ग्रामीणों से चल रहा है बीपीओ

बैंगलोर से सौ किलोमीटर दूर बागेपल्ली गाँव भारत के किसी भी गाँव से अलग नहीं है. हरे-भरे खेत, लहलहाती फसलें और टूटी-फूटी तंग सड़कें लेकिन बागेपल्ली उन कुछ गिने चुने गाँव में से एक है जहाँ बीपीओ यानी 'बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग' का एक केंद्र है.

ग्रामीण बीपीओ

गाँवों के युवा ग्रैजुएट इस बीपीओ में काम कर रहे हैं

बागेपल्ली भारत के बीपीओ उद्योग की एक नई पेशकश है.

इस बीपीओ केंद्र को चलाती है 'रूरल शोर्स' नाम की कंपनी. इस कंपनी के सीईओ मुरली वेलांगती कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में बीपीओ उम्मीद से ज़्यादा सफल अनुभव है.

बागेपल्ली के इस ग्रामीण बीपीओ की स्थापना एक साल पहले हुई थी और यह कहना ग़लत न होगा कि भारत में ग्रामीण बीपीओ का इतिहास भी इतना ही पुराना है.

इस कंपनी की इमारत के अन्दर 40-50 नौजवान लड़के और लड़कियाँ अपने अपने काम में व्यस्त हैं.

सबके डेस्क पर आधुनिक कंप्यूटर इत्यादि लगे हैं.

वेलांगती बताते है कि ये लोग तीन भारतीय बीमा कंपनियों के दस्तावेज़ों को प्रोसेस कर रहे हैं.

इस बीपीओ के कर्मचारियों के बारे में वे बताते हैं, "ये लोग बागेपल्ली के आस पास के गावों से हैं. इनमें से अधिकतर अपने घरों के अकेले कमाने वाले हैं."

इन लड़के और लड़कियों के टीम लीडर हैं अरुण शेनॉय.

सच यह है कि ये लोग शहर के लोगों से बहुत बेहतर हैं अंतर सिर्फ़ इतना है कि ये लोग सीखने में शहर वालों से थोड़ा समय ज़्यादा लेते हैं

अरुण शेनॉय, टीम लीडर

जब उनसे पूछा कि यहाँ के लड़के और लड़कियाँ शहरों के बीपीओ केन्द्रों के लड़के-लड़कियों से कितने अलग हैं, तो शेनॉय ने कहा, "सच यह है कि ये लोग शहर के लोगों से बहुत बेहतर हैं अंतर सिर्फ़ इतना है कि ये लोग सीखने में शहर वालों से थोड़ा समय ज़्यादा लेते हैं."

उनका कहना है, "ये लोग बहुत प्रतिभावान हैं लेकिन प्रतिभा को निखरने में थोड़ा समय लग जाता है. और यही कारण है कि शुरु में उनका आत्मविश्वास कम होता है."

दरअसल गाँव के इन नौजवानों पर दबाव ज़्यादा होता है. उन्हें पता है कि गाँव में ज़्यादा नौकरियाँ नहीं होतीं इसलिए इन्हें ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

यही कारण है कि इनमें से कई अपने पुश्तैनी व्यवसाय में भी जुटे रहते हैं.

नागराज उनमें से एक हैं. वे सुबह दूध बेचने का धंधा करते हैं और दिन भर इस बीपीओ में काम करते हैं.

गाँव की ओर

ग्रामीण बीपीओ की सफलता को देखते हुए गावों के जो नौजवान शहरों के बीपीओ में काम करते थे वे अब गाँव के बीपीओ में नौकरियाँ करने आ रहे हैं.

सुरेश सिंह पहले बंगलौर शहर के एक बीपीओ में काम करते थे लेकिन अपने गाँव बागेपल्ली में बीपीओ खुलने के बाद वो अब इस केंद्र में नौकरी करते हैं और काफ़ी खुश हैं.

उन्हें शहर की ज़िन्दगी रास नहीं आई. वे कहते हैं, "शहर में बहुत भीड़- भाड़ है. ट्रैफिक के कारण ज़िन्दगी कठिन थी. इसलिए मैं यहाँ वापस आ गया हूँ और मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है."

लेकिन ग्रामीण बीपीओ में अब तक कॉल सेंटर नहीं खुले हैं यानी फ़ोन पर अंग्रेज़ी में सवालों के जवाब देने की सुविधाओं को इन ग्रामीण बीपीओ केन्द्रों में अब तक नहीं शुरू किया गया है.

ग्रामीण बीपीओ में अंग्रेज़ी बोलने वाले लड़के-लड़कियों की बहुत कमीं है. ग्रामीण बीपीओ में इन दिनों केवल ईमेल के ज़रिए पूछे गए सवालों के जवाब देने और दस्तावेज़ों के प्रोसेस करने की सुविधाएँ हैं.

फ़ायदा

लेकिन ग्रामीण बीपीओ से उद्योग को क्या लाभ होगा?

मुरली वेलागंती

मुरली वेलागंती का कहना है कि वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा से निपटने के लिए ग्रामीण बीपीओ एक अच्छा उपाय है

मुरली वेलागंती कहते हैं,"शहरों में बीपीओ केंद्र चलाना महंगा साबित हो रहा है. भारत के बीपीओ उद्योग को चीन और फ़िलिपीन्स से भारी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए भारत को एक नया रास्ता निकलना था और खर्च को कम रखना था. ग्रामीण बीपीओ का जन्म इसी सोच का नतीजा है."

मुरली वेलांगती की कंपनी में देश के एक बड़े बैंक, एचडीएफ़सी ने 26 प्रतिशत की भागीदारी ले ली है.

अब यह कंपनी देश में पांच सौ ग्रामीण बीपीओ खोलने का इरादा रखती है. यह काम अगले पाँच सालों में पूरा हो सकेगा.

मुरली वेलागंती की कंपनी के अलावा फ़िलहाल चार-पाँच और भी छोटी कंपनियां हैं जो ग्रामीण इलाक़ों में बीपीओ केंद्र खोल रही हैं.

मुरली वेलागंती कहते हैं ग्रामीण इलाक़ों में 75 लाख गैजुएट लोग हैं ग्रामीण बीपीओ इनमें से 10 लाख को नौकरी दे सकते हैं.

लगता है कि ग्रामीण बीपीओ का व्यावसायिक ढाँचा 12 अरब डॉलर वाले बीपीओ उद्योग को अब भी अपने निकटम प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे रखने की क्षमता रखता है.

और इस तरह की नई सोच ही भारत के बीपीओ उद्योग की कामयाबी का कारण हैं.

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