'लोन लेने में पसीने छूट गए'

वैश्विक आर्थिक संकट की शुरुआत अमरीकी रियल एस्टेट क्षेत्र से ही हुई थी. वहां ऐसे कर्ज़दारों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी जिन्होंने घर ख़रीदने के लिए कर्ज़ लिया था लेकिन वे इसे लौटा नहीं पा रहे थे.

आर्थिक संकट का असर कमोबेश हर देश पर पड़ा. भारत में भी. हालाँकि यहाँ ऐसे लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई जो लोन लेकर डिफ़ॉल्टर हो गए हों यानी कर्ज़ की किस्त लौटा पाने में विफल हो गए हों.

इसके बावजूद खुले बाज़ार में नकदी की भारी कमी महसूस की गई और बैंकों से लोन मिलना आसान नहीं रहा.

लगभग तीन साल पहले जिस समय आर्थिक विकास की गति तेज़ थी और हर क्षेत्र रिकॉर्ड दरों से आगे बढ़ रहा था, उस समय मैंने भी होम लोन लिया था. तब घरों या फ़्लैटों के दाम भी तेज़ी से बढ़ रहे थे.

मुझे याद है कि तब जैसे ही मैंने कुछ बैंकों से होम लोन के बारे में जानकारी ली, उनके प्रतिनिधि मानो मेरे पीछे ही पड़ गए. दिन में दसियों बार फ़ोन आता था और यही आवेदन कि, 'सर क्या दिक्कत है, इससे सस्ता कहीं और मिल रहा है तो बताइए.'

उस समय लोन पर ब्याज़ दर क्या होगा उसमें भी सौदेबाज़ी चलती थी. जिस निजी बैंक से मैंने लोन लिया वहां भी ऐसा हुआ. वे साढ़े सात फ़ीसदी की दर पर दे रहे थे लेकिन जब मैंने दूसरे बैंक से लोन लेने की बात की तो सौदा आख़िर में सवा सात फ़ीसदी पर तय हुआ.

लोन एक हफ़्ते में मिला. बिना झंझट के. सिर्फ़ एक दिन एजेंट मुझसे ज़रूरी दस्तावेज़ लेने आए और उसके बाद मुझे कभी भी बैंक नहीं जाना पड़ा और चेक सीधे जिससे मैंने घर ख़रीदा था उसके पास पहुँचा दिया गया.

लेकिन वर्ष 2008 में स्थितियाँ बिल्कुल बदल गईं. बैंकों से कर्ज़ मिलना मुश्किल हो गया. रियल एस्टेट के पहिए भी थम गए यानी दाम भी घटने लगे क्योंकि न माँग थी और न आसानी से लोन मिल रहा था.

अब क्या स्थितियाँ बदली हैं? ये जानने के लिए हमने डॉक्टर एनके सिंह से बात की जिन्होंने हाल ही में होम लोन लिया है.

लोन लेने के दौरान उनके अनुभव उन्हीं की ज़ुबानी...

लोन लेने में पसीने छूट गए... एनके सिंह

Image caption लोन तो मिल गया लेकिन चिंताएँ बरकरार हैं.

चार महीने पहले मैंने घर ख़रीदने की योजना बनाई. पहले एक दो महीने तो हम अपने बजट के लायक घर ही ढूँढते रहे.

अंत में जाकर ग़ाज़ियाबाद में एक नामी गिरामी बिल्डर का निर्माणाधीन अपार्टमेंट मुझे अच्छा लगा और मैंने बुकिंग करा ली.

बुकिंग कराने में तो झंझट था नहीं क्योंकि पाँच प्रतिशत जमा करने थे. तीन रूम का फ़्लैट लगभग 40 लाख का था तो मैंने दो लाख रुपए देकर बुकिंग अपने नाम करा ली.

बिल्डर ने हमसे कहा कि 45 दिनों के भीतर 95 फ़ीसदी पैसा जमा कराना होगा. अब लोन तो लेना ही था. लेकिन उस प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों ने मुझे बताया कि बड़े आराम से आपको किसी बैंक से 30 लाख का लोन मिल सकता है.

फिर मैंने लोन के लिए कोशिश शुरू की. ज़हन में पहला ख़्याल स्टेट बैंक का आया. मंदी जब ज़ोर पर थी तब भारत के भी कुछ निजी बैंकों की हालत पतली होने की ख़बर मैंने सुनी थी.

तब हर जगह यही चर्चा थी कि सरकारी बैंक ही भरोसे लायक है.

यही कारण था कि मैंने शुरुआत एसबीआई से की. लेकिन मेरे हाथ लगी हताशा...

जब उम्मीदें बुझने लगीं

जब एसबीआई में गया तो स्वागत बिल्कुल निजी बैंकों की तरह हुआ. वहां जो एक अधिकारी थे उन्होंने फ़्लैट बुकिंग के दस्तावेज़ देखे.

