भारतीय पेशेवरों पर मंदी का असर

इनफ़ोसिस के कर्मचारी

अमरीका में मंदी की मार आईटी पर ही ज़्यादा पड़ी है

अमरीकी आप्रवासन विभाग का कहना है कि इस साल अभी तक विदेशी पेशेवरों के वीज़ा आवेदनों की संख्या में भारी कमी देखी जा रही है.

विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, मेडिकल और कंप्यूटर जैसे क्षेत्रों के विदेशी पेशेवरों को अमरीका में काम करने के लिए एच1बी नाम का वीज़ा लेना पड़ता है. अप्रैल महीने से अक्तूबर तक हर साल एच1बी वीज़ा के लिए आवेदन स्वीकार किए जाते हैं.

लेकिन पिछले कई सालों में पहली बार इस साल अभी तक का एच1बी वीज़ा का कोटा भरा नहीं है.

मतलब यह कि कुल 65 हज़ार सालाना वीज़ा देने की पेशकश के बावजूद इस साल अभी तक आप्रवासन विभाग के पास करीब 45 हज़ार आवेदन पत्र ही आए हैं.

पिछले कई सालों से इस वीज़ा के लिए भारी मात्रा में आवेदन डाले जाते थे, जिनमें से क़रीब 30 प्रतिशत को ही वीज़ा नसीब होता था.

बदले हालात

वर्षों से हर साल अप्रैल महीने में आवेदन शुरू होने के एक हफ़्ते के भीतर ही कोटा भर जाता था और अमरीका और भारत समेत विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियों में इस वीज़ा के लिए होड़ लगी रहती थी.

लेकिन इस बार हालात बहुत कुछ बदले हुए हैं.

हम लोगों से कहना चाहते हैं कि वह इस वीज़ा के लिए आवेदन भरें. अभी काफ़ी स्थान ख़ाली हैं. पिछले कुछ वर्षों में तो एच1बी वीज़ा का कोटा बड़ी जल्दी भर जाता था, लेकिन इस बार काफ़ी समय बीत जाने के बावजूद अब तक 20 हज़ार से ज़्यादा वीज़ा बचे हुए हैं

शेरोन शाइडहावर

आर्थिक मंदी की मार झेल रही अमरीकी कंपनियों में भारी मात्रा में नौकरियों में छँटनी और विदेशी कर्मचारियों के प्रति नई अमरीकी सरकार के बदले हुए तेवर कंपनियों को काम करने का वीज़ा न लेने पर मजबूर कर रहे हैं.

इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो भारत जैसे देशों से अमरीका जाकर काम करना चाहते हैं लेकिन वीज़ा मौजूद है तो वीज़ा लेने वाली कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं. यह लोग उस समय तक वीज़ा नहीं ले सकते कि जब तक कोई कंपनी उन्हें नौकरी न दे दे.

आप्रवासन विभाग को भी इस साल कोटा न भरने पर हैरत हो रही है.

न्यूयॉर्क में अमरीकी आप्रवासन अधिकारी शेरोन शाईडहावर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम लोगों से कहना चाहते हैं कि वह इस वीज़ा के लिए आवेदन भरें. अभी काफ़ी स्थान खाली हैं. पिछले कुछ वर्षों में तो एच1बी वीज़ा का कोटा बड़ी जल्दी भर जाता था, लेकिन इस बार काफ़ी समय बीत जाने के बावजूद अब तक 20 हज़ार से ज़्यादा वीज़ा बचे हुए हैं."

नया कानून

एच1बी वीज़ा की अवधि तीन साल की होती है जिसे तीन साल और बढ़ाया जा सकता है. इस बीच इस वीज़ा को ग्रीन कार्ड में बदलने के लिए कर्मचारी की कंपनी आवेदन भी भर सकती है.

लेकिन कानूनन कोई भी कंपनी अमरीका में तब तक किसी विदेशी को नौकरी पर नहीं रख सकती जब तक उस नौकरी के लिए कोई अमरीकी न मिले.

सन 2007 में अमरीकी संसद- कांग्रेस ने विदेशों से आकर अमरीका में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को वीज़ा दिए जाने का वार्षिक कोटा कम करके 65 हज़ार कर दिया है. इससे पहले यह संख्या 1 लाख 65 हज़ार थी.

और इनमें से 40 से 45 हज़ार लोग भारतीय होते थे, जिनमें ज़्यादातर आईटी प्रोफ़ेशनल होते थे.

पिछले साल भारत की कंपनियों जैसे टाटा कंसलटेंसी, इंफ़ोसिस, विप्रो आदि को सबसे ज़्यादा वीज़ा दिए गए थे. और यह कंपनियाँ वीज़ा लेकर अधिकतर आईटी क्षेत्र के पेशेवरों को बड़ी-बड़ी अमरीकी कंपनियों जैसे सिटीबैंक, बैंक ऑफ़ अमेरिका, जनरल इलेक्ट्रिक में काम करने के लिए भेज देती थीं.

दिवाला

इन अमरीकी कंपनियों में ज़्यादातर ऐसी कंपनियाँ हैं जिनका इस बीच दिवाला निकल चुका है और अमरीकी सरकार की राहत पर ही उनका काम काज चल रहा है.

अमरीकी कांग्रेस ने आर्थिक पैकेज पास करते समय यह प्रावधान भी शामिल किया था कि जिन कंपनियों को पैकेज मिल रहा है, वे एच1बी वीज़ा के तहत अगले दो साल तक विदेशियों को काम पर नहीं रख पाएँगी.

