तिगुना करना होगा बैंकों को नकद रिज़र्व

Image caption भविष्य में वित्तीय संकटों के ख़तरे को कम करने के लिए बैंक प्रणाली में सुधार पर बल दिया जा रहा है.

केंद्रीय बैंकों के गवर्नर और बैंक नीति निर्माता अंतरराष्ट्रीय बैंकिग प्रणाली में सुधार के लिए नए नियमों पर राज़ी हो गए हैं.

बैंकिंग प्रणाली से जुड़े अधिकारियों की बैठक स्विटज़रलैंड में हुई और सुधारों का मुख्य उद्देश्य था भविष्य में वित्तीय संकटों के ख़तरे को कम करना.

इन नए नियमों के तहत बैंको को अभी के मुकाबले तिगुनी रकम अपने रिज़र्व में रखनी होगी.

इसे आठ साल के अंतराल में कई चरणों में लागू किया जाएगा.

बीबीसी के बिजनेस संपादक रॉबर्ट पेस्टन का कहना है कि बैंकिक प्रणाली की सुधार की दिशा में ये नया नियम एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है.

उनका कहना है कि इस नियम से बैंकों की घाटे का सामना करने की क्षमता बढ़ेगी और उन्हें सरकारी पैसे की मदद नहीं लेनी होगी.

ब्रिटेन की वित्तीय सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष लॉर्ड टर्नर का कहना है कि ये नए नियम, “विश्व वित्तीय मापदंडों पर मज़बूत लगाम का काम करेंगे और एक जूझारू विश्व बैंकिग प्रणाली की दिशा में एक बड़ी भूमिका अदा करेंगे.”

सुधार पर ज़ोर

विश्व वित्तीय संकट के बाद जी-20 देशों के नेताओं की बैठक में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में सुधार पर ख़ासा ज़ोर दिया गया था.

ये नए नियम उसी प्रक्रिया के तहत लाए जा रहे हैं.

बीबीसी के आर्थिक मामलों के संवाददाता एंड्रयू वाकर का कहना है कि बैंक रिज़र्व की रकम बढ़ाने से घबराते रहे हैं क्योंकि इससे उनके कार्यक्रमों पर तो रोक लगती ही है साथ ही अधिकारियों को दिए जानेवाले बोनस पर भी अंकुश लगता है.

लेकिन बैंक भी इस बात से सहमत हैं कि सुधार की ज़रूरत है.

और पूंजी की ज़रूरत

नए क़ानून के तहत बैंको को अब और पूंजी की ज़रूरत होगी.

इस नए प्रस्तावित क़ानून पर नवंबर में होनेवाली जी-20 की बैठक के दौरान फ़ैसला लिया जाएगा.

लेकिन कुछ आलोचकों का कहना है कि इस क़ानून से बहुत फ़र्क नहीं आएगा.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक पूर्व अर्थशास्त्री का कहना है कि ये क़ानून बड़े बैंको के लिए एक तरह की जीत ही है और अगर ये क़ानून रहता तब भी ये पिछले वित्तीय संकट को रोक नहीं सकता था.

कुछ बैंको को डर है कि इस नए क़ानून से कर्ज़ो में और कटौती हो जाएगी क्योंकि नकद रिज़र्व बढ़ाने का सबसे आसान तरीका वही हो सकता है.

नीति निर्माताओं का कहना है कि यही वजह है कि इस नियम को आठ साल के अंदर कई चरणों में लागू करने की बात है जिससे आर्थिक मंदी से उबरने की प्रक्रिया में रूकावट नहीं आए.

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