मंदी से उबरे शेयर बाज़ार

शेयर बाज़ार
Image caption शेयर बाज़ार वर्ष 2010 में फिर पुरानी ऊँचाई पर पहुँच सकता है.

वर्ष 2010 भारतीय शेयर बाज़ार के दो साल पुराने इतिहास को दोहरा सकता है.

इस मायने में कि जनवरी 2008 में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक सेंसेक्स ने 21 हज़ार से ज़्यादा अंकों के साथ अब तक के सर्वोच्च स्तर पर था.

लेकिन उसी साल वैश्विक आर्थिक सुस्ती की मार ऐसी पड़ी कि 2008 के आख़िर में यह आठ हज़ार से भी नीचे चला गया.

लेकिन साल गई, बात गई. वर्ष 2009 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए मानो नई सुबह के समान साबित हुआ.

मस्तानी चाल

मंदी के साए से भारतीय अर्थव्यवस्था उबरने लगी. नतीजा जब हम इस साल को अलविदा कह रहे हैं तब सेंसेक्स एक बार फिर 17 हज़ार अंकों के आस-पास है और तमाम विश्लेषकों की राय में इस दशक के अंतिम वर्ष यानी 2010 में यह फिर से 21 हज़ार के अपने सर्वोच्च स्तर को छू सकता है.

सेंसेक्स ने इस वर्ष 90 फ़ीसदी से ज़्यादा की बढोत्तरी दर्ज कराई है. हालांकि भारतीय शेयर बाज़ार सिर्फ़ अकेला बाज़ार नहीं है जो सरपट दौड़ रहा है.

सबसे पहले मंदी की चपेट में आई अमरीकी अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ रही है और वहां का सूचकांक डाउ जोंस और नैस्डैक में भी ज़बर्दस्त वृद्धि दर्ज की गई है. यही हाल यूरोपीय और बाकी एशियाई शेयर बाज़ारों का है.

भारतीय शेयर बाज़ारों को इस वर्ष हुए आम चुनावों से ज़बर्दस्त ताकत मिली जब मई में बिना वाम दलों के समर्थन वाली यूपीए सरकार का गठन हुआ.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के अगले ही दिन बाज़ार 1300 अंकों से ज़्यादा की बढ़त के साथ 13 हज़ार के आँकड़े को पार कर गया.

27 मई तक सरकार ने आर्थिक सुधारों के संकेत देने शुरु किए और इसी दिन सेंसेक्स 14 हज़ार के आँकड़े को पार कर गया.

इस बीच इस वर्ष कंपनियों के नतीजे भी बेहतर आए हैं. अमरीका और यूरोप में मंदी से सकते में आई भारतीय सूचना प्रोद्यौगिकी उद्योग भी अब धीरे-धीरे प्रगति कर रहा है.

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