'बस इतनी तमन्ना है, कि बेटा कभी पूछे- मां तू कैसी है?'

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बुज़ुर्गों की बेबस दुनिया

स्नेहलता की उम्र अब 70 साल के लगभग होने वाली है. उनकी आँखें कमज़ोर हो गईं हैं और शरीर भी. ऐसे में जब उन्हें घर पर ही देखभाल की ज़रूरत है, तो उन्हें ज़ुल्म का शिकार होना पड़ रहा है.

यह ज़ुल्म कोई और नहीं बल्कि वो लोग कर रहे हैं जिनसे उनका खून का रिश्ता है.

रोते हुए बुजुर्ग जोड़े की तस्वीर वायरल

बुज़ुर्गों के लिए बना एक ख़ास वृद्धाश्रम

तंग आकर स्नेहलता ने पास के ही एक वृद्धाश्रम में सहारा लिया है. वो अब अपना वक़्त भजन गाकर या टीवी पर प्रवचन सुनकर बिताती हैं.

Image caption स्नेहलता

उनको यहाँ मौजूद दूसरी वृद्ध महिलाओं का साथ है.

वो कहती हैं, "मुझे अफ़सोस सिर्फ इस बात का है कि मुझपर यह सबकुछ तब आ पड़ा है जब मैं कुछ झेलने के लायक ही नहीं बची हूँ. अब मेरी आँखों से दिखता नहीं. दांत टूट गए हैं. शरीर कमज़ोर हो गया है. ऐसे में मुझे घर से निकाल दिया गया. मैं कहाँ जाऊं. बस दिल की एक ही तमन्ना है कि मेरा बेटा किसी दिन मुझसे बोले - मां तू कैसी है ? तूने खाना खाया या नहीं?"

ऐसा इसलिए क्योंकि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद का सबसे ज़्यादा असर इंसानी रिश्तों पर पड़ा है. इन्हीं बदले हुए हालात का दंश झेल रहे हैं बुज़ुर्ग. उन्हें समाज में कई तरह की परेशानियों को झेलना पड़ रहा है.

बड़े शहरों की अगर बात की जाए तो सर्वेक्षण बताता है कि बुज़ुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में हैदराबाद सबसे बदनाम है.

Image caption बुज़ुर्गों के साथ बुरे व्यवहार के मामलों में सबसे ज़्यादा सरकारी कर्मचारियों पर आरोप लगे हैं.

दिल्ली में भी हालात बेहतर नहीं हैं. यहां बुज़ुर्गों के साथ बुरे व्यवहार के मामलों में सबसे ज़्यादा सरकारी कर्मचारियों पर आरोप तो लगे हैं.

मगर ज़मीनी हक़ीक़त बताती है कि दुर्व्यवहार के मामलों में उनके परिवार के लोग भी कम दोषी नहीं हैं.

ज़िल्लत की ज़िन्दगी

दिल्ली के बांग्ला साहिब गुरद्वारे के पास स्थित बसेरे में मेरी मुलाक़ात बीना देवी से हुई जिन्हें यहाँ के लोग 'बीना अम्मा' के नाम से पुकारते हैं.

Image caption बीना अम्मा

इनके सभी बेटे अब इस दुनिया में नहीं हैं और ना ही पति. कहने को तो इनके बहुत सारे रिश्तेदार हैं मगर इन्हें घर से निकाल दिया गया.

कुछ दिनों तक तो इन्होंने मेहनत कर अपना गुज़ारा किया. मगर आज उम्र से लाचार हो गयीं हैं. पास के गुरुद्वारे में खाती हैं और बसेरे में रहती हैं. बिना देवी के लिए इंसानी रिश्तों की बात सिर्फ एक मज़ाक भर ही है.

वो कहती हैं, "बच्चों के मरने के बाद मेरे पति को और मुझे मेरे जेठ ने घर से निकाल दिया. उन्होंने हमारी पुश्तैनी संपत्ति पर कब्जा कर लिया. हमें जान का ख़तरा भी हो गया. हम दिल्ली भागकर आ गए. फिर मेरे पति भी नहीं रहे. अब मैं कहाँ जाऊं ?"

स्नेहलता और बीना अम्मा जैसे कई ऐसे बुज़ुर्ग हैं जिन्हें अपनों ने ठुकराया. इनमे से एक हैं जसमती (बदला हुआ नाम) जो दिल्ली के गोकुलपुरी के इलाके की रहने वाली हैं.

जसमती की उम्र भी अब उनपर हावी होने लगी है और उनका शरीर कमज़ोर होता चला जा रहा है.

जसमती ने अपनी पहचान नहीं ज़ाहिर करने का अनुरोध किया क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनके चार बेटे उनपर हाथ ना उठा दें. ज़िल्लत की ज़िन्दगी से तंग आकर जसमती ने भी पास के ही एक वृद्धाश्रम में पनाह ली है.

