एशियाई कार उद्योग का चेहरा बनता भारत

नैनो कार

पनामा पंजीकृत एम वी मॉडर्न पीक जहाज़ तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के उत्तर में स्थित ऐन्नोर बंदरगाह की तरफ़ बढ़ता है. इस बंदरगाह को हाल ही में बनाया गया है.

ये एक कोरियाई जहाज़ है जो बांग्लादेश के चटगाँव से यहाँ पहुँचा है, ख़ाली. इसमें भरे जाने के लिए इंतज़ार कर रही हैं चमचमाती निसान माइक्रा कारें जिन्हें सिगापुर भेजा जाना है.

इस कोरियाई जहाज़ का कप्तान बताता है कि सिंगापुर से ये कारें लेबनान, इसराइल और उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों को जाएंगी.

वैसे को निसान कार बनाने वाली कंपनी जापानी है लेकिन लेकिन ये चेन्नई के इस बंदरगाह से क़रीब साठ किलोमीटर दूर एक फैक्टरी में बनाई जाती हैं जो भारत में निसान की निर्माता कंपनी है.

क़रीब 600 एकड़ में फैली ये फैक्टरी एक साल पुरानी भी नहीं है और निसान के दुनिया भर में स्थित सबसे बड़ी फैक्टरियों में से एक है. उच्च तकनीक से लैस इस फैक्टरी में भारत के हुनरमंद कामगार निसान के ताज़ा कार मॉडलों को जोड़कर कार का रूप देते हुए देखे जा सकते हैं.

सिर्फ़ निसान ही नहीं, अन्य बहुत सी एशियाई कंपनियों ने भी इस क्षेत्र में अपनी वाहन निर्माण फैक्टरियाँ बनाई हैं.

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Image caption भारत में अनेक विदेशी ब्रांड की कारें बनाई जाने लगी हैं

अगर व्यस्त सड़क को पार करते हुए आप आगे बढ़ें तो आप देखेंगे कि ह्यूंडाई, सैमसंग, मित्सुबिशी और मैरियाड जैसी कंपनियों की फैक्टरियाँ जैसे क़तार लगाए हुए अपना काम कर रही हैं.

भारत में निसान के प्रबंध निदेशक किमीनोबू तोकूयामा कहते हैं, "भारत के एक तेज़ी से बढ़ता बाज़ार है इसलिए बड़ी कार निर्माता कंपनियों के लिए यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है."

लेकिन इन कंपनियों की नज़र सिर्फ़ भारत के घरेलू बाज़ार पर नहीं है, बल्कि ये कंपनियाँ भारत को अपनी निर्माण गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं जहाँ अन्य देशों के मुक़ाबले सस्ते में कारें बनाकर बिक्री के लिए विदेशों को भेजी जाती हैं.

किमीनोबू तोकूयामा बताते हैं, "हम भारत में कारें बनाकर यूरोप, अफ्रीका, मध्य पूर्व और अन्य स्थानों को भेज रहे हैं."

समझ बन रही है

इससे पहले सिर्फ़ पश्चिमी देश ही मुख्य रूप से भारत के साथ कारोबार करते थे. बाक़ी एशियाई देशों ने भारत को नज़रअंदाज़ कर रखा था. इन एशियाई देशों के लिए भारत एक ऐसा देश था जिसे या तो वो समझते नहीं थे या फिर वो उसके साथ कोई कारोबार नहीं करना चाहते थे.

Image caption भारत से बहुत सी कारें विदेशों को भेजी जाती हैं

अब जबकि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से प्रगति कर रही है और कारोबार के अवसर पैदा हो रहे हैं तो भारत में अनेक एशियाई देश भी कारोबार करने में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं, इनमें ख़ासतौर से कोरियाई और जापानी कंपनियाँ प्रमुख हैं.

अकेले चेन्नई में ही लगभग 3000 छोटी-बड़ी कोरियाई कंपनियाँ अपना कारोबार कर रही हैं.

किसी कामकाजी दिन की शाम को सियोल रेस्तराँ में ख़ासी हलचल होती है जहाँ चकाचौंध रौशनी में लोग तरह-तरह के खाने का स्वाद चख रहे होते हैं.

