किराने की दुकान से इसरो तक का सफ़र

  • 16 फरवरी 2017
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दोनों की परिस्थितियां अलग-अलग रहीं. मगर दोनों ने वो काम किया है, जिसपर उनका राज्य छत्तीसगढ़ और पूरा भारत गर्व कर रहा है.

एक किराने की दुकान चलाया करता था तो दूसरा अपने पिता की हत्या के सदमे से उबर रहा था.

बात हो रही है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी 'इसरो' के उन दो युवा वैज्ञानिकों की जो एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने के प्रोजेक्ट का हिस्सा थे.

इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाइट्स को लाँच करके एक नया इतिहास रचा है.

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इसके पहले इतने उपग्रह एक बार में कहीं कभी नहीं छोड़े गए थे.

इस अभियान में भेजे गए 104 उपग्रहों में से तीन भारत के हैं, बाक़ी 101 सैटेलाइट्स इसराइल, कज़ाख़्स्तान, नीदरलैंड, स्विटज़रलैंड और अमरीका के हैं.

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एक हैं अमन वहीद ख़ान और दूसरे हैं विकास अग्रवाल.

अमन वहीद ख़ान के पिता छत्तीसगढ़ पुलिस में सब-इन्स्पेक्टर थे और वर्ष 2009 में राज्य के बस्तर इलाक़े में माओवादी छापामारों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए थे.

यह वो वक़्त था, जब अमन बारहवीं की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे.

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विकास अग्रवाल के पिता चाहते थे कि वे आगे की पढ़ाई ना कर छत्तीसगढ़ के कोरबा में पारिवारिक किराने की दुकान संभालें.

यही वजह थी कि विकास आईआईटी की प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए. पिछले साल फ़रवरी की 16 तारीख थी जब विकास ने इसरो की परीक्षा पास की. जो सपना उन्होंने बचपन से देखा था, वो अब पूरा होने जा रहा था.

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अमन इसरो में मौसम वैज्ञानिक हैं. उपग्रह लांच में उनकी वैसी ही भूमिका थी जैसी विकास अग्रवाल. विकास रॉकेट के उस पुर्ज़े की देख रेख कर रहे थे जिसे 'हीट शील्ड' कहा जाता है.

अमन के माँ हिना यासमीन ख़ान को अनुकंपा के आधार पर लोक अभियोजक की नौकरी मिली है.

बीबीसी से बात करते हुए हिना यासमीन उन पलों को याद करती हैं जब उनके दोनों बेटे - अमन और यासिर अपने कैरियर के अहम् मोड़ पर खड़े थे और उनके सामने पिता का शव रखा हुआ था.

वे कहती हैं : "मेरे पति की अपने एसपी से अनबन हो गई थी. तब उन्होंने पूछा कि क्या करना पड़ेगा कि मेरे बच्चों को देखकर एसपी खड़े हो जाएं और उनसे हाथ मिलाएं. किसी ने कहा कि बच्चों को आईआईटी में पढ़ाओ. बस फिर क्या था. उन्होंने हमें हैदराबाद भेज दिया जहां मेरे बच्चे आईआईटी की परिक्षा की तैयारी करने लगे".

उन्होंने कहा, "ह्त्या से कुछ दिनों पहले ही वे हमसे मिलने आए थे. उन्होंने कहा था कि उन्हें अपनी ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं क्योंकि वो बस्तर में बारूद के ढेर पर काम कर रहे हैं. वे बार बार कहते रहे कि बच्चों को खूब पढ़ाना...."

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हिना कहती हैं कि आईआईटी से निकलने के बाद अमन को कई कंपनियों से नौकरी के ऑफर आए.

"मगर अमन का कहना था कि वे अपने काम से किसी कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने की बजाए देश को फ़ायदा पहुंचाना चाहते हैं. इसलिए इसरो का इम्तेहान दिया और चुन लिए गए."

अमन और उनके भाई यासिर, दोनों ने आईआईटी से अपनी पढ़ाई की. यासिर ने यूपीएससी की मुख्य परीक्षा पास कर ली है.

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किराने की दुकान चलाने वाला विकास

विकास की कहानी कुछ अलग है क्योंकि वो एक ऐसे परिवार में पैदा हुए जहाँ व्यवसाय ही सबसे बड़ा माना जाता रहा है.

उनके घर में ही उनकी पढ़ाई का विरोध होता रहा. यही कारण है कि उन्हें अपने पिता की किराने की दुकान संभालनी पड़ी.

उन्होंने कोरबा के स्थानीय स्कूल से पढ़ाई की फिर स्थानीय कालेज से बीएससी किया.

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बीबीसी से बात करते हुए विकास ने कहा, "मेरे पापा चाहते थे की मैं बीकॉम करूं. मैंने कोरबा के कालेज से ही इंजीनियरिंग की, मेरा अटेंडेंस हमेशा कम रहता था क्योंकि मुझे दुकान पर बैठना पड़ता था. फिर भी मैंने टॉप किया."

वे आगे जोड़ते हैं, "मैं स्कूल से लेकर कालेज तक लगातार टॉप करता रहा. पापा बीमार भी रहते थे और वो मुझे कहीं बाहर नहीं जाने देना चाहते थे. मगर मेरी मम्मी को हमेशा लगता था कि मुझे आईआईटी जाना चाहिए."

मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद विकास ने इसरो की परिक्षा दी और उनका चयन भी हो गया.

विकास आईआईटी तो नहीं जा पाए, पर उन्होंने अपना सपना अपने क़स्बे में रहकर और अपनी किराने की दुकान चलाते चलाते ही पूरा कर लिया.

आज इसरो की उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ अपने दोनों युवाओं पर नाज़ कर रहा है. अमन और विकास के घर बधाइयों का तांता लगा हुआ है.

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