'महिलाएँ भी विकास में शामिल हों'

किरण मजूमदार शॉ- एक ऐसी शख़्सियत जिसने बिज़नेस की दुनियामें अपना अलग मकाम बनाया है. डॉक्टर किरण मजूमदार शॉ बायोकॉन कंपनी की अध्यक्ष औरप्रबंध निदेशक हैं. जब उन्होंने भारत की पहली बायोतकनीक कंपनी शुरू की थी, तो कईलोग एक महिला प्रमुख के नाते उनके साथ काम करने को तैयार नहीं थे. आज वे भारत कीसबसे अमीर महिलाओं में से एक हैं. 2004 में वे भारत की सबसे अमीर महिला घोषित की गईथीं.विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें 2005 में पद्मभूषण दिया गया.

पेश है उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश.

आप बायोकॉन जैसी बड़ी कंपनी की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक हैं. भारत की सबसे सफल महिला उद्यमियों में से एक, भारत की सबसे धनी महिलाओं में से एक...कई सारी उपलब्धियाँ हैं आपके नाम. कैसा लगता है शीर्ष पर पहुँचना, ख़ासकर एक महिला होने के नाते?

ईमानदारी से कहूँ तो बहुत अकेला महसूस करती हूँ. बिज़नेस की दुनिया में मेरे स्तर पर बहुत कम महिलाएँ हैं. मेरे जैसी जो महिलाएँ यहाँ तक पहुँच पाई हैं उनके ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि और महिलाओं को भी आगे आने का प्रोत्साहन मिले.

बायोकॉन की शुरूआत कैसे की आपने?

मैने 1978 में शुरुआत की थी. काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा- मैं सिर्फ़ 25 साल की ही थी, महिला थी, बायोतकनीक के बारे में लोग ज़्यादा जानते नहीं थे. कंपनी के लिए पैसा जुटाना एक बड़ी चुनौती थी.

कई लोगों ने उस समय मुझे गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन समय के साथ जब आप सफल हो जाते हैं, तो इन समस्याओं से उबर जाते हैं.

उस समय, 70-80 के दशक में क्या आपके सहकर्मियों के लिए ये स्वीकार कर पाना मुश्किल था कि उनकी बॉस एक महिला है?

बिल्कुल, शुरूआती दौर में तो बहुत ही कठिन था. उस समय अपनी कंपनी के लिए ऐसे लोग ढूँढना मुश्किल हो गया था जो एक महिला बॉस के साथ काम करना चाहते थे. लेकिन ये भी सच है कि ऐसे कुछ लोग मिल ही जाते हैं जिन्हें आप पर भरोसा होता है.

तब से लेकर अब तक क्या आपने कोई फ़र्क महसूस किया है समाज के रवैये में?

अब आप कहीं भी जाते हैं तो बड़ी संख्या में महिला कर्मचारी वहाँ होती हैं.चाहे बायकॉन हो या फिर बीपीओ सेक्टर की कंपनियाँ या फिर मीडिया और मनोरंजन उद्योग - हर क्षेत्र में महिलाएँ दिख ही जाती हैं. सो ये अच्छी बात है. लेकिन इनमें से ज़्यादातर कंपनी में मध्य स्तर के पदों पर काम करती हैं. मैं चाहती हूँ कि ये महिलाएँ उच्च पदों पर पहुँचे.

समाज में लिंगभेद एक अहम मुद्दा है. हाल ही में अमरीका की एक बड़ी रिटेल कंपनी पर 15 लाख महिला कर्मचारियों ने लिंगभेद का आरोप लगाया था. क्या कहेंगी आप.

ये बड़ी चौंकाने वाली बात है. हांलाकि सब जगह तो ऐसा नहीं है पर अगर आप ग़ौर से देखेंगे तो पता चलता है कई बार पद उन्नति, बोनस जैसी चीज़ों में महिलाओं को पूरा-पूरा फ़ायदा नहीं मिलता.

