बरकरार है फ़िल्म उद्योग की चमक?

अगर आप फ़िल्मों के शौकीन हैं तो फ़िल्म कमीने के हिट गाने ‘ढन त नन’ के बोल इनदिनों आपके कानों में पड़ ही जाएंगे- खुशी और पैसे के नशे में चूर शाहिद कपूर गाते हैं- 'आजा आज दिल निचोड़ें, रात की मटकी तोड़ें. कोई गुड लक निकालें, आज गुल्लक तो फोड़ें'.

फ़िल्म उद्योग वालों के पास लगता है वाकई गुड लक वाली कोई जादुई गुल्लक है. आर्थिक मंदी के बीच भी जिस रफ़तार और बजट से फ़िल्में बनाने का क्रम जारी है उससे तो यही आभास होता है.

इस साल फ़िल्म निर्माताओं और मल्टीस्क्रीन सिनेमाघर मालिकों के बीच समझौते के बाद रिलीज़ हुई फ़िल्मों में न्यूयॉर्क, लव आजकल, कमीने, ऐसी कई हिंदी फ़िल्मों ने इस बार अच्छा कारोबार किया. हॉलीवुड में इस साल बॉक्स ऑफिस का कारोबार पिछले पांच सालों में सबसे ज़्यादा रहा है.

ज़ाहिर है यहाँ ये सवाल उठना लाज़मी है कि आर्थिक मंदी के इस दौर में जहाँ कई उद्योग डाँवाडोल है, कुछ का दिवालिया निकल चुका है, वहीं मनोरंजन उद्योग पर इस सब का ख़ास असर नहीं हुआ है? बीस से ज़्यादा सालों से फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े निर्देशक डेविड तो यही मानते हैं. वे हीरो नंबर वन, कुली नंबर वन और पार्टनर जैसी कई हिट फ़िल्में दे चुके हैं.

डेविड कहते हैं, “फ़िल्म लाइन में कभी मंदी-वंदी नहीं आती. चार लोग आएँगे, चार जाएँगे, कहानी चलती रहेगी. अगर आप नज़र डालें तो इंडस्ट्री में नए लोग आते रहते हैं, पुराने जाते रहते हैं. फ़िल्म निर्माण का सिलसिला हमेशा चलता रहता है. शो बिज़नेस कभी रुकता नहीं है.”

हाउज़फ़ुल

अनिल अंबानी ग्रुप की मीडिया और मनरोजंन कंपनी रिलायंस बिग इंटरटेनमेंट ने तो इस सब के बीच अपने क़दम हॉलीवुड की ओर भी बढ़ा लिए हैं.

रियालंस मीडिया वर्क्स (जो अब तक ऐडलैब्स के नाम से जानी जाती थी) के सीईओ अनिल अर्जुन बताते हैं, "पिछले साल फ़िल्म उद्योग के लिए सबसे बेहतरीन तिमाही थी अक्तूबर 2008-जनवरी 2009 के बीच जब आर्थिक संकट चरम पर था.बॉलीवुड में कई फ़िल्मों ने रिकॉर्डतोड़ कमाई की थी- गोलमाल रिटर्न्स, दोस्ताना, गजनी, रब ने बना दी जोड़ी जबकि ये वही समय था जब आर्थिक मंदी अपने चरम पर थी. लेहमन ब्रदर्स जैसी कंपनियाँ दिवालिया हो रही थीं."

ज़ाहिर है ये माजरा सिर्फ़ हिंदी फ़िल्म उद्योग का ही नहीं है. ब्रिटेन में रिसेशन के दौर में सिनेमा टिकिटों की बिक्री पिछले साल सालों में सबसे ज़्यादा दर्ज की गई है. जबकि ब्रिटेन उन देशों में से है जिसकी अर्थव्यवस्था सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है. हॉलीवुड और बॉलीवुड के बेहतरीन निर्देशकों में से एक शेखर कपूर बताते हैं कि हॉलीवुड में बॉक्स ऑफ़िस का रिकॉर्ड पिछले पांच सालों में सबसे बेहतर रहा है.

यानी रिसेशन में बूम का दौर? शेखर कपूर मानते हैं कि कई बार विश्व में छोटी-बड़ी मंदी का दौर आया है लेकिन फ़िल्म उद्योग पर इस रुझान का असर कम ही हुआ है.

सपनों की दुनिया

आख़िर क्या कशिश है सिनेमा में कि आर्थिक तंगी के बीच भी लोग इसके तिलिस्म की ओर खींचे चले आते हैं.

