कपास की क़ीमतों में भारी उछाल

कपास

न्यूयॉर्क के इंटरकॉन्टीनेंटल एक्सचेंज में कपास की क़ीमतों में पिछले पंद्रह साल में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है.

कपास की क़ीमतें पिछले साल के मुक़ाबले दोगुनी हो गईं हैं. ये लगभग 90 रुपए प्रति किलो के स्तर पर पहुँच गईं हैं.

इसकी मुख्य वजह मांग के मुताबिक आपूर्ति में कमी बताई जा रही है क्योंकि कपास का स्टॉक काफी कम हो गया है.

भारत द्वारा निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध को भी इसकी मुख्य वजह माना जा रहा है.

रही सही कसर पाकिस्तान में आई भयानक बाढ़ ने पूरी कर दी जिसकी वजह से वहां बडे़ पैमाने पर कपास की फ़सल बर्बाद हो गई है.

पाकिस्तान कपास का दुनिया में चौथा सबसे बडा़ उत्पादक है.

क़ीमतें और बढ़ने की उम्मीद

हालांकि पिछले एक दशक में तय मानकों के हिसाब से कपास की क़ीमतें बढ़ी ज़रूर हैं लेकिन जब लंबे समय के रुझानों की तुलना में ऐसा नहीं लगता कि बढ़ोत्तरी बहुत ज़्यादा हुई है. मसलन वर्तमान मूल्य लगभग वैसा ही है जैसा कि 1980 में था.

इसलिए वास्तविक स्तर पर मुद्रास्फीति के आधार पर देखें तो पता चलता है कि कपास के किसानों को आज मिलने वाला लाभ तीस वर्ष पहले की तुलना में काफ़ी कम है.

बावजूद इसके कपास की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी उनके लिए एक खुशख़बरी है.

कपास अफ्रीका और एशिया के कई देशों के साथ अमरीका की भी प्रमुख फ़सल है जहां सरकार इसके उत्पादन पर भारी सब्सिडी देती है.

लेकिन कपास की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी वस्त्र उद्योग के लिए शुभ समाचार नहीं है जो कि चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे कई विकसित देशों के लिए रोज़गार की दृष्टि से एक बड़ा क्षेत्र है.

ब्रिटिश मीडिया में इस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि इसकी वजह से कपड़ों की क़ीमतों में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है.

लेकिन बड़े ब्रांड के महंगे कपड़ों की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी की उम्मीद बहुत कम है क्योंकि इनके महंगे होने के पीछे कच्चे कपास के दाम की भूमिका बहुत कम होती है.

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