राष्ट्रमंडल खेलों का भारी आर्थिक असर

Image caption राष्ट्रमंडल खेलों का भारत के सकल घरेलू उत्पाद पर लगभग पांच अरब डॉलर का प्रभाव पड़ेगा

भारत में हो रहे राष्ट्रमंडल खेलों का भारत के सकल घरेलू उत्पाद पर चार अरब 94 करोड़ डॉलर का आर्थिक प्रभाव पड़ेगा.

खेलों की आयोजन समिति के दस्तावेज के अनुसार इन खेलों से 2008 और 2012 के बीच 24,70000 नौकरियों के अवसर पैदा होंगे.

ये आंकड़े राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति की एक रिपोर्ट में प्रकाशित हुए हैं.

रिपोर्ट का कहना है कि भारत पर होने वाले आर्थिक प्रभाव पिछले राष्ट्रमंडल खेलों के मुक़ाबले बहुत अधिक होंगे.

मेलबॉर्न में 2006 में हुए खेलों का ऑस्ट्रेलिया के सकल घरेलू उत्पाद पर एक अरब 60 करोड़ डॉलर का असर पड़ा था.

आयोजन समिति के इस दस्तावेज़ का कहना है, “इन खेलों के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव बहुत सराहनीय होंगे क्योंकि इनसे बाल शिक्षा का स्तर सुधारने की प्रेरणा मिलेगी, खेल गतिविधियां बढ़ेंगी, देश के नागरिकों की जीवन शैली में सुधार होगा, अंतरराष्ट्रीय मान्यता बढ़ेगी और समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलेगी”.

लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि दिल्ली निवासियों को राष्ट्रमंडल खेलों के लिए किए गए विकास कार्यों का अगले 25 से 30 सालों तक भारी ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा.

दिल्ली में ज़मीन, मूलभूत उत्पादों और पैट्रोल के दाम बढ़ने से हरेक दिल्ली वासी पर असर पड़ेगा.

‘हेरिटेज गेम्स’ शीर्षक से छपी इस रिपोर्ट का दावा है कि जिन देशों ने ओलम्पिक, विश्वकप या राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया है वो भारी क़र्ज़ में डूबे हैं.

ग्रीस में आए आर्थिक संकट का एक कारण चार साल पहले एथेंस में हुए ओलम्पिक खेलों को बताया गया जिसमें 16 अरब 60 करोड़ डॉलर का ख़र्च आया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीस की तरह मैक्सिको, सोल, बारसेलोना और सिडनी को भी लाखों डॉलरों का नुकसान उठाना पड़ा है.

राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति ने भारतीय व्यापार संघ फ़िकी की साझेदारी में कॉमनवैल्थ बिज़नेस क्लब इंडिया या सीबीसीआइ का गठन किया था. जिससे भारतीय खेलों के प्रचार और मार्केटिंग में भारतीय औद्योगिक समुदाय की हि्स्सेदारी को प्रेरित किया जा सके.

दस्तावेज़ कहता है कि इसका उद्देश्य था खेलों की स्पॉंसरशिप बढ़ाना और भारत को समूचे राष्ट्रमंडल में एक अच्छे व्यापारिक साझेदार के रूप में पेश करना.

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