हाल में अमरीका में बहुत सी छोटी कंपनियों का सरकारी ऑडिट किया गया है जिनमें भारतीय मूल के लोगों की कंपनियाँ भी शामिल हैं. इससे लोगों में डर बैठ गया है और वह बाहर से लोगों को काम पर बुलाने से हिचकिचा रहे हैं

सुनीत दीवान

इसके अलावा जब कोई कंपनी एच1बी वीज़ा लेती है तो उसको हर वीज़ा के लिए क़रीब 10 हज़ार डॉलर ख़र्च करने पड़ते हैं. इसलिए मंदी के इस दौर में छोटी कंपनियाँ इस मामले में हाथ खींचे हुए हैं.

बहुत सी कंपनियाँ भारत जैसे देशों से सूचना प्रौद्योगिक (आईटी) जैसे क्षेत्रों के पेशेवरों को इस वीज़ा पर बुलाकर कम पैसे पर काम कराती हैं जबकि अमरीका में उसी स्तर के कर्मचारी बहुत महँगे मिलते हैं.

इस वीज़ा को लेकर अब अमरीका सरकार इस कानून को भी काफ़ी सख़्ती से लागू कर रही है. जिससे छोटी कंपनियाँ अब भारत जैसे देशों से सस्ते में काम कराने के लिए आईटी और अन्य विशेषज्ञों को नहीं बुला पा रही हैं.

मैनहटन में एक भारतीय मूल की वकील सुनीता दीवान के पास ऐसी बहुत सी कंपनियाँ एच1 बी वीज़ा के लिए आवेदन तैयार करवाने आती हैं. लेकिन अब उनके पास आने वाले मामलों में पचास प्रतिशत की कमी आई है.

मुश्किल

इसकी वजह बताते हुए सुनीता कहती हैं, "हाल में अमरीका में बहुत सी छोटी कंपनियों का सरकारी ऑडिट किया गया है जिनमें भारतीय मूल के लोगों की कंपनियाँ भी शामिल हैं. इससे लोगों में डर बैठ गया है और वह बाहर से लोगों को काम पर बुलाने से हिचकिचा रहे हैं."

इस साल हमारे लिए तो बड़ी आसानी हो गई है. पहले हमें बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ इस वीज़ा के लिए होड़ में रहना पड़ता था. हमें इसलिए समस्या नहीं हो रही है क्योंकि हम तो पीएचडी जैसे लोगों को और शोध करने वाले लोगों को इस वीज़ा पर बुलाते हैं

वेंकटेश शुक्ला

इसके अलावा जो लोग एच1बी वीज़ा लेकर अमरीका में काम कर रहे हैं उन्हें भी अब मुश्किल का सामना करना पड़ है क्योंकि उनके वीज़ा की अवधि बढ़ाई नहीं जा रही है. उन्हें ग्रीन कार्ड हासिल करने में भी बहुत मुश्किल आ रही है या अच्छी नौकरियाँ नहीं मिल रही हैं.

सुनीता कहती हैं कि आर्थिक मंदी के कारण नौकरियाँ खोने के भी बहुत से केस उनके पास आए हैं, इनमें एच1बी वीज़ा पर आए बहुत से लोग भारत वापस चले गए हैं.

आशीष शर्मा एक आईटी इंजीनियर हैं और कुछ अर्से से एच1बी वीज़ा पर अमरीका आकर अच्छी कंपनियों में काम कर रहे हैं. वह कहते हैं कि उनको अमरीका में स्थाई रूप से रहने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने में बड़ी मुश्किलें आ रही हैं.

अपनी हालत पर ठंडी साँस छोड़ते हुए आशीष शर्मा कहते हैं, "भारतीय मूल के पेशेवरों को ग्रीन कार्ड मिलने में कम से कम सात से 10 साल तक लग रहे हैं. हम अनिश्चितता के एक लंबे दौर को झेल रहे हैं. कभी-कभी लगता है कि अमरीका छोड़कर ऐसी जगह चले जाएँ जहाँ आराम से काम मिले और ज़िंदगी आसान हो."

फ़ायदा भी

आर्थिक मंदी का दौर अभी दो साल तक चलने की बात कही जा रही है. जो कंपनियाँ अब भी एच1बी वीज़ा के लिए आवेदन भर रही हैं उनमें कुछ ऐसी भी हैं जो इस मंदी के दौर का फ़ायदा उठा रही हैं. उनको आसानी से वीज़ा मिल रहा है.

भारतीय मूल के वेंकटेश शुक्ला कैलिफ़ोर्निया में सिलिकॉन वैली की एक कंपनी के मालिक हैं जो कंप्यूटर चिप डिज़ाइन जैसे महारत वाले काम करती है. इनकी कंपनी आईटी क्षेत्र के महारत वाले पेशेवरों को एच1बी वीज़ा पर अमरीका बुलाकर शोध का काम कराती है.

वह कहते हैं, “इस साल हमारे लिए तो बड़ी आसानी हो गई है. पहले हमें बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ इस वीज़ा के लिए होड़ में रहना पड़ता था. हमें इसलिए समस्या नहीं हो रही है क्योंकि हम तो पीएचडी जैसे लोगों को और शोध करने वाले लोगों को इस वीज़ा पर बुलाते हैं."

लेकिन ऐसा नहीं है कि वेंकटेश की कंपनी को कोई समस्या नहीं है. उनकी समस्या है कि उनके पेशेवर कर्मचारियों के एच1बी वीज़ा को जल्दी ग्रीन कार्ड में बदला नहीं जाता है और लंबे इंतज़ार के कारण उनके कर्मचारी विचलित होकर वापस जाने पर मजबूर होते हैं.

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