मंदी की मार लाइफ़ स्टाइल पर

शॉपिंग माल
Image caption शॉपिंग मालों में 80 प्रतिशत की सेल लगी है लेकिन लोग नहीं हैं.

पिछले एक साल से दुनिया भर को मंदी की मार झेलनी पड़ रही है और भारत भी इसकी चपेट में है. न ही मंदी के बादल छंटते दिखे हैं और न ही निकट भविष्य में इसकी संभावना. इसी मंदी के चलते भारतीयों की जीवन-शैली में भी बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं और लोग अपने खर्चों से एक तरह से जूझ रहे हैं.

पढ़-लिख कर एक इज्ज़तदार नौकरी हासिल करने का सपना होता है तमाम लोगों का. ऐसा ही एक सपना था दिल्ली में रहने वाले संजय वर्मा का भी. सैतींस साल के संजय एक जाने-माने बिज़नेस स्कूल में काम करते हैं और अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य भी हैं. अब तक सब कुछ अच्छा था और बेहतर होता जा रहा था की अचानक आर्थिक मंदी ने इनकी उड़ान पर रोक लगा दी.

संजय कहते हैं, ‘‘हमने प्लान किया था कि हमारी इन्क्रीमेंट होगी, तो मैं एक फार्मूला ले कर चल रहा था और इस फार्मूला के चलते हमें दो बड़े फैसले लिए थे. एक तो दिल्ली में घर होने का ख़्वाब था और मैं उसके लिए अपनी इन्क्रीमेंट को देखते हुए प्लानिंग भी कर रहा था. मैं सोच रहा था की अगली गाड़ी एक लक्ज़री कार तो नहीं, पर हाँ एक मंहगी गाड़ी ज़रूर लूँगा. पर मेरी ज़िन्दगी और करियर के ये दो बड़े प्लान इस मंदी के चलते पूरे न हो सके.’’

Image caption संजय को इस बात का दुख है कि उनकी कई योजनाएं मंदी की वजह से पूरी नहीं हुई.

संजय वर्मा की तरह तमाम ऐसे मध्यम वर्गीय भारतीय हैं जिन्हें अपनी आमदनी और खर्चे के अनुपात को तराजू में तौलना पड़ रहा है. वजह आर्थिक मंदी ही है. पिछले एक दशक से भारत की अर्थव्यवस्था ने बेपनाह तरक्की की और भारतीय मध्यम वर्ग की आमदनी बढ़ी और ज़ाहिर है खर्च भी उसी अनुपात में बढ़े.

पर इस ' हनीमून दौर' के बाद की मार लगभग सभी क्षेत्रों को झेलनी पड़ रही है. चाहे आई टी क्षेत्र हो या फिर बीपीओ जगत, मनोरंजन की दुनिया हो या फिर कारपोरेट जगत.

हर क्षेत्र में लोगों की तन्ख्वाहें कटने लगीं, नौकरियां जाने लगीं और 'आमदनी अट्ठन्नी और खर्चा रुपइया' की नौबत आ गई.

दूसरी और रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों के दाम नहीं घटे और मंदी के इस दौर में ये लोगों के लिए एक करारा झटका था.

गाज़ियाबाद में पांच लोगों एक मध्यम वर्गीय परिवार की गृहणी दीपिका हितकारी कहती हैं, ‘‘सीमित आय में घर चलाना एक बहुत बड़ी चुनौती हो गयी है. एक तो मंदी की मार और दूसरा महँगा होते फल, अनाज और खाने-पीने की चीज़ें. मुझे तो लग रहा है की ये चीज़ें आम-आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं. आप ही सोचिये, घर की आय बढे बिना अगर दाल ही अस्सी-नब्बे रूपये किलो बिकेगी तो क्या होगा. पहले सौ रूपये को नोट मिनटों में खर्च होता था और अब वही हाल पांच सौ के नोट को हो गया है.’’

मंदी के इस दौर में लोगों को एहसास हुआ की खर्च पर लगाम कसने का वक़्त आ गया है. दुनिया भर में तमाम रिपोर्ट और सर्वेक्षण यही कह रहे थे की आर्थिक मंदी की मार जल्द धीमी नहीं पड़ेगी.

इस बात की चेतावनी '2009 स्टेट ऑफ़ दी यूज़र' नाम की रिपोर्ट में भी दी गयी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भी इन निष्कर्षों को महत्त्वपूर्ण बताया.

Image caption दीपिका हितकारी के लिए सीमित आमदनी और बढ़ती मंहगाई में घर चलाना मुश्किल हो रहा है.

मंदी के दौरान भारतीय समाज में उन्नति की रफ़्तार धीमी करने का एहसास कैसे हुआ.

समाज और अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले छवि सुधारक दिलीप चेरियन कहते हैं, ‘‘जिस स्पीड से इस समाज की उम्मीदें बढ़ रही थीं वो इस समाज के प्राकृतिक संसाधन, मानवीय प्रयास और दुनिया में जो भारत का दर्जा है उससे कहीं ज्यादा था. सबको लग रहा था की बहुत जल्दी सभी आसमान पर पहुँच जायेंगे. ये यथार्थवाद अगर अभी नहीं आता हो शायद आगे चल के हमारे सर घूम जाते.’’

नामी-गिरामी ब्रांड्स खरीदने वाले और अच्छी जगहों पर खाने-पीने के शौकीन संजय वर्मा भी कहते हैं की बदले हुए हालातों में उन्हें अपने तौर-तरीके बदलने ही पड़े.

वो कहते हैं, ‘‘ पहले ये होता था की वीकेंड्स के अलावा हम लोग हफ्ते के और दिनों में भी बाहर निकल जाया करते थे. ख़ास तौर पर हमारे बड़े बेटे के लिए इसके बहुत मायने थे. अब हम लोगों की कोशिश होती है की हफ्ते में एक ही दिन बाहर घूमने-फिरने निकलें. पहले ए श्रेणी की जगहों में जाते थे पर अब बी में जाते हैं. पर हाँ इस सब से दुःख तो बहुत होता है.’’

नतीजा यही हुआ है कि जिस गति से लोग खर्च कर रहे थे वो अब नहीं कर रहे और बचत पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. क्रेडिट कार्ड्स के बदले आम आदमी एक बीमा लेने को ज्यादा आतुर दिख रहा है क्योंकि उसे शायद इस बात का यकीन हो गया है की मंदी के दौर में उतार चदाव की मार कभी भी पड़ सकती है.

बदले हुए दौर और कमी-बेशी के दिनों की वापसी पर ही शायर कृष्ण बिहारी ' नूर' का शेर याद आता है.

ज़िन्दगी की तल्खियां अब कौन सी मंजिल में हैं,

इसी से अंदाज़ा लगा लो ज़हर महंगा हो गया!

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