संकट से जूझ रही है एयरलाइन कंपनियाँ

दुनिया भले ही आर्थिक सुस्ती को पीछे छोड़ रही हो लेकिन नागर विमानन एक ऐसा क्षेत्र है जहां संकट ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है.

भारत भी इससे अछूता नहीं है.

पहले तो एयर टर्बाइन इंधन (एटीएफ़) का दाम बढ़े फिर किराया कम करने की ऐसी होड़ मची कि परिचालन लागत के मुक़ाबले आमदनी कहीं पीछे छूट गई.

जब जुलाई में सभी निजी कंपनियों ने एक मंच पर आकर हड़ताल करने की धमकी दे डाली तो इस संकट की ओर सबका ध्यान गया. ये कंपनियाँ सरकार से आर्थिक पैकेज की माँग कर रही थी.

लेकिन ऐन मौके पर कंपनियों में फूट पड़ गई और सरकार ने भी साफ कर दिया कि उन्हें किसी तरह की आर्थिक मदद नही दी जाएगी जिसके बाद हड़ताल वापस ले ली गई.

हड़ताल का मौसम

Image caption एयर इंडिया को सरकार से भारी सहायता मिली थी.

फिर सितंबर का महीना एयरलाइन कंपनियों में हड़ताल वाला रहा. बढ़ते घाटे से परेशान जेट एयरवेज़ ने छंटनी का रास्ता अपनाया और चार चार पायलटों को बर्ख़ास्त कर दिया.

इसके विरोध में 400 पायलटों ने हड़ताल कर दी जिसे व्यापक समर्थन मिला और आख़िरकार कंपनी ने बर्ख़ास्त पायलटों की सेवा बहाल कर दी. हालांकि वेतन में कटौती हुई और ये कई अन्य कंपनियों में हुई.

इसी महीने के आख़िर में एयर इंडिया के पायलटों ने भी भत्तों में कटौती को लेकर हड़ताल की घोषणा कर दी और कटौती वापस लिए जाने के आश्वासन के बाद ही मामला शांत हुआ.

एयर इंडिया को वर्ष 2008-09 के दौरान लगभग 55 अरब रुपए का भारी घाटा हुआ है. आँकड़ों के मुताबिक कंपनी के राजस्व में 12 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई है.

वर्ष 2008 में इसकी आय लगभग 152 अरब रूपए थी जो 2009 में घट कर 134 अरब रूपए हो गई.

इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2009 में विमानन क्षेत्र को 11 अरब डॉलर का घाटा हो सकता है.

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