जेब पर भारी पड़ी महंगाई

बढ़ती महंगाई
Image caption तेल की क़ीमतों और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.

दुनियाभर में लोग तेल और खाद्यान्नों की बढ़ती क़ीमतों से जूझ रहे. संयुक्त राष्ट्र खाद्य सूचकांक पिछले महीने अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है.

खाद्य और कृषि संगठन के एक अधिकारी ने चेतावनी दी है कि अगर क़ीमतें ऐसी ही रहीं तो कम आय वाले देशों की दिक्क़ते बढ़ जाएंगी.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन का कहना हैं कि 2008 में जब खाद्य संकट आया था और इस पर दंगे भड़क गए थे, सूचकांक उस स्तर से भी ऊपर रहा है.

खाने-पीने के सामान की बढ़ती क़ीमतें एक बार फिर कम कमाने वाले लोगों की जीविका को ख़तरे में डाल रही हैं.खाद्यानों की क़ीमत में ख़ासकर बढ़ोतरी देखी गई पर अभी ये उतनी ऊँची नहीं है जैसे कि पहले थी.

चीनी और तिलहन की क़ीमतें सबसे ज़्यादा बढ़ी है.खाद्य और कृषि संगठन के एक अधिकारी ने हालांकि चेतावनी दी है कि अगर क़ीमतें ऐसी ही रहीं तो कम आय वाले देशों की दिक्क़ते बढ़ जाएंगी.

तेल में तेज़ी

वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ती तेल कीमतों से बड़ा ख़तरा हैं.अंतरराष्ट्रीय उर्जा एजेंसी, आईएईए ने एक बार फिर अपनी चेतावनी दोहराई हैं.

संगठन का कहना है कि पिछले साल मुख्य विकसित देशों की तेल का बिल 200 अरब डॉलर बढ़ा हैं.

दुनिया में उर्जा की खपत और उससे जुड़े सभी मामलों पर नज़र रखने वाले इस संगठन का कहना हैं कि तेल की क़ीमतें ख़तरनाक स्तर पर पहुँच रही हैं.

अंतरराष्ट्रीय उर्जा एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री फतीह बिरोल ने फाइनेन्शियल टाइम्स अख़बार को कहा हैं कि तेल का आयात बिल के बढ़ने के कारण जल्द ही अर्थव्यवस्थाओं बीमार पड़ जाएँगी.

तेल की क़ीमत 89 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है.

अब आईएईए तेल उत्पादकों पर दबाव डाल रहा है कि वो स्थिति को समझे और तेल का उत्पादन बढ़ाएँ ताकि तेल की क़ीमतें कम की जा सकें.

भारत और चीन में बढ़ी मांग

अंतरराष्ट्रीय उर्जा एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री फतीह बिरोल का कहना था कि समस्या ये है कि दुनिया भर में तेल की ख़पत बढ़ रही हैं.सबसे ज़्यादा तेल की ख़पत चीन, भारत और मध्यपूर्व में हो रही हैं.

पिछले सात तिमाही में दुनिया भर में तेल की मांग का 70 प्रतिशत हिस्सा भारत और चीन से आया और फिर मध्यपूर्व का नंबर था.

पर इन तीनों जगह बढ़ती क़ीमतों का मांग पर कोई असर नहीं दिखा और इसके भी कारण अलग अलग हैं.

चीन और भारत में अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से बढ़ रहीं हैं कि क़ीमतों का असर महत्वपूर्ण नहीं रहा.

अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, जेबें बड़ीं हो रहीं हैं और खर्च का बढ़ा हिस्सा तेल पर ख़र्च हो रहा हैं. पर बढ़ती अर्थव्यवस्था में इसका असर कम नज़र आ रहा हैं.

दूसरा कारण है कि तेल पर बहुत सब्सिडी दी जाती है.क़रीब 15अरब डॉलर हर साल तेल उत्पादों पर रियायतों के रुप में दिया जाता है इसलिए उपभोक्ताओं पर इसका असर कम होता है.

यही हाल मध्यपूर्व में भी है. साथ ही यहां लोगों की आमदनी भी ज़्यादा हैं.

औरगेनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनोमिक कोओपरेशन एंड डेवलपमेन्ट के सदस्य देशों जैसे अमरीका में भी आर्थिक विकास दर में गिरावट है.

अगर उत्पादन और उपभोग, दोनों में बदलाव नहीं लाया गया तो समस्या आज से भी ज़्यादा विकराल हो जाएगी.

चीन में 11 प्रतिशत की विकास दर है और फतीह बिरोल का मानना है कि अगले दस सालों में भी ये आठ प्रतिशत के आसपास रहेगी.

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