किसे सुध है प्रभावित घरों की...?

भारतीय कामगार

"मेरे भाई दुबई में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे. अच्छी पगार थी. वो घर भर का सहारा थे, उनके भेजे पैसे से गृहस्थी की गाड़ी खिंच रही था. बहन की शादी की तैयारियां की जा रही थीं..... अब सारे अरमानों पर पानी फिर गया है."

गोरखपुर के रहनेवाले सैय्यद शमसुद्दीन हैदर के बड़े भाई की नौकरी चली गई है. यह परिवार भारत के उन लाखों परिवारों जैसा ही है जो विदेश जाकर कमाने वाले लोगों के ज़रिए यहाँ अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं.

आर्थिक मंदी की चपेट में आई विश्व अर्थव्यवस्था के कारण अर्थजगत के बड़े बड़े प्रतिष्ठान अपने बुरे दौर से गुज़र रहे हैं. अमरीका, यूरोप और अरब देशों में कितने ही लोगों को छटनी करके बाहर कर दिया गया है. कई लोग कम तन्ख़्वाहों पर काम करने को मजबूर हैं.

भारत से भी काम के लिए लोगों के बाहर जाने का प्रवाह धीमा हुआ है. वापस आनेवालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

भारत में केरल, पंजाब, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे कई राज्यों से बाहर जाकर काम करनेवालों की तादाद लाखों में है. इनमें से कई मंदी के दौर में अपनी नौकरी खो चुके हैं. इसका सीधा असर उन लाखों परिवारों पर पड़ रहा है जिनकी जीविका देश से बाहर जाकर काम करनेवाले और वहाँ से पैसा भेजनेवालों पर आधारित है.

शमसुद्दीन हैदर बताते हैं, "घर में सभी मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान हैं. माँ दिल की मरीज़ हैं. पिताजी को दो बार पैरालेसिस का अटैक पड़ चुका है. मैं ख़ुद भी मंदी के चलते बेरोज़गार हो चुका हूं. दुबई में बड़े भाई ने बहन की शादी के लिए जो पूंजी जमा की थी, वो सब वहाँ रहते हुए नया काम खोजने में खर्च हो रही है. अगर ऐसा ही चला तो उन्हें भी वापस लौटना पड़ेगा क्योंकि बचत के पैसे से कितने दिन गुज़ारा चलेगा."

बदलती स्थितियाँ

विश्व बैंक के ताज़ा आकड़ों के मुताबिक बाहर से भारत में पैसे की यह आमद देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग चार प्रतिशत का योगदान देती है.

ऐसे में लगता तो यही है कि लोग लौटे हैं तो इसका असर पैसे की आमद पर भी पड़ा होगा. हज़ारों प्रभावित परिवारों की तरह बाहर से आने वाले पैसे का आंकड़ा भी चरमराया होगा.

पर भारत सरकार में आप्रवासी मामलों के मंत्री वायलार रवि बताते हैं कि इस पैसे की आमद इसबार पिछले 10 बरसों के रिकॉर्ड स्तर पर है.

उन्होंने बताया, "पिछले वर्ष तक विदेश में रह रहे भारतीयों के ज़रिए भारत आ रही पूंजी का आंकड़ा लगभग 30 अरब अमरीकी डॉलर के आसपास था पर इसबार इसमें रिकॉर्ड बढ़त हुई है और इस पैसे की आमद बढ़कर 43.5 अरब अमरीकी डॉलर हो गई है."

पर ऐसा क्यों हो रहा है कि जब कामगार बड़ी तादाद में लौट रहे हैं, पैसे की भी आमद बढ़ी है. इस स्थिति को समझाते हुए जानी मानी अर्थशास्त्री जयति घोष बताती हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग वापस आ रहे हैं तो अपने साथ मेहनत से जोड़ी-जमा की गई अपनी पूंजी भी लेकर आ रहे हैं.

Image caption दुबई से बड़ी तादाद में दक्षिण एशियाई लोग वापस आने को मजबूर हुए हैं

वो कहती हैं, "पूंजी की आमद में उछाल स्वाभाविक है क्योंकि जो बेरोज़गार हुए हैं वे अपनी बचत के साथ लौट रहे हैं. पर ऐसा अभी के लिए ही है. अगले एक-दो वर्ष में इस पूंजी में गिरावट भी होगी क्योंकि बाहर से पैसा कमाकर भेजनेवालों की तादाद कम हो रही है."

यानी विदेश से आ रही पूंजी की रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी भले ही देखने-सुनने में एक अच्छी आमद लगती हो पर ताज़ा परिस्थितियों में इसमें दर्ज हुई बढ़ोत्तरी कोई बेहतर होती स्थिति का संकेत नहीं है.

कामगारों की स्थिति

और पूंजी की बढ़ोत्तरी के आंकड़ों की चमक में भारत से बाहर जाकर काम कर रहे कामगारों, मजदूरों के संकट को भी झुठलाया नहीं जा सकता है.

भारत से बाहर जाकर काम करनेवाले अधिकतर लोग जो मंदी के कारण प्रभावित हुए हैं वे कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफ़ैक्चरिंग, आईटी जैसे क्षेत्रों में काम करनेवाले लोग हैं.

हालांकि जयति घोष बताती हैं, "एक बड़ा हिस्सा सर्विस सेक्टर का भी है पर इसमें ज़्यादातर महिलाएं हैं. सर्विस सेक्टर पर असर शायद सबसे कम है इसलिए विदेश में काम कर रही भारतीय महिलाओं की स्थिति अभी भी सुधरी हुई ही है."

आप्रवासी मामलों के मंत्री वायलार रवि मानते हैं कि मजदूरों, श्रमिकों और कुछ अन्य प्रवासियों को लौटना पड़ा है पर ज़ोर देकर बताते हैं कि हालात चिंताजनक और गंभीर मान लिए जाएं, ऐसा कतई नहीं है.

यह तक कहा कि भारतीय सबसे ज़्यादा अमरीका और दुबई में ही बेरोज़गार हुए हैं. पर बाकी जगहों और अरब देशों के बाकी हिस्सों में स्थिति स्थिर है.

जयति घोष एक और चिंता की ओर इशारा करती हैं. वो बताती हैं कि भारत से बाहर काम कर रहे श्रमिकों के लिए क़ानून और नीतियों के रूप में कोई राहत न तो अच्छे वक़्त में थी और न अब बुरे वक़्त में है.

हालांकि यही सवाल जब वायलार रवि से पूछा तो उन्होंने बताया कि सरकार इस बारे में गंभीर है. उन्होंने बहरीन जाकर वहाँ सरकार के साथ एक श्रमिक सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर करने की भी बात कही.

इन सब के दौरान भारत में संभलते दिख रहे बाज़ार और पूंजी की बढ़ती आमद के बीच सैय्यद आरज़ू हैदर के माँ-बाप को बेटे की नौकरी की बहाली, बेटी की शादी के खर्च और अपनी जीविका की ज़रूरत जैसी चिंताओं का समाधान कब मिलेगा, इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है.

और फिर यह कोई एक ही परिवार की तो बात नहीं है...ऐसे लाखों हैं. आर्थिक मंदी और संकट के हालात से जूझते हुए.

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