रहे.

हाल ही में नोटबंदी को लेकर दायर की गयी याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत में हो रही चीख पुकार को लेकर वकीलों की आलोचना करते हुए कहा कि वो 'कोर्ट रूम' को 'मछली बाज़ार' नहीं बनने देंगे.

जस्टिस ठाकुर ने अपने कार्यकाल के दौरान कई और अहम फैसले दिए जिनको लेकर काफी चर्चा हुई. मसलन जैन त्योहारों पर मांस के प्रतिबन्ध को लेकर की गयी उनकी टिप्पणी भी सुर्खियां बनी.

हिंदुत्व पर 1995 का फ़ैसला बरक़रार - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की सहारा प्रमुख की परोल

'पीएम के जजों पर न बोलने से निराश हूँ'

इमेज कॉपीरइट AFP

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस ठाकुर ने कहा कि इस तरह के प्रतिबंधों को ज़बरदस्ती किसी के गले के नीचे नहीं उतारा जा सकता. सुनवाई के दौरान उन्होंने कबीर की पंक्तियां भी दोहराईं.

उसी तरह बहु-पत्नी विवाह से सम्बंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस ठाकुर और जस्टिस ए के गोयल की खंडपीठ ने कहा कि यह प्रथा किसी भी धर्म का हिस्सा नहीं है.

फैसले में कहा गया कि मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है. मगर इस्लाम में भी बहु-पत्नी रखना धर्म का हिस्सा नहीं है और सरकार अगर चाहे तो इसपर क़ानून बना सकती है.

'ऐसे में नए कोहली और नए धोनी कैसे निकलेंगे'

कहां हैं 300 करोड़ कैश, तीन कुंतल सोना?

सुप्रीम कोर्ट के 'रखैल' कहने पर आपत्ति

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद दरगाह में मज़ार तक पहुंचकर महिलाओं ने की ज़ियारत

भारत में क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था यानी 'बीसीसीआई' के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ठाकुर ने कहा कि संस्था के किसी भी पदाधिकारी को क्रिकेट में किसी भी तरह का व्यावसायिक लाभ नहीं लेना चाहिए.

इस फैसले के बाद 'बीसीसीआई' के अध्यक्ष नारायणस्वामी श्रीनिवासन को अपना पद छोड़ना पड़ा.

इसी साल फरवरी माह में जस्टिस ठाकुर और आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ के फैसले ने सबको अचंभे में डाल दिया.

खंडपीठ ने कहा कि अपराध से जुड़े मामलों में अगर अभियुक्त घटना के पीड़ित को मुआवज़ा देने में अक्षम हो तो फिर राज्य सरकार को यह मुआवज़ा देना चाहिए.

इससे पहले जस्टिस ठाकुर की खण्डपीठ ने आदेश पारित किया था कि कोई भी दागी व्यक्ति की भर्ती पुलिस फ़ोर्स में नहीं होगी चाहे उसे अदालत से बरी ही क्यों ना कर दिया गया हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे