कांग्रेस को महंगी पड़ी क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी ?

  • 14 मार्च 2017
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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हार के बाद कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मीडिया में बहस छिड़ी हुई है.

कुछ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठा रहे है तो कुछ पार्टी के सलाहकारों पर.

बहस इस पर भी चल रही है क्या क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी कांग्रेस को अब महँगी पड़ने लगी है ?

उत्तर प्रदेश में राज बब्बर का पार्टी अध्यक्ष बनना और शीला दीक्षित द्वारा चुनाव की कमान संभालने को भी क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी के रूप में देखा जा रहा है और इसपर अब बहस भी शुरू हो चुकी है.

कई बड़े नेताओं की अनदेखी पर भी सवाल उठ रहे हैं.

कांग्रेस पर नज़र रखने वाले लोगों का कहना है कि 'आला कमान' का चलन जबसे कांग्रेस में आया, तब से धीरे धीरे क्षेत्रीय नेताओं की पार्टी में अहमियत ख़त्म होनी शुरू हो गयी.

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जानकार मानते हैं कि यह सिलसिला राजीव गांधी से भी पहले से शुरू हो गया था.

उदाहरण स्वरूप वो कहते हैं कि 1982 में जब आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के क़द्दावर नेता टी अंजैय्याह पर राजीव गांधी ने अभद्र टिप्पणी की थी और बाद में अंजैय्याह को पार्टी से भी निकाल दिया गया था.

उसके बाद तेलगु देसम पार्टी ने कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में एक तरह से साफ़ कर दिया और एनटी रामा राव मुख्यमंत्री बन गए.

आज तक आंध्र प्रदेश में तेलगु देसम का प्रभाव बना हुआ है.

यही कुछ ममता बनर्जी के साथ भी हुआ और तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ.

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महाराष्ट्र में भी शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना ली.

मंगलवार को जब राहुल गांधी लोक सभा से बाहर निकले तो वहाँ मौजूद मीडियाकर्मियों ने उनसे क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी पर सवाल पूछा.

उन्होंने कहा कि पंजाब, मणिपुर और गोवा के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा.

उन्होंने कहा :"कौन लड़ रहा था यह चुनाव ? यह बात अलग है कि हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हम हार गए. मगर वो तो क्षेत्रीय नेता ही थे जो इन प्रदेशों में चुनाव लड़ रहे थे और चुनाव करवा रहे थे."

मगर उन्होंने स्वीकार किया कि संगठन के ढांचे में बदलाव करने की आवश्यकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि आज़ादी के बाद कांग्रेस में कुछ ऐसा चलन था कि शायद ही कोई प्रदेश हो जहाँ से तीन या चार क़द्दावर नेता संगठन में ना हों.

किदवई कहते हैं, "पंडित जवाहरलाल नेहरू तक तो यह सिलसिला चलता रहा. मगर जब इंदिरा गांधी ने कमान संभाली तो प्रदेशों से संगठन में आये क़द्दावर नेताओं से उनके मतभेद शुरू हो गए. चाहे वो मध्य प्रदेश के नेता हों या उत्तर प्रदेश के. चूंकि इंदिरा गांधी चुनाव पर चुनाव जीत रही थीं और उनका जलवा वैसा ही था जैसा आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है, एक एक कर क्षेत्रीय नेता हाशिये पर जाते रहे."

किदवई का कहना है कि कांग्रेस ने लगभग हर प्रदेश में यह सुनिश्चित किया कि नेताओं का क़द ज़्यादा ना बढ़े.

उन्होंने मध्यप्रदेश का उदहारण देते हुए कहा कि कभी अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने तो कभी मोतीलाल वोरा और फिर अर्जुन सिंह. वो कहते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही होता रहा.

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वहीं राजनीतिक मामलों की जानकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि कांग्रेस में तो पहले से ही आलाकमान का 'कल्चर' आ गया था और कुछ उसी दिशा में अब भारतीय जनता पार्टी भी चल रही है.

चौधरी कहती हैं, "इस बार पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव के दौरान भी यही देखने को मिला कि जिन राज्यों में कांग्रेस के पुराने क़द्दावर नेता हैं जैसे कैप्टेन अमरिंदर और ईबीबो सिंह, वहां कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा. कांग्रेस को अगर अपनी शाख और संगठन को बचाना है तो उन्हें अपने क्षेत्रीय नेताओं को ज़्यादा स्वायत्ता देनी होगी."

कांग्रेस के प्रवक्ता मीम अफ़ज़ल नहीं मानते कि कांग्रेस में क्षेत्रीय या पुराने नेताओं की किसी तरह भी अनदेखी की जा रही है.

पूछे जाने पर वो कहते हैं : " यह बिलकुल बेबुनियाद आरोप हैं क्योंकि सभी क्षेत्रीय नेताओं और पुराने नेताओं की वही पैठ है जैसी हुआ करती है."

राहुल गांधी और मीम अफ़ज़ल अपने बचाव में चाहे पंजाब, मणिपुर और गोवा का उद्धरण दे रहे हों.

मगर, यह भी चर्चा है कि पंजाब में विधानसभा के चुनावों से पहले कांग्रेस कैप्टन अमरिंदर को दरकिनार करना चाहती थी.

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