शहरी मंदी, कहीं गरम कहीं ठंडी

Image caption अबुल लाईस शेख ने विदेशी बाज़ार को छोड़कर घरेलू बाज़ार की तरफ़ ध्यान दिया तो बात बनी.

अबुल लाईस शेख़ धारावी में चमड़े के सामानों का व्यापार करते हैं. बेल्ट, बैग और बटुवे विदेश निर्यात करते हैं.

पिछले साल नवंबर में जब मैं उनसे मिला था तब उनका धंदा काफी मंदा चल रहा था. कारण अमरीका और पश्चिमी देशों में आई आर्थिक मंदी.

पिछले दिनों उनके पास मैं दोबारा गया और पूछा मंदी ख़त्म हुई, जवाब था -- नहीं.

लेकिन उन्होंने एक नया रास्ता ढूंढा और भारत में ही बाज़ार तलाशने की कोशिश की. ग्राहकों को लुभाने के लिए दाम घटाए और तब जाकर उनका बिजनेस थोडा संभला.

दूसरी तरफ़ सीनियर मेनेजर वत्सला पंत की आर्थिक स्थिति पर इस संकट का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा: “मैं बचत पर ज़्यादा ध्यान देने लगी और बड़े खर्चों को टाल दिया. लेकिन आर्थिक संकट से हमें कोई परेशानी नहीं हुई.”

शेयर बाज़ारों में निवेश करने वाले मोहम्मदी फर्नीचरवाला पिछले साल शेयरों के भाव गिरने पर थोड़ा घबराए थे. उन्होंने शुरू में काफ़ी पैसे गंवाए. अब भी वो 20 प्रतिशत के घाटे पर चल रहे हैं.

इन उदाहरणों से साफ़ ज़ाहिर है की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंदी का भारत के शहरी इलाकों में अलग-अलग असर पड़ा है.

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू है सूरत. भारत का भीड़भाड़ वाला ये शहर हीरों के निर्यात के लिए दुनिया भर में जाना जाता है.

अमरीका और यूरोप में आर्थिक मार के कारण सूरत में हीरों के दर्जनों कारखाने बंद हो गए हैं और हज़ारों कारीगर और व्यापारी बेरोज़गार हो गए हैं. बीस अरब डॉलर का यह उद्योग अब केवल आधा होकर रह गया है.

व्यापार और उद्योग जगत के लोग मंदी या आर्थिक संकट को लेकर विभाजित हैं.

वत्सला पन्त एक रिसर्च कंपनी, निल्सन, की अधिकारी हैं.

उनका कहना है की शहरी भारत में आर्थिक संकट का प्रभाव ज़्यादा देखने को नहीं मिला है.

उनका कहना है: "भारत में अर्थव्यवस्था धीमी गति से प्रगति कर रही है लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा की आर्थिक मंदी का शिकार है भारत"

Image caption ओनाली रूपानी कहते हैं कि असली कहानी है भारत के मंदी से तेज़ रफ़्तार से उबरने की.

मोहम्मदी कॉरपोरेट जगत को क़र्ज़ देने की कंपनी चलाते हैं.

उनका कहना है वो कॉरपोरेट को अब पहले से अधिक कर्ज़े दे रहे हैं और आर्थिक मंदी भारत के लिए सही शब्द नहीं है.

उनका कहना है, "मुझे चिढ़ है रिसेशन शब्द से. कहाँ है रिसेशन? हाँ, रियल इस्टेट के दामों में गिरावट ज़रूर देखने को मिला है लेकिन इससे तो लोगों को फ़ायदा ही होगा"

उद्योग और व्यापार पर किस तरह का असर पड़ा है इसकी एक झलक शेयर बाज़ारों की हालत देख कर समझ में आ सकता है.

ओनली रुपानी मोतीलाल ओसवाल शेयर कंपनी के एक बड़े अधिकारी हैं. उनका कहना है की पिछले साल बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 14,000 अंकों पर आया था कि अमरीका में मंदी शुरू हो गई.

कहते हैं, ``इसका प्रभाव भारत के शेयर बाज़ारों पर ज़रूर पड़ा क्योंकि विदेशी निवेशकों के पास भारतीय बाजारों में निवेश करने के लिए पैसे ही नहीं बचे. इसकी वजह से सेंसेक्स 8,000 अंकों से भी नीचे जाकर गिरा.’’

Image caption भारतीय शेयर बाज़ार गिरकर संभलते नज़र आ रहे हैं.

साथ ही श्री रुपानी ये भी कहते हैं कि असली कहानी है मंदी से तेज़ रफ़्तार से निकलने की.

शेयर बाज़ार का यू-टर्न

उन्होंने एक सादा पन्ने पर आंकड़ों और ग्राफ़िक के ज़रिए अपना तर्क कुछ इस तरह दिया: "एक साल में सेंसेक्स उस जगह से भी थोडा ऊँचा चला गया है जहाँ पिछले साल मंदी के समय था. यानी इस की रिकवरी ने पूरा यू टर्न लिया जबकि अमरीकी शेयर बाज़ार के सूचकांक अब भी उस जगह से थोडा ही ऊपर हैं जहाँ पिछले साल मंदी शुरू होने के बाद गिरे थे."

श्री रुपानी का कहना है कि शहरी भारत में रहनेवालों को मंहगाई ने ज़्यादा मारा है.

उनका कहना है: "गेहूं, चावल और चीनी की कीमतें पिछले साल के मुक़ाबले कई गुना बढ़ी हैं. अगर किसी परिवार का खाने का बजट पिछले साल दस हज़ार महीने था तो इस साल 18 से 20 हज़ार हो गया है लेकिन वेतन उस हिसाब से नहीं बढा है. इसका मतलब यह है की वेतनभोगी क्लास को मंहगाई मार रही है"

केंद्रीय सरकार ने पिछले दिनों यह बताया की आर्थिक विकास की रफ़्तार पिछले तीन महीने में थोड़ी तेज़ हुई है.

इन सभी विशेषज्ञों का कहना है की चूँकि भारत पर आर्थिक संकट का उस तरह से प्रभाव नहीं पड़ा जैसा की दूसरे बड़े देशों में पड़ा है.

साथ ही भारत में विकास के अवसर इन सब देशों से अधिक हैं इसलिए यहाँ आर्थिक मंदी से निकलने और उन्नति के रास्ते पर चलते रहने के अवसर ज़्यादा मिलते रहेंगे.

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