भारतीय बैंक कैसे बच निकले...

आरबीआई बिल्डिंग
Image caption आरबीआई ने अपने क़ानूनों में मंदी के अनुसार बदलाव किया और मंदी की मार से बचने में बैंकों को मदद की.

दुनिया भर में चर्चित वित्तीय संस्थाओं पर वैश्विक आर्थिक मंदी की मार का ख़ासा बुरा असर पड़ा पर भारतीय बैंकों और ख़ासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर इस मंदी का ज़्यादा असर नज़र नहीं आया.

वर्ष 2008 की शुरुआत में सकल घरेलू उत्पात के लगातार नकारात्मक आंकड़ों ने अमरीकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी. अमरीका में होम लोन न चुका पाने वाले ग्राहकों की संख्या तेज़ी से बढ़ी जिससे लेहमन ब्रदर्स, मेरिल लिंच, बैंक ऑफ़ अमेरिका जैसी कई बडी वित्तीय संस्थाएं तरलता के अभाव में आ गईं.

अमरीकी सरकार के बचाव पैकेज भी इस अभाव को कम नहीं कर सके और देखते ही देखते अमरीका के तीस से भी अधिक बैंकों में ताले लग गए. अमरीका की स्थिति का असर दुनिया भर पर पड़ा और अनेक देशों की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में आने लगी.

लेकिन भारतीय बैंक इस मंदी के चक्र से बेदाग़ निकल गए. नुक़सान उठाना तो दूर की बात है, इस मंदी के दौर में लगभग सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मुनाफ़े भी हुए. आख़िर कैसे संभव हुआ ये सब?

पुराने तरीके कारगर

भारत के एक बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बैंक ऑफ़ बडौदा के कार्यकारी निदेशक आरके बख्शी कहते हैं, "भारतीय रिज़र्व बैंक को इसका श्रेय देना मुनासिब ही होगा क्योंकि उसने वित्तीय नीतियों को कुशलतापूर्वक संभाले रखा. जब मुद्रास्फीति बढ़ी तब रिज़र्व बैंक ने बाज़ार पर अपनी पकड़ मज़बूत कर दी और बयाज की दरें बढाईं. लेकिन लेहमन ब्रदर्स के गिरने के बाद उसने ब्याज दरें घटा दीं ताकि बाज़ार में पैसे का अभाव न हो. दूसरा उसने बाज़ार में पैसे के भुगतान के मामले में बैंकों के बीच के लेनदेन को कम नहीं होने दिया जिससे भुगतान की दिक्कत नहीं हुई."

भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद से ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने खुद को पुराने तौर-तरीकों वाले सांचे में ही ढाल रखा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है सावधानीपूर्वक ऋण देने के तौर तरीके. तमाम आलोचनाओं के बाद भी यह एक अहम वजह रही जिससे भारतीय बैंक वैश्विक मंदी की मार से बच गए.

Image caption भारतीय बाज़ारों में पैसे की कमी आई लेकिन आरबीआई ने ब्याज़ दरें कम कर के पैसे कम नहीं होने दिए.

सार्वजनिक क्षेत्र वाले बैंकों के अलावा भारत के निजी बैंकों पर भी वित्तीय संकट का साया नहीं पड़ सका.

निजी बैंकिंग क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ रहे यैस बैंक के संसथापक-अध्यक्ष राना कपूर कहते हैं, "हमारा जो उपभोक्ता है या कारपोरेट कस्टमर है. वो ये देख रहा है की भारत सरकार ने और रिज़र्व बैंक ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को समान दृष्टि से देखा है. मंदी के दौरान तो खासतौर पर यही देखने को मिला कि जनता ने बिना पब्लिक-प्राइवेट में मतभेद किए, भारतीय बैंकिंग पर भरोसा किया. साथ ही निजी बैंकों ने भी हमेशा से ही रिज़र्व बैंक द्वारा बनाई गई नीतियों का पालन किया है."

एक संतुलित और सावधान मुद्रा नीति और रिज़र्व बैंक का नियमानुसार चलना ही भारतीय बैंकों के लिए मंदी के दौर में कारगर साबित हुआ. आरबीआई के अनुसार भारतीय बैंक एक सीमा से अधिक असुरक्षित क़र्ज़ नहीं दे सकते और भारतीय बैंक एक सीमित राशि का ही शेयर बाज़ार में निवेश कर सकते हैं.

सतर्कतापूर्ण नीति

महत्त्वपूर्ण बात ये भी रही कि भारतीय बैंकों द्वारा विदेशी कोष का उपयोग करने की भी एक सीमा है. इससे ये सुनिश्चित होता है कि वित्तीय संकट की स्थिति में अगर विदेशी कंपनियाँ अपने पैसे वापस ले भी लें तब भी बैंक इससे प्रभावित नहीं होंगे.

आरके बख्शी कहते हैं,"बैंकों के एनपीए (नन पर्फ़ार्मिंग एसेट्स) बढ़ने के बजाए घटे ही हैं और जिन भारतीय बैंकों के विदेशी ऑपरेशन्स भी हैं, उन्होंने भी आरबीआई नियमों का पालन करते हुए सतर्कतापूर्वक ही कदम बढा़ए हैं."

साल भर पहले तक तमाम जानकार यही कह रहे थे कि भारतीय बैंकों के निजीकरण का समय आ चुका है और ख़ासतौर पर सरकारी बैंको में विदेशी निवेश होना चाहिए. अमरीका और यूरोप के बड़े बैंकों का हाल देखने के बाद इन सुझावों पर विराम लग गए हैं.

आर्थिक मामलों के जानकार परंजोय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में सब निजीकरण की बात कर रहे थे और भारतीय बाज़ार में विदेशी बैंकों को लाना चाह रहे थे. पर अब ये सब बंद हो चुका है. इसका एक सामाजिक कारण भी है. हमारे देश में लोग कहते हैं कि दादी माँ कहा करती थीं, जितनी आय हो उतना ही ख़र्च करो. अमरीका में इसके विपरीत हुआ पर भारत में लगता है दादी माँ की बात मानी गई."

वित्तीय क्षेत्र से जुड़े तमाम जानकार भारतीय रिज़र्व बैंक की एक सतर्क मुद्रा नीति को भारतीय बैंकों के मंदी का शिकार न होने का श्रेय देते हैं. साथ ही भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को भी इस बात का पूरा एहसास है कि पहले सख़्त कही जाने वाली रिज़र्व बैंक की नीतियों के चलते ही भारतीय वित्तीय क्षेत्र का संतुलन फिलहाल बरक़रार है.

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