मंदी से उबरने की शुरुआत

आर्थिक संकट
Image caption आर्थिक संकट से अब दुनिया के उबरने की बात कही जा रही है

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले दिनों अर्थव्यवस्था में आई स्थिरता के कई संकेतों के आधार पर कहा है कि अब मंदी के अंत की शुरुआत हो चुकी है और उन्हें सुरंग के दूसरे छोर पर रोशनी की किरण दिख रही है.

मगर नौकरियाँ जाने की रफ़्तार में मामूली कमी, व्यवसायों और उपभोक्ताओं का ये विश्वास और यूरोप में घरों की स्थिर होती क़ीमतें- क्या ये सब वास्तव में मंदी के ख़त्म हो जाने के संकेत हैं या अभी एक ठहराव भर आया है.

अमरीका में नीतियों का अध्ययन करने वाली संस्था ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में कार्यरत और कॉर्नेल विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर ईश्वर प्रसाद मानते हैं कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में स्थिरता तो आ गई है मगर मंदी से उबरने में कोई तेज़ी आई है या नहीं ये कहना अभी मुश्किल है.

अमरीका के संदर्भ में डॉक्टर प्रसाद का कहना है, "बेरोज़गारी की समस्या अब भी बनी हुई है और आशंका है कि इस साल के अंत तक ये अभी बढ़ेगी ही. रियल एस्टेट के बाज़ार में भी अभी परेशानियाँ बनी ही हुई हैं. मगर बाज़ार में विश्वास बढ़ रहा है और उपभोक्ता माँगें स्थिर हो गई हैं. इसलिए कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि सबसे बुरा दौर गुज़र चुका है."

उपभोक्ता विश्वास

उधर विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष और पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री शाहिद जावेद बर्की कहते हैं, "जिन लोगों ने मंदी का अध्ययन किया है उनका कहना है कि मंदी जितनी तेज़ होती है उससे बाहर भी उतनी ही तेज़ी से निकलते हैं. मगर अमरीकी उपभोक्ता इस बार शायद उतना ख़र्च नहीं कर सकें."

वह ये भी मानते हैं कि अमरीका अब निर्यात पर काफ़ी निर्भर करेगा और इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर कमज़ोर पड़ा है. बर्की के अनुसार अमरीका के लिए बड़े-बड़े इंजीनियरिंग के सामान का बाज़ार शायद बेहतर होगा.

उपभोक्ताओं का भी अब विश्वास थोड़ा सा बढ़ा है और उपभोक्ता ख़र्च बढ़ता दिख रहा है. इसे भी मंदी की समाप्ति के एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

मगर ब्रिटेन में बेडफ़र्ड के क्रेनफ़ील्ड स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में वित्त मामलों के प्रोफ़ेसर सुनील पोशाकवाले का कहना है कि ज़रूरी नहीं कि उपभोक्ता का ये विश्वास आर्थिक वृद्धि में नहीं बदले. उनके अनुसार उपभोक्ता अपनी बचत का इस्तेमाल अपने ऋण चुकाने में कर सकते हैं न कि ख़र्च करने में.

मंदी से उबरने की इस प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा संकट फ़िलहाल दिख रहा है वो है बढ़ती बेरोज़ग़ारी का. प्रोफ़ेसर ईश्वर प्रसाद के मुताबिक़, "लगभग हर प्रमुख अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी चिंता ये है कि मंदी से उबरने के जो भी रास्ते बने हैं उसमें रोज़ग़ार के अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं. मंदी से उबरने के जिस भी रास्ते में रोज़ग़ार के अवसर नहीं बनते उसका मतलब होता है उपभोक्ताओं की ओर से कमज़ोर माँग."

उनका कहना है कि अगर रोज़ग़ार की दर नीची रही तो एक घर की कुल आय पर असर होगा और उन हालात में उपभोक्ता माँग भी कम ही रहेगी. इस स्थिति में मंदी से उबरने की रफ़्तार पर असर पड़ सकता है.

रोज़ग़ार का संकट

मगर विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष शाहिद जावेद बर्की का कहना है कि मंदी से उबरने की प्रक्रिया में बेरोज़ग़ारी बढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है.

उनके अनुसार, "जब मंदी ख़त्म होती है तो बेरोज़ग़ारी उसके छह महीने बाद तक बढ़ती रहती है क्योंकि कंपनियाँ लोगों को नौकरियाँ देने में समय लेती हैं. हर मंदी में यही हुआ है."