तंगहाली के बीच भी, घर के बजट की कटौती के बीच भी सिनेमा के टिकिट पर कटौती कम हो होती है. ऑस्कर विजेता अंग्रेज़ी फ़िल्म एलिज़ाबेथ और बॉलीवुड में मासूस जैसी फिल्मों के निर्देशक शेखर कपूर कहते हैं, आर्थिक मंदी के दौर में भी फ़िल्में देखना दरअसल सस्ता ही होता है. इसके अलावा ये भी है कि अगर आपको डिप्रेशन है तो अच्छा लगता है कि आप सिनेमाघर में जाकर दो घंटे कोई और ज़िंदगी जी लें. मान लीजिए आपकी नौकरी चली गए आपको पता नहीं कल क्या होगा. लेकिन दो-ढाई घंटों में आप किसी और दुनिया में चले जाते हैं.

यहाँ इतिहास में थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं. मंदी की बात करें तो सबसे पहले ज़िक्र होता है 1929 के ग्रेट डिप्रेशन का. 1929 में विश्व की अर्थव्यवस्था में ऐसा आर्थिक भूचाल आया था कि इससे उबरने में बरसों लग गए थे. 1929 से 1939 के बीच अमरीका में बेरोज़गारी दर सबसे ज़्यादा थी, किसानों का हाल बेहाल था. लेकिन उस दौर में भी अमरीका के सिनेमाघर भरे रहते थे.

उस कठिन दौर में यथार्थवादी फ़िल्मों के अलावा हॉलीवुड में नई तरह की फ़िल्में बनने लगीं जिन्हें लोग म्यूज़िकल कहते हैं- गीत-संगीत वाली, वास्तविकता से दूर ..फ़ील गुड फ़िल्में जो बॉलीवुड की पहचान माना जाता है. 1936 में आई चार्ली चैपलिन की मॉर्डन टाइम्स, इट्स ए वंडरफ़ुल लाइफ़ इसकी मिसाल है.

ग्रेट डिप्रेशन के उस मुश्किल दौर में (1934) छह साल की शर्ली टेंपल सबसे हिट अभिनेत्री बन गई. उसकी मासूमयित भरी अदायगी और मस्ती भरी गायकी के लोग दीवाने हो गए थे.

फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट ग्रेट डिप्रेशन के दौर में 1933 में अमरीका के राष्ट्रपति थे. उस समय उन्होंने कहा था, “डिप्रेशन के समय के दौरान जब लोगों के हौसले पस्त हो चुके हों, ये ग़ज़ब की बात है कि लोग केवल 15 अमरीकी सेंट देकर फ़िल्म देख सकते हैं, जहाँ वो हँसते हुए बच्चे का चेहरा देखेंगे, कुछ खूबसूरत लम्हे गुज़ारेंगे और अपनी मुश्किलें कुछ देर के लिए भूल जाएँगे.”

उड़ान पर लगाम

हालांकि यहाँ ये अंदाज़ा ग़लत होगा कि आर्थिक मंदी ने फ़िल्म उद्योग को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं किया. फ़िल्म इंडस्ट्री में पिछले कुछ सालों में कई बदलाव आए हैं.

कॉरपोरेट जगत से जुड़े बड़े-बड़े लोग हिंदी फ़िल्मों में पैसा लगाने लगे. मल्टी-करोड़ डील होने लगी. हिंदी फ़िल्मों के बजट 80 से 100 करोड़ तक होने लगे हैं. फ़िल्मी सितारों के सितारे या कहें कि फ़ीस बुलिंदियों पर पहुँच गई थी. बात यहाँ तक होने लगी कि उन्हें एक फ़िल्म के लिए 20-35 करोड़ तक मिलते हैं.

रिलायंस मीडिया वर्क्स के सीईओ अनिल अर्जुन बताते हैं, “मंदी के दौर में भी दर्शक टिकिट खरीदकर फ़िल्म देख रहे हैं, इसलिए सिनेमाघरों से होने वाली आमदनी पर उतना असर नहीं पड़ा है. दरअसल थिएटरों के अलावा फ़िल्म से कमाई के अन्य साधनों में कमी आई है. टीवी चैनल ऊँचे दामों पर फ़िल्मों के सैटेलाइट अधिकार खरीदते हैं जिससे फ़िल्म से होने वाली आमदनी बढ़ती है. लेकिन अब ये आमदनी कम हुई है क्योंकि टीवी वगैरह में विज्ञापन कम हुए हैं. इससे निपटने के लिए निर्माता या कॉरपोरेट जगत ने फ़िल्मी सितारों की फीस कम कर दी है, वैसे भी ये फ़ीस पिछले कुछ सालों में आसमान छूने लगी थी. ये शेयर मार्केट में होने वाले करेक्शन की तरह है.”

