महंगाई से जल्द राहत नहीं

Image caption भारत में खाद्य पदार्थों में महंगाई बढ़ती ही जा रही है

इसे सूखे की मार कह लें या फिर सरकार की अदूरदर्शिता, आम आदमी को फ़िलहाल महंगाई से कोई राहत मिलती नज़र नही आ रही है.

हालांकि सरकार का बराबर ये दावा रहा है कि उसके पास अनाज के पर्याप्त भंडार हैं और चिंता की कोई बात नही है, पर अनाज और दालों की कीमतें आसमान छू रही हैं. मंहगाई ने चीनी की मिठास भी कम कर दी है.

अब केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने ये कह कर चिंता बढा दी है कि मंहगाई कुछ दिन और रहेगी.

केन्द्र सरकार जिस तरह के संकेत दे रही है उससे साफ़ है कि आने वाले दिन और मुश्किल होने वाले हैं.

सरकार लगातार ये दावा कर रही है कि उसके पास अनाज के पर्याप्त भंडार हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अनुमान है कि सूखे की मार के कारण भारत के चावल उत्पादन में ज़बरदस्त गिरावट आएगी.

अमरीका के चावल उत्पादक संगठन का मानना है कि भारत के चावल का आयात करने से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चावल के दाम बढ़ सकते हैं.

फिलीपींस में हुए एक सम्मेलन में ये अनुमान लगाया गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चावल के दाम बढ़ने तय हैं, क्योंकि अगले 4-5 साल भारत चावल निर्यात करने की स्थिति मे आता नज़र नही आ रहा है.

जानकारों के अनुसार भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी और एसटीसी ने चावल के आयात की प्रक्रिया भी शुरु कर दी है.

केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार इस तथ्य को नकार नहीं पाए, पर उन्होंने ये भी नहीं बताया कि ये कंपनी कितना चावल आयात करेगी.

शरद पवार का कहना था,'' हमें खुशी है अगर कुछ कंपनियां आयात करना चाहती हैं, पर किसी भी कंपनी को कोई कोटा नही दिया गया है कि किसको कितनी मात्रा में आयात करना है.''

अनुमान के अनुसार भारत को इस साल कम से कम 30 हज़ार टन चावल आयात करना पड़ेगा.

आयात

इसके अलावा खाने के तेलों की कीमतें भी कम होने के कोई आसार नही हैं.

इसका कारण है कि तिलहन के उत्पादन मे भी गिरावट का अंदेशा है और अनुमान है कि इसमे 25 लाख टन की गिरावट आ सकती है.

दालों के उत्पादन में भी लगभग साढे तीन लाख टन की कमी आ सकती है. भारत हर साल लगभग 35 लाख टन दाल आयात करता है.

अगली चिंता चीनी की है, भारत को इस साल 40 से 50 लाख चीनी आयात करनी होगी. लेकिन कुछ राज्यों मे किसान चीनी आयात का विरोध कर रहे हैं.

कृषि मंत्री शरद पवार ने चीनी आयात के विरोध को ग़लत बताया है और कहा है कि चीनी आयात के विरोध की बजाए किसानों को गन्ने की अधिक दाम देने के उपाय किए जाने चाहिए.

आर्थिक विशेषज्ञ डॉक्टर आलोक पुराणिक का कहना है,'' महँगाई के लिए एक स्तर पर सूखा और बाढ़ ज़िम्मेदार है लेकिन इसमें सरकार के कुप्रबंधन ने भी बड़ा योगदान दिया है.''

उनका कहना है कि यदि समय रहते सरकार स्थिति को भांप लेती तो आयात पर इतना पैसा खर्च नहीं होता और लोगों की जल्द राहत भी मिल जाती.

सरकारी अनुमान के अनुसार अनाज के उत्पादन में 210 लाख टन की कमी आने से आयात सरकार की मजबूरी है और आयात के कारण मंहगाई पर क़ाबू पाना शायद संभव नही हो पाएगा.

मतलब ये की आने वाले कम से कम कुछ महीने आम आदमी की नून तेल लकड़ी की लड़ाई आसान होने वाली नही.

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