अर्थव्यवस्था स्थिर हुई है और उबर भी रही है मगर सरकारों ने इस पूरे दौर में जिस तरह अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं में धन झोंका है, आर्थिक पैकेज दिए हैं उसके बाद अब जर्मनी या फ़्रांस जैसे देश उस रास्ते से हटना चाह रहे हैं.

दरअसल इन देशों का कहना है कि इस रास्ते पर चलने से सरकारों का ऋण बढ़ता है और साथ ही महँगाई की दर के बढ़ने का भी ख़तरा बना रहता है.

मगर इस पूरे संकट के दौरान भी और अब भी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि मंदी से उबरने की राह निकलेगी एशियाई देशों से और उसमें भी भारत और चीन की अहम भूमिका होगी.

भारत की राह

भारत और चीन पर इस मंदी का असर तो हुआ मगर इतना व्यापक नहीं रहा. जाने माने आर्थिक पत्रकार स्वामिनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर इस बारे में कहते हैं, "भारत की विकास दर छह प्रतिशत है जबकि चीन को छोड़कर किसी और की विकास दर इतनी नहीं रही. हम पर कम असर हुआ और आगे चलकर हालात सुधरेंगे ही."

Image caption चीन में अर्थव्यवस्था पर उतना बुरा असर नहीं हुआ जितना पश्चिमी देशों पर हुआ था

स्वामिनाथन अय्यर के अनुसार भारत के निर्यात में पिछले महीने कुल 19 प्रतिशत की गिरावट थी जो कि उससे पहले के महीनों में 30-32 प्रतिशत थी यानी अब निर्यात बढ़ा है.

वह कहते हैं, "अगर सकल घरेलू उत्पाद देखें तो वो ठीक हुआ है, शेयर बाज़ार ठीक हुआ है. मंदी के दौरान भारत से पिछले पूरे साल में अगर 12 अरब डॉलर निकला था तो इस साल की पहली छमाही में आठ अरब का निवेश लौट आया है."

आर्थिक विश्लेषक मानते हैं कि भारत इस साल छह से सात प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है, हालाँकि उसके सामने कमज़ोर मॉनसून का भी संकट है.

उधर चीन ने इस आर्थिक मंदी की स्थिति से निबटने के लिए काफ़ी बड़े आर्थिक पैकेजों की घोषणा की मगर कॉर्नेल विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर ईश्वर प्रसाद के मुताबिक़ चीन एक दुष्चक्र में फँस सकता है.

चीन का संकट

वह कहते हैं, "चीन की अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन इसलिए कर रही है क्योंकि वहाँ सरकार ने जो आर्थिक पैकेज दिया उसकी वजह से बुनियादी ढाँचे पर सरकारी ख़र्च बढ़ा. इसके साथ ही बैंक से ऋण मिलने में भी काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई. उसका मतलब हुआ कि कई सरकारी प्रतिष्ठान बड़े निवेश में धन लगाने में सफल हुए, इसलिए चीन की अर्थव्यवस्था में निवेश वृद्धि तो हुई है मगर उसकी वजह से रोज़ग़ार वृद्धि नहीं हुई."

Image caption भारत में विकास दर के छह से सात प्रतिशत तक रहने की संभावना है

डॉक्टर प्रसाद के अनुसार अब अगर चीन में उत्पाद बढ़ता रहा और रोज़ग़ार के मौक़े नहीं बढ़े, घर की कुल आय नहीं बढ़ी तो अर्थव्यवस्था निर्यात पर और निर्भर हो जाएगी.

चीन या और भी कई देश जिस निर्यात पर निर्भर करते हैं, उस निर्यात का आम तौर पर बड़ा केंद्र रहा है अमरीका या यूरोप. अब जबकि अमरीका और यूरोप की भी अर्थव्यवस्थाएँ धीरे-धीरे मंदी से उबर रही हैं वहाँ इन देशों से होने वाले निर्यात में इतनी जल्दी तेज़ी नहीं आएगी.

शायद ये भी एक वजह है कि अब देश एशियाई देशों में निर्यात की राह खोज रहे हैं. चीन भी अब दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों पर नज़रें लगाए है और वह उन देशों के साथ व्यापार और बढ़ाना चाहता है.

यानी कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर छाए काले बादल अब काफ़ी हद तक छँट चुके हैं मगर मंदी से उबरने की जो प्रक्रिया है उसमें बढ़ती बेरोज़ग़ारी जैसे संकट भी साथ जुड़े दिख रहे हैं. ऐसे में दुनिया को राहत की साँस लेने में अभी कुछ और वक़्त लग सकता है.

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