ट्रेड एनेलिस्ट इंदु मिरानी कहती हैं कि मंदी का एक असर और भी हुआ है. वे कहती हैं, "जैसे विपुल शाह की आने वाली फ़िल्म लंदन ड्रीम्स 120 करोड़ में बिकी थी लेकिन अब कॉरपोरेट जगत वाले कह रहे हैं कि केवल 70 करोड़ देंगे. ये करेक्शन है क्योंकि पहले से ही इतनी कीमत में फ़िल्म बिकनी ही नहीं चाहिए थे."

यानी आर्थिक मंदी फ़िल्म उद्योग के पर कतरने में तो कामयाब तो नहीं सकी है लेकिन उसकी उड़ान पर थोड़ा अंकुश ज़रूर लगा है या कहें कि मार्केट में करेक्शन के संकेत मिल रहे हैं.

ये जुनून.................

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख़ खान से कुछ महीने पहले लंदन में मुलाक़ात हुई थी जब वे बिल्लू बार्बर प्रोमोट करने आए. तब मैने उनसे पूछा था कि जब हर ओर मंदी के बादल हैं, लोग बजट कटौती की बात कर रहे हैं तो आप न सिर्फ़ बड़े बजट की फ़िल्में बना रहे हैं बल्कि लंदन तक आकर प्रोमोशन पर पैसे खर्च भी कर रहे हैं.

उनका जवाब था, “बड़े बजट वाले प्रोडक्शन हाउस के लिए पैसा दिक्कत नहीं है. उनके पास इतनी कूबत है कि वो अपने तरीके से फिल्में बनाना जारी रख सकते हैं. छोटे प्रोड्सूरों पर भी ख़ास असर नहीं होगा क्योंकि वे तो हमेशा से किफ़ायत से और कम बजट वाली फ़िल्में बनाते हैं. अगर असर होगा तो उन लोगों पर जो इन दो श्रेणियों के बीच में आते हैं.”

यानी शाहरुख़ की मानें तो उनके जैसे लोगों का धंधा मंदा नहीं हो रहा. फ़ॉक्स स्टूडियो के साथ उनकी फ़िल्म माई नेम इज़ खान के लिए हुआ भारी-भरकम करार भी यही दर्शाता है.

हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म कमीने और उससे पहले लव आजकल के शो में दिखी भीड़ भी यही बताती नज़र आ रही है कि फ़िल्म अच्छी हो तो उसे दर्शक मिल ही जाएँगे.

यहाँ एक किस्सा याद आता है. जून में जब फ़िल्म न्यूयॉर्क रिलीज़ हुई तो फ़िल्म देखने आई युवती से मैने कौतूहलवश पूछा कि क्या कड़की के इस दौर में मल्टीप्लेक्स के मंहगे सिनेमा टिकिट खरीदने से पहले वो क्या एक बार सोचती है, तो बड़े ‘कूल’ अदाज़ में जवाब आया, “सो वॉट? मेरा पॉकिट मनी कम कर दिया गया है, पर जॉन मेरा फ़ेवरिट होरो है, ही इज़ सो कूल.. वैसे भी परीक्षा ख़त्म होने के बाद मैं चिल करना चाहती हूँ, मस्ती करना चाहती हूँ..फ़िल्म तो देखनी ही है. हाँ पैसे बचाने के लिए मैं पॉपकोर्न नहीं खरीदूँगी."

और फिर वो फ़िल्म न्यूयॉर्क का हिट गाना ‘है जुनूं….है जुनूं सा सीने में” गुनगुनाते हुए निकल गई. फ़िल्मों की सपनीली दुनिया के लिए इस जुनून को देखकर कुछ अंदाज़ा तो हो ही गया कि आख़िर क्यों इतने आत्मविश्वास के साथ निर्देशक शेखर कपूर ने कहा था कि आर्थिक संकट में भी फ़िल्म उद्योग का धंधा मंदा नहीं होता या डेविन धवन ने कहा था कि शोबिज़ का काम कभी रुकता नहीं.

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