क्या बदल रहा है आवासीय बाज़ार..?

इन्हीं में से एक 36 वर्षीय शैलेन्द्र सिंह भारत की राजधानी दिल्ली में 18 साल से रह रहे हैं, और एक जानी मानी आईटी कंपनी के बड़े अफसर हैं.

दिल्ली में एक घर खरीदने का सपना शैलेन्द्र ने भी देखा था. वो बताते हैं, "दिल्ली में घर ढूँढ़ते हुए डेढ़ साल से ऊपर हो गए हमें. शुरू शुरू में जब बिल्डर या सोसाइटियाँ नए घरों की घोषणा करती थीं उन्हें देखने जाया करते थे, पर हमेशा यही लगा कि वो सभी हमारी पहुँच से बाहर हैं."

शैलेन्द्र सिंह की एक घर की तलाश अभी भी जारी है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि पिछले एक दशक से भारतीय आवास क्षेत्र में ज़मीन-आसमान का परिवर्तन आया है.

करीब डेढ़ साल पहले तो पूरे भारत में चाहे वो मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे मेट्रो हों, या फिर लखनऊ, भोपाल और जयपुर जैसे तमाम बी श्रेणी के शहर ही क्यों न हों, सभी में घरों के दाम आसमान छू रहे थे.

तो आखिर कैसे पहुंचे दाम इन ऊँचाइयों पर. भारत में घरों के जाने माने निर्माता समूह पार्श्वनाथ बिल्डर्स के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बीपी ढाका बताते हैं, "विकसित देशों की जो कार्यप्रणाली थी उसे भारत में भी लोगों ने कॉपी करने की कोशिश की. और दूसरी चीज़ ध्यान रखने की ये है की भारत में कोई सोशल सिक्यूरिटी स्कीम नहीं है. इसीलिए लोगों के बुढापे का सहारा किराया होता था और एक दूसरा मकान होता था अपने एक मकान के अलावा. इसलिए ये चीज़ें साथ-साथ चलकर एक नोर्मल मार्केट से एक ऐब्नोर्मल मार्केट की तरफ चली गयीं, जिसमें हर शख़्स ने अपना भविष्य ढूढ़ने की कोशिश की."

ज़मीन और घरों की आसमान छूती कीमतों के बीच ही दुनिया भर को झेलनी पड़ी मार आर्थिक मंदी की और भारत भी इससे अछूता न रह सका.

मंदीकीमार

लगभग हर क्षेत्र को कुछ न कुछ नुक़सान ही पड़ा इस वैश्विक मंदी के चलते और आवासीय क्षेत्र भी इसी चपेट में आ गया. कहा जाने लगा कि भारत में 20 फीसदी से भी ज्यादा रफ़्तार से बढ़ रहे आवासीय क्षेत्र की रफ़्तार थम गई है और अब उन लोगों के सपने सच हो सकेंगे जो इन बढ़ी हुई कीमतों के बीच हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे.

देश भर में बड़े-बड़े बिल्डरों ने कम कीमतों पर नई परियोजनाएं शुरू करने का ऐलान भी कर दिया. कब और कैसे आया ये दौर, इस बारे में बीपी ढाका बताते हैं, "वर्ष 2007 में जो लोग इस बाज़ार को बारीकी से देख रहे थे, उन्हें ये सुधार दिखने लगा था. ये तय हो गया था की दाम अब इससे ऊपर नहीं जा सकते और अगर आप बैंक में भी पैसा जमा कराएँगे तो आठ साल में वो भी दोगुना हो जाएगा जबकि जो फ्लैट्स आपने 80 लाख का लिया होगा वो एक करोड़ 60 लाख का कभी नहीं होगा."

वो आगे बताते हैं, "जब अमरीकी रियल इस्टेट बाज़ार में ये मंदी आई तो भारतीय मीडिया ने उसे काफी तूल दिया जो एक तरह से सही भी था. और फिर देर वही ट्रेंड भारत में भी पहुँच ही गया."

पर क्या वाकई में ज़मीन और घरों की कीमतों में आई कथित गिरावट से फायदा हुआ इनको खरीदने की मंशा रखने वाले आम लोगों को औऱ क्या कम कीमतों पर खरीदे जा सकते हैं आम लोगों द्वारा वही घर जो कुछ समय पहले तक उनकी पहुँच से बिल्कुल ही बाहर थे.