नहीं चाहती बताना

Image caption संतोष शर्मा

समाजसेवी संतोष शर्मा कहती हैं कि जिन बुजुर्गों से मेरी बात हो रही है वो खुल कर कुछ नहीं बताना चाहते हैं. वो अन्दर अन्दर ही घुट घुटकर जीने पर मजबूर हैं.

उनका कहना था, "इनकी मजबूरी है कि इनके साथ जो हो रहा है वो ना दिखाए बनता है और ना छुपाये. यह बस घुट घुट कर जीने को मजबूर हैं. शिकायत करें भी तो किसकी? इन्हें तो अपनों ने सताया है. वो अपने जिन्होंने इनकी कोख से जन्म लिया है. इसलिए इनकी तकलीफ बहुत ज्यादा है जो शायद कोई दूसरा महसूस ना कर सके."

संतोष शर्मा दिल्ली में ही एक वृद्धाश्रम चलाती हैं और उनका कहना है कि इंसानी रिश्ते जिस दौर से गुज़र रहे हैं वो सबके लिए चिंता की बात है.

संतोष शर्मा कहती हैं, "वो लोग ख़ुशक़िस्मत हैं जिन्हें कहीं किसी का सहारा मिल सका है. मगर जिन लोगों को पता नहीं कि उन्हें 'बस बहुत हो गया' कहने की ज़रूरत है, वो लोग बड़ी तकलीफदेह ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. इनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने ही बच्चों के यहाँ नौकरों की तरह रहने को मजबूर हैं."

हेल्पलाइन

Image caption बुज़ुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में हैदराबाद सबसे ज़्यादा बदनाम है.

हालांकि दिल्ली पुलिस ने बुजुर्गों के लिए एक 'हेल्पलाइन' चला रखी है जिसका नेतृत्व डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस करते हैं. मगर इसका इस्तेमाल सिर्फ मध्यवर्ग के लोग ही कर पाते हैं जो पढ़े लिखे हैं. जो समाज के निचले तबके से सम्बन्ध रखने वाले बुज़ुर्ग हैं. उनकी पहुँच ना तो इंटरनेट तक है और ना ही फोन तक.

दिल्ली पुलिस भी उन्हीं बुज़ुर्गों की मदद कर पाती है जिन्होंने ख़ुद को 'सीनियर सिटीजन सेल' में पंजीकृत कराया हो. ऐसे लोगों में वो लोग ज़्यादा हैं जिनकी औलादें बाहर शहरों में रहती हैं और वो दिल्ली में घर में अकेले रहते हैं. यह सिर्फ उनकी सुरक्षा के दृष्टिकोण से किया गया है.

जहां तक रही बात परिवार के लोगों की ओर से किए जा रहे दुर्व्यवहार की, तो इन बुजुर्गों में अब भी इतनी ग़ैरत है कि वो सबकुछ चुपचाप बर्दाश्त करते हैं. वो सारे ज़ुल्म-ओ-सितम सहने के बावजूद कभी अपनों की शिकायत करने आगे नहीं आते हैं.

दिल्ली पुलिस जो कर रही है वो 'सीनियर सिटिज़न एक्ट' के तहत कर रही है जिसमें अलग से प्रकोष्ठ बनाने का प्रावधान किया गया है.

हांलाकि बुज़ुर्गों की अनदेखी करने वाली औलादों के ख़िलाफ़ इस एक्ट में सज़ा का प्रावधान रखा गया, ज़ुल्म सहने के बावजूद बुज़ुर्ग अपने बच्चों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराना नहीं चाहते.

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Image caption बुज़ुर्ग अपने बच्चों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराना नहीं चाहते

क्या है सीनियर सिटिज़न एक्ट ?

सरकार ने वर्ष 2012 में सीनियर सिटिज़न एक्ट 2007 को नए सिरे से लागू किया जिसके तहत 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को 'सीनियर सिटिज़न' माना है.

इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार औलादों को अपने माँ पिता को आर्थिंक सहायता देनी होगी.

बच्चों के अलावा वो कोई भी व्यक्ति जिसके पास सीनियर सिटिज़न की संपत्ति का संचालन हैं या जिनको वो सम्पत्ति सीनियर सिटिज़न की मृत्यु उपरांत मिलने वाली हैं वो उस सीनियर सिटिज़न की देखभाल के लिए जिम्मेदार होगा .

'पेरेंट' का अर्थ माता और पिता तो हैं ही साथ में सौतेली माँ, पिता और गोद लेने वाली माँ-पिता भी शामिल हैं.

बच्चों को अपने माता-पिता को आर्थिंक सहायता देनी होगी अगर उनके पेरेंट उन से इसकी मांग करते हैं.

इस एक्ट के उल्लंघन या बुज़ुर्गों पर अत्याचार करने वाले बच्चों पर 5000 रूपये जुर्माना के साथ साथ तीन महीने की सज़ा या दोनों का प्रावधान है.

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