गांवों ने बचाया भारत को

फ़ाइल पिक्चर
Image caption छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में रहनेवाले परिवारों की खरीदारी ने अर्थव्यवस्था की गाड़ी चलाई.

जब भारत के शहरी इलाक़ों और दुनियाभर में लोग अपनी नौकरी बचाने की ताक में लगे हुए थे, अभिनव त्रिवेदी अपनी टेलीकॉम कंपनी की नौकरी छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहे थे.

पिछले तीन सालों से अभिनव एटा, मैनपुरी और चंबल के बीहड़ों में अपनी मोबाईल कंपनी की पहुंच बढ़ाने में जुटे हुए थे. उनके काम से खुश होकर कंपनी ने उन्हें लंदन और रोम की मुफ़्त सैर भी करवाई थी.

उनका कहना है इसके बावजूद वो नौकरी छोड़ना चाहते थे लेकिन कंपनी उन्हें नहीं छोड़ रही थी.

उनका कहना है, "वहां जान का ख़तरा तो रहता ही था...काम के बाहर कोई ज़िदगी नहीं थी."

लेकिन कंपनी उन्हें छोड़ने को राज़ी क्यों नहीं थी?

जवाब मुश्किल नहीं है.

जब राष्ट्रपति ओबामा और दूसरे पश्चिमी देश अपनी अपनी अर्थव्यवस्थाओं में जान फूंकने के लिए अरबों डॉलर झोंक रहे थे, भारत के ये गुमनाम, पिछड़े इलाक़े ख़ामोशी से भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी के लिए इंधन का काम कर रहे थे.

और इन बाज़ारों पर क़ब्ज़े के लिए जो ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा थी, उससे अभिनव जैसे अनुभवी एक्ज़क्यूटिव कंपनी के लिए बेहद अहम बन गए.

Image caption अभिनव त्रिवेदी को चंबल की मेहनत का फल मिला रोम की यात्रा के रूप में.

वैसे तो भारतीय अर्थशास्त्रियों ने विश्व आर्थिक मंदी का भारत पर कम असर होने के कई कारण दिए हैं. कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की मुख्यधारा से बची हुई है, निर्यात पर निर्भरता कम है, बैंकों पर अभी भी काफ़ी नियंत्रण है, और आमतौर पर पश्चिमी देशों की तरह कर्ज़ लेकर ख़र्च करने की आदत नहीं है.

लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर लगभग एकमत हैं कि भारत को इस संकट से बचाने में ग्रामीण या ग़ैर-शहरी अर्थव्यवस्था की अहम भूमिका रही और आगे भी इसकी सक्रिय भूमिका रहेगी.

मिलीजुली भूमिका

भारतीय प्रबंधन संस्थान, बैंगलोर में सेंटर फ़ॉर पब्लिक पॉलिसी के चेयरमैन गोपाल नाइक का कहना है, "पिछले कुछ सालों की अच्छी मॉनसून और फ़सलों की अच्छी कीमत से ग्रामीण भारत की क्रयशक्ति में काफ़ी बढ़ोतरी हुई और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार में ज़्यादा कमी नहीं आई."

उनका कहना है,"इसमें थोड़ी किस्मत और सरकार की तरफ़ से ग्रामीण क्षेत्र में हुए निवेश दोनों ही की मिलीजुली भूमिका थी."

माना जा रहा है कि पिछले चार सालों में न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी जिस कीमत पर सरकार किसानों के फ़सल खरीदने की गारंटी लेती है, उसमें कुल 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

नरेगा जैसे कार्यक्रमों से भी फ़ायदा हुआ क्योंकि उससे ग्रामीण क्षेत्र के उन लोगों को भी नौकरियां मिल पाईं जो कृषि पर निर्भर नहीं थे.

कुछ महीने पहले वाशिंगटन में बीबीसी से बात करते हुए भारती ग्रुप के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने कहा था कि ग्रामीण भारत अब हर उस सुविधा को हासिल करना चाहता है जो शहर में उपलब्ध हैं.

उनका कहना था, "...और ये उद्योग जगत के लिए बहुत बड़ा मौक़ा है. कृषि क्षेत्र में तरक्की के बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता."

भारत की एक अरब की आबादी में से 70 प्रतिशत ग्रामीण या ग़ैर-शहरी इलाक़ो में रहती है और सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान 26 प्रतिशत है.

अंदाज़ा है कि ये योगदान जितना बढ़ेगा अर्थव्यवस्था उतनी ही तेज़ी से बढ़ेगी.