कम से कम शैलेन्द्र सिंह जैसे खरीदार तो इस बात से बिलकुल भी इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं, "हमने पूरा बाज़ार छान लिया पर ऐसा कहीं लगा ही नहीं कि दाम असल में कम हुए हैं. एक-आधी जगह दाम स्थिर ज़रूर हुए थे पर कमी का तो कई सवाल ही नहीं था. धीरे धीरे इनमे भी इजाफा ही हो रहा था और जो कम कीमत पर घर मिलने वाली बात थी, वो ऐसे घरों के लिए है जो कि बहुत छोटे थे और जिनके निर्माण में इस्तेमाल हुई सामग्री भी ठीक नहीं थी. इन छोटे घरों से एक आम आदमी की ज़रूरतें कहाँ पूरी होती हैं."

शैलेन्द्र की ये बात सुनकर मन में सवाल उठा की क्या अभी भी आवासीय क्षेत्र में ज़मीन और घरों के दाम उन्हीं बुलंदियों पर है जैसा कुछ लोग महसूस कर रहे हैं, या फिर कम कीमतों पर घोषित हो रही नई परियोजनाएं लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.

इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए मैं पहुंचा दिल्ली से लगे नोएडा में. यहाँ जिधर भी नज़र दौडाई, ऊंची ऊंची इमारतें दिखाई दीं, जिसमें से कुछ तो तैयार हो चुकी है और कुछ निर्माणाधीन हैं जिनमें रात दिन काम चलता रहता हैं. रविवार या शनिवार के दिन यहाँ पर तमाम परिवार सैम्पल फ्लैटों का जायज़ा लेते देखे जा सकते हैं और इनमें अभी भी घर बुक करने का वही उत्साह जान पड़ता है जो पहले था.

इन्हीं इमारतों में से एक में काम कर रहे इंजीनियर अनिल कुमार बताते हैं, "लोगों ने ऐसे ही अफ़वाह फैला दी थी की दाम कम हो गए. मार्केट तो यहाँ पर हमेशा ही बढ़िया रहा है. हमारी साइट पर तो जो भी प्रस्ताव सामने आए, वो बिक गए. भीड़ की भीड़ आती है यहाँ छुट्टी वाले दिन इन घरों को जायज़ा लेने और दाम पता करने के लिए."

कितनापड़ाअसर...?

लेकिन एक तरफ जहाँ रियल इस्टेट बाज़ार में अभी भी नए घर खरीदने वालों की भरमार है, तो दूसरी तरफ इस बात में भी कोई शक नहीं कि देश के लगभग सभी बड़े बिल्डरों ने बाज़ार में आई गिरावट को महसूस भी किया है.

कहीं न कहीं घरों की मांग और ज़रुरत के अनुपात में गणित ठीक न बैठने की वजह से उच्च श्रेणी और महेंगे घरों की बहुतायत होने लगी और थोड़े कम बजट और सस्ते घरों को खरीदने वालों की तादाद बढ़ गई.

शायद इसी बात को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने कुछ महीनों पहले ये घोषणा भी की 20 लाख रूपए के अन्दर घर खरीदने वालों को ऋण कम ब्याज दरों पर दिया जायेगा.

आवासीय क्षेत्र में आई मंदी के मद्देनज़र ही वित्तमंत्री के साथ बजट पूर्व की एक अहम बैठक से बाहर आकर शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा की घर खरीदने के लिए पांच लाख से कम ऋण लेने वालों को मात्र साढ़े छह प्रतिशत तक की ब्याज दर वाला ऋण दिया जाना चाहिए. साथ ही जयपाल रेड्डी ने थोड़ी ज्यादा पूँजी ऋण लेकर घर खरीदने की मंशा रखने वालों को भी उम्मीद की किरण दिखाई.

जयपाल रेड्डी ने कहा, "20 लाख बहुत कम होते हैं एक फ्लैट खरीदने के लिए. इस सीमा को बढ़ाकर 30 लाख तक किया जाना चाहिए और इन लोगों से साढ़े सात प्रतिशत की दर पर ब्याज लेना चाहिए."

तो क्या भारत में अब वो दौर आ चुका है जब कम कीमतों पर सस्ते घर एक आम आदमी की पहुँच में होंगे? फिलहाल तो यही लगता है कि सरकार और पूरा आवासीय क्षेत्र इसी कोशिश में लगा है की ये संभव हो सके.

वो बात और है कि आर्थिक मंदी की मार के चलते खुद घर मुहैय्या करने वालों की ये पहल उनके अपने हित में है जबकि सरकार के लिए ये ज़रूरी है की इस क्षेत्र को दोबारा रफ़्तार दी जाए. पर अगर आप एक सस्ता घर खरीदने का इरादा रखते हैं तो शायद आपके सपनों के आशियाने की नींव कहीं जल्द ही पड़ने वाली होगी.