कंपनियों के बड़े अधिकारी तक़रीबन सभी एशियाई हैं, हालाँकि कुछ यूरोपीय भी हैं और थोड़े से भारतीय भी. ये लोग भुना हुए कोरियाई गोश्त का मज़ा लेते देखे जा सकते हैं.

एक बड़े प्राइवेट डाइनिंग कमरे में कोरियाई और भारतीय अधिकारियों का एक बड़ा दल खाने के लिए उतावला बैठा हुआ है. खाने की मेज़ तरह-तरह के व्यंजनों से भरी हुई है और मदिरा तो जैसे लबालब है.

के एच शिन चेन्नई में आठ साल से रह रहे हैं वो बाक़ी लोगों को एक ताज़ा हिंदी फिल्मी गीत का अपना रूप सुनाकर अभिभूत कर रहे हैं. उन्हें ख़ूब शाबाशी भी मिलती हैं.

के एच शिन कहते हैं, "यहाँ रहना और काम करना बहुत आसान नहीं है. यहाँ की भाषा, खावना और संस्कृति हमारे लिए बहुत भिन्न है. लेकिन हम कोरियाई लोग भी समायोजन करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. हम भी भारतीय लोगों को अपनी संस्कृति, खाना और भाषा से वाकिफ़ कराना चाहते हैं, इस तरह से हम नए दोस्त बना सकते हैं. "

चेन्नई में कुछ रेस्तराओं के अलावा कुछ कोरियाई सुपरमार्केट भी हैं, एक कोरियाई चर्च है और सांस्कृतिक केंद्र भी है जहाँ कोरियाई भाषा, नृत्य और ताईक्वांडो सिखाए जाते हैं.

मुनाफ़ा कमाना

Image caption कई बड़ी कार कंपनियों ने भारत में अपना संयंत्र लगा लिया है

लेकिन ये एक तरफ़ा चलन नहीं है. भारत को हालाँकि लंबे अरसे से सूचना प्रोद्योगिकी में अग्रणी माना जाता रहा है लेकिन निर्माण उद्योग में भी भारत की ख़ासी लंबी परंपरा रही है. अब इस परंपरा का इस्तेमाल भारत अपनी अर्थव्यवस्था को फ़ायदा पहुँचाने के लिए करने लगा है.

सुंदरम फ़ास्टनर्स 100 साल पुरानी कंपनी है जो वाहनों के पुर्ज़े बनाती है. ये जनरल मोटर्स, फ़ोर्ड और क्राइसलर जैसी विशालकाय कंपनियों को वाहनों के पुर्ज़े बनाकर देती है. छह साल पहले इन्होंने अपनी एक फैक्टरी चीन में भी खोली है.

कंपनी के चेयरमैन सुरेश कृष्णा कहते हैं, "चीन के बाज़ार में भी क़दम रखना हमारी रणनीति का हिस्सा है. हमारी नज़र आज से 25 साल बाद के चीन पर है. हम जानते थे कि शुरू में तो कुछ परेशानियाँ होंगी ही क्योंकि चीन के लोगों को ये देखने की आदत नहीं रही है कि वहाँ भारतीय लोग जाकर रहें और कारोबार करें."

"लेकिन चीन में फैक्टरी स्थापित करने के फ़ायदे नज़र आने लगे हैं. पिछले क़रीब एक साल में हमने मुनाफ़ा कमाना शुरू कर दिया है. ये इसलिए अहम है क्योंकि ज़्यादातर विदेशी कंपनियाँ चीन में फ़ायदा नहीं कमा पा रही हैं."

1990 के दशक से ही दुनिया के देश भारत की तरफ़ आने वाले रास्ते पर नज़रें तो जमाए हुए थे लेकिन अब ये समझ भी फैलने लगी है कि भारत का भविष्य एशिया महाद्वीप से जुड़ा हुआ नज़र आता है.

भारत के साथ साझेदारी और कारोबार बढ़ाने वाली ये समझ अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का रास्ता तैयार करने की क्षमता रखती नज़र आने लगी हैं.

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