लिंगभेद तभी ख़त्म हो सकता है जब समाज महिलाओं को हर मायने में भागीदार बनाए. हमेशा भारत में ‘इन्क्लूज़िव विकास’ की बात होती है, ऐसा विकास जिसमें सबकी भागेदारी हो. मैं कहना चाहूँगी कि महिलाओँ को भी ऐसे विकास का हिस्सा बनाना बेहद ज़रूरी है. समान विकास का मतलब सिर्फ़ पिछड़ी जातियों के लिए विकास नहीं है, इसमें महिलाएँ भी शामिल हैं. जब देश आर्थिक प्रगति करेगा और महिलाएँ उसमें अहम भूमिका निभाएँगी तो लिंगभेद ख़त्म होता जाएगा.

भारत में आज भी महिला उद्यमियों की संख्या बेहद कम है. ऐसी क्या वजहें हैं जो उन्हें रोके हुए हैं- प्रतिकूल सरकारी नीतियोँ, समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता?

मैं इसके लिए नीतियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराती.मुझे लगता है कि नीतियाँ महिला उद्यमियों को बढ़ावा ही देती हैं. मेरी नज़र में समाज को अपना रवैया बदलना होगा. समाज का एक तबका आज भी ये स्वीकार नहीं करता है कि महिलाएँ काम करें, वे घर से बाहर जाकर प्रोफ़ेशनल चुनौतियों का सामना करें. यही सबसे बड़ी चुनौती है.

अच्छा एक बात बताइए. जब शुरू-शुरु में आपने अपनी कंपनी की अध्यक्ष के तौर पर विदेशों में जाना शुरू किया, तो एक भारतीय कंपनी की महिला प्रमुख को देखकर विदेशों में कैसी प्रतिक्रिया मिलती थी आपको?

शुरू में लोगों को उत्सुकता होती है, उन्हें हैरानी होती है लेकिन बाद में वे आपको बड़ी गंभीरता से लेते हैं. महिला होने के नाते मुझे विदेशों से ज़्यादा भारत में ज़्यादा मुश्किल हुई.

आपकी सफलता में आपके परिवार की कितना योगदान रहा है?

मुझे जितनी भी सफलता मिली है, उसका श्रेय परिवार से मिले समर्थन को जाता है- पहले मेरे माता-पिता और अब मेरे पति. उन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया कि मैं अपनी प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी को पर्याप्त समय दूँ. इस समर्थन ने मेरी ज़िंदगी में बहुत बड़ा रोल अदा किया है.

यानी हम कह सकते हैं कि एक सफल महिला के पीछे एक पुरुष का हाथ हो सकता है बजाय इसके कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है.

हर सफल पुरुष या महिला की सफलता के पीछे एक दूसरे से मिलने वाले समर्थन का ही हाथ होता है. यही मूलमंत्र है.

काम-काज के अलावा किसी भी महिला को घर की ज़िम्मेदारियाँ भी संभालनी पड़ती हैं. आपका इतना हाई-प्रोफ़ाइल करियर है. आप कैसे अपनी पारिवारिक और काम-काज की ज़िम्मेदारियों को एक साथ संभालती है. क्या ये मुश्किल काम है?

मेरे पति और मैं सभी ज़िम्मेदारियों को बाँटते हैं और समय निकालते हैं. अगर आपके साथ ऐसे लोग हैं जो ज़िम्मेदारियों को बाँट सकते हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं है.

एक महिला से उम्मीद की जाती है कि वो घर के कामकाज में पुरुष से कहीं ज़्यादा काम करे. यही समस्या की जड़ है. किसी भी पति-पत्नी को घर की ज़िम्मेदारियाँ बराबर बाँटनी चाहिए. जब तक महिला से ज़्यादा काम की उम्मीद की जाती रहेगी, ये बहस भी चलती रहेगी कि घर और बाहरी कामकाज में संतुलन कैसे बिठाया जाए. ये सवाल तो पुरुषों से भी पूछा जाना चाहिए. पर कभी नहीं पूछा जाता.

कई युवतियों के लिए आप रोल मॉडल की तरह हैं. ऐसी युवतियाँ जो बिज़नेस के क्षेत्र में या अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ना चाहती हैं, क्या कहना चाहेंगी उनसे आप.

मैं मानती हूँ कि महिलाएँ ज़्यादा मज़बूत होती हैं. हर महिला को खु़द पर भरोसा होना चाहिए. तभी बाक़ी दुनिया भी हमें गंभीरता से लेगी.

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