कहीं पानी की बोतल 20 की, तो कहीं 40 की क्यों?

  • 9 मार्च 2017
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अलग-अलग कीमतों के साथ एक ही तरह के बोतल बंद पानी को बेचने वाली कंपनियों और दुकानदारों पर सरकार ने शिकंजा कसने की पहल की है.

उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम बिलास पासवान ने हाल ही में ट्विटर पर कहा कि एक तरह के बोतल बंद पानी को ज़्यादा दामों पर बेचने वाले खुदरा दुकानदार और उनका उत्पादन करने वाली कंपनियों पर भी क़ानूनी कार्रवाई होगी.

पासवान का कहना है कि ऐसा करना ग़ैर क़ानूनी है क्योंकि मैक्सिमम रिटेल प्राइस' (एमआरपी) यानी अधिकतम मूल्य से ज़्यादा उपभोक्ता से वसूला नहीं जा सकता.

मंत्री के निशाने पर उत्पादन करने वाली कंपनियां भी हैं.

पासवान का कहना है कि उत्पादन करने वाली कंपनियां भी एक ही तरह के बोतलबंद पानी का अधिकतम मूल्य अलग अलग छाप रहीं हैं.

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अमूमन देखा गया है कि उपभोक्ता से एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बड़े-बड़े मॉल और पांच सितारा होटलों में अधिकतम मूल्य से ज़्यादा बोतलबंद पानी की कीमत वसूली जा रही है. जबकि, एमआरपी यानी बोतल में छापे गए अधिकतम मूल्य में सारे कर शामिल हैं.

अब मिसाल के तौर पर किनले की 500 मिली लीटर की बोतल बाहर बाजार में दस रूपए की है.

मगर एयरपोर्ट और बड़े बड़े मॉल में यह 30 रूपए में बेची जाती है. मज़ेदार बात यह है कि इस दस रूपए की बोतल की मॉल और एयरपोर्ट में बोतल पर ही अधिकतम कीमत 30 रूपए लिखी हुई मिलती है.

यानी साफ़ है कि उत्पादनकर्ता भी इस खेल में शामिल हो सकते हैं.

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बोतलबंद पानी के उत्पादनकर्ताओं के संगठन 'फेडरेशन ऑफ़ आल इण्डिया पैकेज्ड वाटर मेनू फैक्चरर्स एसोसिएशन' के नवीन गोयल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इसमें ज़्यादातर खुदरा विक्रेता ही ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्हें इससे ज़्यादा मुनाफ़ा मिलता है.

गोयल कहते हैं कि उत्पादनकर्ता को इससे कोई फायदा नहीं होता है.

उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि कुछ मामलों में पानी की बोतलों पर ज़्यादा कीमत छपी होती है.

मगर वो कहते हैं कि हर उत्पादक ऐसा नहीं करता और यह खुदरा में बेचने वाले होटल, मॉल या दुकानदार अपने स्तर पर ही करते हैं.

केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ बोतलबंद पानी तक सीमित नहीं है.

इसके अलावा बाजार में मिलने वाले सोडा का भी यही हाल है जिन्हें एयरपोर्ट, पाँच सितारा होटलों और मॉल में काफी ऊंचे दामों पर बेचा जाता है.

अब कोक या पेप्सी की बात की जाए तो बाजार में बोतलबंद सोडा एक कीमत पर बिकता है.

वहीं मॉल और एयरपोर्ट या महंगे होटलों में ये बंद बोतल में नहीं बल्कि खुला बिकता है और इसकी कीमत गिलास के हिसाब से ली जाती है.

इसी लिए इस बार उनका विभाग इसपर शिकंजा कस रहा है.

भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग में निदेशक बी एन दीक्षित कहते हैं कि उनके विभाग ने इस सम्बन्ध में राज्यों को चिट्ठी लिखी है और ज़्यादा कीमतों पर पानी बेचने वालों पर शिकंजा कसने को कहा है.

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कन्ज़यूमर गुड्स एक्ट, 2006 के प्रावधानों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एम आर पी का मतलब है कि कोई भी उत्पाद उससे ज़्यादा कीमत पर बेचा नहीं जा सकता है.

एक्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एम आर पी यानी छापे गए अधिकतम मूल्य में सारे प्रकार के कर भी शामिल हैं.

बोतलबंद पानी के व्यवसाय पर नज़र रखने वाले तुषार त्रिवेदी कहते हैं कि ज़्यादा पैसे लेने वाले पांच सितारा होटलों, मॉल और एयरपोर्ट पर दूकान चलाने वालों की हमेशा यह दलील रहती है कि उन्हें इन जगहों पर व्यवसाय करने के लिए ज़्यादा पैसे देने पढ़ते हैं इसलिए वो इसकी भरपाई ज़्यादा पैसे लेकर करते हैं.

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मगर इसके बावजूद तुषार कहते हैं कि ऐसा करना ग़ैर क़ानूनी है.

वो कहते हैं: "एयरपोर्ट और बड़े मॉल में दुकान चलाने वाले कहते हैं कि वो पीने के पानी की बोतल को फ्रिज में ठंडा करने के पैसे लेते हैं. मगर बिना ठंडी बोतल के भी उतने ही पैसे लगते हैं. इसलिए उनकी दलील में कोई दम नहीं है. सीलबंद पानी की बोतल के लेबल पर जो अधिकतम मूल्य लिखा होता है उसका मतलब ही है कि उतनी कीमत सबकुछ मिलाकर. यानी कर भी मिलाकर और ठंडा करने की लागत भी मिलाकर."

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