Image caption भारत में फ़्लैटों की कीमत फ़िर बढ़ने लगी है.

उनका कहना था, "आपने सही जगह बुकिंग कराई है. लेकिन लोन में दिक्कत हो सकती है. फिर भी आप कहें तो एक फ़ॉर्म भर दीजिए. ये मुंबई ऑफ़िस जाएगा और वहीं से फ़ाइनल होगा कि आपको लोन दिया जाए या नहीं."

मैंने पूछा क्या कोई दिक्कत है? उनका जवाब था, "आपने डाउनपेमेंट के लिए बिल्डर से करार किया है. दिक्कत ये है कि आपका फ़्लैट अभी बन ही रहा है, इसलिए पूरा पैसा एक साथ हम आपको शायद नहीं दे पाएंगे." अगर बिल्डर ने काम अधूरा छोड़ दिया तो?"

बैंक वाले का कहना था कि वे 'कंस्ट्रक्शन लिंक्ड' दे सकते हैं जिसके तहत जैसे-जैसे घर का काम पूरा होता है, उसी के मुताबिक बिल्डर को कई किश्तों में लोन का पैसा दिया जाता है.

फिर मैंने अपने बिल्डर से बात की तो उनका सीधा कहना था कि अगर आप कंस्ट्रक्शन के आधार पर लोन लेंगे तो पाँच प्रतिशत ज़्यादा पैसा देना होगा.

मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं किसी और बैंक की ओर रुख़ करूं..

ब्याज़ दर कि चिंता

इसके बाद मेरे बिल्डर ने कहा कि आईएनजी वैश्य बैंक के साथ उनका टाई-अप है, इसलिए वहां जाइए आपका काम हो जाएगा.

मुझे कुछ उम्मीद नज़र आई क्योंकि बिल्डर ने ख़ुद इसी बैंक से पैसे उठाए थे और इस प्रोजेक्ट को आईएनजी वैश्य बैंक ने 'एप्रूव' किया हुआ था.

बिल्डर ने ही इस बैंक के एक एजेंट को मेरे पास भेजा. उसने तसल्ली दिलाई कि लोन आराम से हो जाएगा. पूरा पैसा भी एक ही बार सैंक्शन हो जाएगा.

फिर मैंने जानना चाहा कि ब्याज दर क्या होगी. जवाब था, 11.5 प्रतिशत. मतलब तीस लाख के लोन पर लगभग 33 हज़ार रूपए महीने की किश्त.

मुझे धक्का सा लगा. भले ही एसबीआई से मुझे लोन नहीं मिल सका लेकिन वहां ब्याज़ दर आठ प्रतिशत ही थी. इससे तुलना करने पर ये बहुत अधिक लगा.

मैंने बहुत कोशिश की तो उन्होंने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा पौना फ़ीसदी घटा सकते हैं.

मुझे दो साल पहले का वो समय याद आया जब सात प्रतिशत पर होम लोन मिला करता था.

ख़ैर काम हो गया

इसके बाद मेरे एक मित्र ने एलाआईसी हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनी से संपर्क करने को कहा. पहले तो उन्होंने भी यही कहा कि पूरा डाउनपेमेंट नहीं कर सकते.

फिर मैंने समझाया कि 80 प्रतिशत काम हो चुका है. तसल्ली के लिए उन्होंने निर्माणाधीन अपार्टमेंट का जायज़ा लिया. मुझे भी साथ जाना पड़ा.

फिर उन्होंने हामी भरी और तब शुरू हुई कागजी कार्रवाई. पहले दो महीने की सैलरी स्लिप माँगी फिर दो और महीने के सबूत माँगे.

घर के पते का सबूत तो माँगा ही, ऑफ़िस का पता भी देना पड़ा. यही नहीं दोनों जगहों पर बैंक के आदमी बार-बार आए.

डॉक्टर एनके सिंह की पत्नी कहती हैं, "मैं तो घर में फ़ोन अटैंड करते-करते परेशान हो गई थी. कभी सैलरी स्लिप के बारे मुझसे पूछते कि हर महीने तनख़्वाह में फ़र्क क्यों हैं. कभी ये पूछते कि आपके नाम से दूसरा कोई लोन है क्या?"

वो कहती हैं, "अंत में 15 दिनों में लोन सैंक्शन हो गया. यहां ब्याज़ दर 8.75 फ़ीसदी तय हुआ है. अभी जो स्थिति है उसके हिसाब से ठीक ही है."

लेकिन डॉक्टर एनके सिंह को एक चिंता अभी भी सता रही है. वो कहते हैं, "अगर भविष्य में आर्थिक स्थित फिर ख़राब हुई तो ब्याज़ दरें बढ़ सकती हैं क्योंकि मेरा लोन फ्लोटिंग दर पर है. तब मेरे लिए काफ़ी मुश्किल हो जाएगी."

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