कितना प्रासंगिक है रुपया भारत में ही?

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जुलाई, 2010 में भारत देवनागरी लिपि और अंग्रेजी अक्षर के अदभुत मिश्रण वाले रुपये के प्रतीक चिह्न को अपनाकर विश्व की प्रमुख मुद्राओं वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है.

ऊपर की तरफ दो समानांतर रेखाएं और उनके बीच का खाली स्थान तिरंगे का आभास देते हैं. भारतीय रुपये का प्रतीक चिह्न हमारी अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत और हमारी आर्थिक शक्तियों के लिए वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक है.

जब हम अपनी अर्थव्यवस्था की विकास का जश्न मना रहे हैं तो ऐसे में भारतीय रुपया जिस प्रतीक और घटक का प्रतिनिधित्व करता है, उनका हमारी सरकार की नीति में पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया है.

हालांकि भारतीय रुपया पूरी तरह से वैध मुद्रा के रूप में पूरे देश में प्रचलित है परंतु यह कुछ क्षेत्रों में जैसे हमारे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के डयूटी फ्री शॉप के सुरक्षित क्षेत्र में अनुपयोगी बन कर रह गया है जहां एक यादगार उक्ति ''शो मी द मनी'' लिखी रहती है जो पूर्णतः नये अर्थ का आभास कराती है. आप जो चाहते हैं वो खरीद सकते हैं.

Image caption केवल चिन्ह से ही महत्व नहीं बढ़ जाता है

लेकिन यदि आप विदेशी हैं तो बिलिंग सहायक आपसे रोकड़ या कार्ड की मांग करता है, भूल से भी भारतीय मुद्रा देने का प्रयास न करें क्योंकि ये स्वीकार्य नहीं हैं. आप खरीदारी कर सकते हैं मगर खरीददारी के लिए भुगतान करने के लिए अपने पास क्रेडिट कार्ड या विदेशी मुद्रा अवश्य रखें.

क्या ऐसा कोई दूसरा देश है जो अपनी मुद्रा का इतना तिरस्कार करता है, जैसे कि हम अपने रुपए का अपने ही देश में करते हैं? मेरे विचार से नहीं. दूसरे देशों में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डो पर कीमतें स्थानीय मुद्रा में अंकित होती हैं और इनका भुगतान भी स्थानीय मुद्रा में ही किया जाता है. बड़े और छोटे देशों में केवल एक हमारा देश ही ऐसा देश है जो अपनी मुद्रा को पूरा सम्मान नहीं देता है और भुगतान के रूप में रुपए को स्वीकार करने से इंकार कर देता है.

विदेशी पर्यटकों के लिए अतुल्य भारत उस समय हास्यास्पद भारत बन जाता है जब वे भारत में अपने यादगार प्रवास से वापस लौटने पर कहते हैं कि जिस भारतीय रुपये का उन्होंने पूरे प्रवास के दौरान जमकर उपयोग किया वही रुपया एयरपोर्ट डयूटी फ्री शॉप में अमान्य हो जाता है.

कुछ ऐसे यात्रियों की कल्पना कीजिए जो एक किनारे पर उत्तेजित होकर खड़े हैं और कुछ हजार रुपये की भारतीय मुद्रा को एक वास्तविक याद के रूप में अपने वतन ले जाते हैं.

मुद्रा बदलवाने की ज़रूरत

वे खरीदे गए सामान के लिए अपने पास पड़ी भारतीय मुद्रा में भुगतान नहीं कर सकते हैं. उन्हें कमीशन देकर भारतीय मुद्रा को विदेशी मुद्रा में बदलना पड़ता है.

इस प्रकार उनको दोहरी मार झेलनी पड़ती है क्योंकि भारत में आने पर भी उन्होंने विदेशी मुद्रा को भारतीय मुद्रा में बदलवाने के लिए कमीशन का भुगतान करना पड़ा था. प्रस्थान के समय वे इसे खर्च करने की आजादी के स्थान पर उन्हें खर्च करने से पहले इसे बदलवाना पड़ता है.

यदि विदेशी यात्री इस कारण से खरीददारी नहीं करने का निर्णय लेता है कि वह अपने पर्स से भारतीय मुद्रा को खर्च नहीं कर सकता है तो आर्थिक संदर्भ में इसके क्या मायने हो सकते हैं या हमारी मेहमाननवाजी वाले देश की छवि को इससे क्या नुकसान हो सकते हैं?

ऐसे नियमों के पीछे क्या नीतिगत विवशताएं हैं? जब विदेशी पर्यटक या कारोबारी यात्री भारत में अपने प्रवास के दौरान, खाने और खरीददारी पर पैसा खर्च करता है तो यह पैसा हमारी अर्थव्यवस्था में प्रवाहित होता है. तो एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर किसी विदेशी नागरिक के पास मौजूद पैसे का रंग समस्या कैसे बन जाता है? भारत में खर्च किए जा रहे रुपये को लेने में क्या नुकसान है?

पुराना क़ानून

आज जब हम विश्व की सर्वोत्तम सुविधाओं की तुलना में अत्याधुनिक सुविधाओं और सेवाओं से सुसज्जित हवाई अड्डे का निर्माण कर रहे हैं तो यह क़ानून अप्रासंगिक और पुराना सा लगता है.

भारत एक करोड खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था है जिसकी विकास दर लगभग नौ प्रतिशत है और इसका आरक्षित विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 300 अरब डॉलर का है. भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को हर जगह देखा और अनुभव किया जा सकता है. अर्थिक सामर्थ्य और वित्तीय ताकत के रूप में देश के आत्मविश्वास के लिए हमें डयूटी फ्री शॉप में हमेशा भारतीय मुद्रा का उपयोग करना चाहिए. यह कदम हाल ही में हमारे द्वारा अपनाए गए रुपये के प्रतीक चिह्न के क्रम में होगा; यह हमारी मुद्रा की व्यापकता को और व्यपाक बनाएगा और इसकी विशिष्ट पहचान में वृद्धि करेगा.

अपनी ही मुद्रा अस्वीकार्य

जब शेरशाह सूरी ने 16वीं शताब्दी पूवार्ध में प्रथम रुपए की शुरूआत की थी तो शायद उसने भी नहीं सोचा होगा कि पांच सौ साल बाद हमारी मुद्रा हमारे ही देश के कुछ हिस्सों में अस्वीकार्य हो जाएगी.

एयरपोर्ट डयूटी फ्री शॉप में भारतीय नागरिकों को भारतीय मुद्रा का उपयोग करने देने के लिए मैं सभी स्टैकहोल्डरों और नितिनिर्माताओं-वित्त मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक को लगातार पांच वर्षों से लिख रहा हूं. नीति में उक्त बदलाव को सितंबर, 2005 में अधिसूचित किया गया था. मुझे आशा है कि इस पक्षपाती नीति को नियम पुस्तिका से हटाने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा.

रुपये का नया प्रतीक चिह्न समानता का प्रतीक भी है. वक़्त आ गया है, जब हम मेरे और उसके रुपए में भेद करना बंद करें. भारत में हम INR को कहीं भी और कभी भी स्वीकार करते हैं.

(लेखक संसद सदस्य हैं जो हरियाणा के कुरूक्षेत्र संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.)

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