दक्षिण अफ़्रीक़ा के सामने बड़ी चुनौती

प्रोफ़ेसर स्टीफ़ेन गेल्ब
Image caption विश्व कप के आयोजन से जहां एक ओर लोग ख़ुशियां मना रहें हैं वहीं कुछ लोग हो रहे ख़र्च पर चिंतित भी हैं

दक्षिण अफ़्रीक़ा में इन दिनों चारों ओर विश्व कप का ख़ुमार है. लेकिन इन सबके बीच आशंकाएँ भी हैं.

अर्थव्यवस्था कहाँ जाएगी. क्या देश ने ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च कर दिया है?

क्या बेरोज़गारी का दैत्य एक बार फिर निगलने के लिए तैयार बैठा है? या फिर कुछ उम्मीद की भी किरण है.

लेकिन इस मंदासुर ने सबसे ज़्यादा चोट कहाँ पहुँचाई, जोहानेसबर्ग विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर स्टीफ़ेन गेल्ब की मानें तो सबसे ज़्यादा असर रोज़गार पर पड़ा है.

बेरोज़गारी चिंता का विषय

स्टीफ़ेन गेल्ब कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय स्थिति के कारण हमें भी काफ़ी नुक़सान हुआ. हमारी आर्थिक प्रगति पर चोट पहुँची और सबसे ज़्यादा असर रोज़गार पर पड़ा. वर्ष 2009 में दो तिमाही तक देश की प्रगति नकारात्मक रही. लेकिन अब एक बार फिर हमारी प्रगति सकारात्मक हो गई है. लेकिन हमारे यहाँ लाखों लोगों की नौकरियां चली गई. और जिस देश में पहले से ही क़रीब 25 प्रतिशत बेरोज़गारी हो, उसके लिए यह बड़ा झटका था. और अब भी हमारे लिए यह बड़ी चिंता का विषय है."

वर्ष 2009 में दो तिमाही तक देश की प्रगति नकारात्मक रही. लेकिन अब एक बार फिर हमारी प्रगति सकारात्मक हो गई है. लेकिन हमारे यहाँ लाखों लोगों की नौकरियां चली गई. और जिस देश में पहले से ही क़रीब 25 प्रतिशत बेरोज़गारी हो, उसके लिए यह बड़ा झटका था. प्रोफ़ेसर स्टीफ़ेन गेल्ब

जब आप दक्षिण अफ़्रीक़ा के कई शहरों से गुज़रते हैं तो लगता है कि सरकार ने आधारभूत सुविधाओं पर बहुत काम किया है, लेकिन सार्वजनिक यातायात की सुविधाएँ अब भी काफ़ी कम है और कहीं न कहीं इससे कामकाज पर असर पड़ता है और आख़िरकार अर्थव्यवस्था पर भी.

ऐसा नहीं है कि रंगभेद का असर सिर्फ़ पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर रहा है. रंगभेद व्यवस्था की अगर सबसे बुरी विरासत देशवासियों को मिली है, तो वो है शिक्षा का स्तर. देश में शिक्षा में भी रंगभेद था और इससे निपटने में सरकार को अब भी जूझना पड़ रहा है.

एक और समस्या जिसने देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डाला है, वो है एड्स. अगर आँकड़ों की बात करें तो देश के आठ लोगों में से एक व्यक्ति एड्स से पीड़ित है. और ये काफ़ी भयावह स्थिति है. लेकिन सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए अच्छी पहल की है.

लेकिन क्या विश्व कप से देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर होगा. क्या सरकार ने जो इतने ख़र्च किए हैं, विश्व कप की बयार के बाद उससे निपटना संभव होगा. ये सवाल बहुत अहम है, जिससे हर अफ़्रीक़ी जूझ रहा है.

Image caption स्टेडियम की ख़ूबसुरती से सभी प्रभावित लेकिन कई लोगों ने इतने ख़र्च पर सवाल भी उठाए

जोहानेसबर्ग में एक कॉफ़ी शॉप चलाने वाली एनारो का सवाल आँखें खोलने वाला है.

विश्व कप से किसको फ़ायदा

एनारो पूछती हैं, "सरकार ने कई जगह सिर्फ़ दो या तीन मैचों के लिए इतनी बड़ी लागत से स्टेडियम क्यों बनवाए. इस देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें सहायता की आवश्यकता है. सरकार ने ऐसा क्यों किया."

क्या सरकार को इससे फ़ायदा हुआ है, इस मुद्दे पर सेंटर फ़ॉर इंडियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर दिलीप मेनन का मानना है कि इससे दक्षिण अफ़्रीक़ी सरकार को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है.

प्रोफ़ेसर मेनन कहते हैं, "सबको पता है कि सरकार को इससे कोई लाभ नहीं हुआ है. सरकार पर बहुत ज़्यादा क़र्ज़ है और रयान मलान नामक एक समाजशास्त्री ने कहा है कि इस क़र्ज़ को उतारने में कई पीढ़ी लगेगी. एक महीने में देश में ज़्यादा तब्दीली तो नहीं हुई है. टिकट कम बिक रहे हैं और होटल व्यवसाय भी बहुत फ़ायदे में नहीं."

सरकार दावा कर रही है इस विश्व कप से देश के सकल घरेलू उत्पाद में 0.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी.

लेकिन प्रोफ़ेसर दिलीप मेनन का कहना है कि विश्व कप से असल फ़ायदा तो फ़ीफा को हुआ है. उन्हें पिछले विश्व कप के मुक़ाबले दोगुना फ़ायदा हुआ है.

स्टीफ़ेन गेल्ब भी प्रोफ़ेसर मेनन की बात से सहमत हैं और कहते हैं कि सरकार ने फ़ीफ़ा से ग़लत डील की है. उन्होंने उम्मीद जताई कि फ़ीफ़ा अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अफ़्रीक़ा में फ़ुटबॉल की स्थिति और बेहतर करने में लगाएगा.

लेकिन काफ़ी शॉप चलाने वाली एनारो इस बात पर चिंतित हैं कि विश्व कप के बाद क्या होगा.

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