गांवों का योगदान

Image caption पानी की भले ही कमी हो लेकिन शैंपू से मोबाईल तक सबकुछ बिक रहा है गांवों में.

गांव-गांव तक टेलिविज़न के पहुंचने और विज्ञापनों से हर तरह के प्रसाधनों की चाहत बढ़ी है और कॉरपोरेट जगत अपने सामान को इस बाज़ार की मांग और जेब के अनुरूप ढाल रहा है.

तो दस रूपए में आप मोबाईल को टॉप अप करवा सकते हैं, पचास पैसे में शैंपू और टूथपेस्ट के पाउच खरीद सकते हैं, सस्ते रीबॉक के जूते पहन सकते हैं, सस्ती वाशिंग मशीन और गैस स्टोव ख़रीद सकते हैं.

रूरलनौकरीडॉटकॉम वेबसाईट के सीईओ अजय गुप्ता का कहना है कि चाहे टेलीकॉम की बात करें, गाड़ियों की बात करें, या प्रसाधनों की बात करें, पचास प्रतिशत से ज़्यादा मांग ग़ैर-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से आ रही है. उनकी वेबसाईट ऐसी कंपनियों के लिए नियुक्ति करती है जो ग्रामीण क्षेत्रों में पांव फैला रहे हैं.

उनका कहना है, "इस क्षेत्र के बाज़ारों पर मंदी के दौरान भी कोई असर नहीं हुआ क्योंकि लोगों की आय पर कोई असर नहीं हुआ..बल्कि तेज़ी ही आई."

रफ़्तार जारी रहेगी

लेकिन अब जबकि देश के एक तिहाई ज़िले सूखे से प्रभावित हैं, क्या ये तरक्की जारी रह पाएगी?

आईआईएम बैंगलोर के गोपाल नाइक का कहना है कि सूखाग्रस्त इलाक़ो को छोड़ भी दें तब भी इतने इलाक़े बच जाते हैं कि अर्थव्यवस्था की रफ़्तार जारी रहेगी.

इसके अलावा उनका कहना है कि बिहार, उड़ीसा, पूर्वी उत्तरप्रदेश जैसे कई इलाके हैं जहां मूलभूत ढांचे के अभाव में निवेश बिल्कुल नहीं हुआ है.

प्रोफ़ेसर नाइक कहते हैं, "अगर इन क्षेत्रों में सुधार आ जाए तो यहां से जो आमदनी होगी वो महानगरों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हो सकती है."

जानेमाने अख़बार वाल स्ट्रीट जरनल ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके अनुसार ग्रामीण आय 2004-2005 के 220 अरब डॉलर से बढ़कर 2010-2011 में 425 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगी.

कोई आश्चर्य नहीं कि बड़ी-बड़ी कंपनियां ऐसे लोगों की तलाश कर रही हैं जिनके पास ग्रामीण और ग़ैर-शहरी बाज़ारों का ज्ञान और अनुभव है. बड़े-बड़े प्रबंधन संस्थानों से डिग्री हासिल किए युवक मैनेजमेंट ट्रेनी के तौर पर इन इलाकों में काम कर रहे हैं.

Image caption अजय गुप्ता का कहना है कि गांवों की आय पर मंदी का असर नहीं पड़ा.

अजय गुप्ता का कहना है, "जब मंदी अपने चरम पर थी, (पूरी दुनिया में लोगों की नौकरियां जा रही थीं) तब भी ऐसे लोगों की मांग में कोई कमी नहीं आई थी."

ये बाज़ार शहरी बाज़ारों से अलग हैं और यहां पैठ बढ़ाने के लिए नए-नए तरीकों की ज़रूरत होती है.

चंबल के बीहड़ों तक अपनी कंपनी के सिम कार्ड और टॉप अप कार्ड की पहुंच बना चुके अभिनव त्रिवेदी का कहना है कि उनकी मुलाक़ात कई ऐसे लोगों से हुई जो कभी अपने गांव से बाहर नहीं निकले, कभी ट्रेन तक नहीं देखी और ऐसे लोगों के लिए मोबाईल का इस्तेमाल एक बड़ी चुनौती थी.

उनका कहना है, "मैने उन्हें बस दो बटन दिखाए—एक हरा (फ़ोन सुनने के लिए) एक लाल (फ़ोन काटने के लिए)—और बात उनकी समझ में आ गई."

उनका कहना है कि इन इलाक़ो में भले ही मार्जिन कम हो, चीज़ें छोटी हों, सस्ती हों लेकिन तादाद इतनी है कि कोई भी प्रोडक्ट कामयाब हो सकता है अगर वो जेब और लोगों की चाहत के बीच संतुलन बना ले.

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