भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियां

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Image caption भारत में पिछले एक साल में मंहगाई में भारी बढ़ोतरी हुई है.

भारतीयों के लिए ये विडंबना ही थी कि पिछले शुक्रवार को जब तेल की क़ीमतों में वैश्विक स्तर पर गिरावट हुई तो सरकार डीज़ल, केरोसीन और एलपीजी की क़ीमतें बढ़ा रही थी.

सरकार के इस क़दम से एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में महंगाई और बढ़ने वाली है. देश में थोक क़ीमतें पहले ही बढ़ कर 9.1 प्रतिशत पर पहुंच गई हैं और लगता है कि जल्दी ही ये और ऊपर पहुंचेंगी.

बढ़ती महंगाई से विकास में बाधा पहुंच रही है. सरकार को लगता है कि अप्रैल 2012 तक विकास दर घटकर 7.5 प्रतिशत से आठ प्रतिशत तक रह जाएगी जो 2010-11 में 8.5 प्रतिशत थी.

शायद इसी कारण से स्टॉक मार्केट भी मंदी की चपेट में है. सीधे और पोर्टफोलियो के ज़रिए निवेश करने वाले विदेशी निवेशक भी अब दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था में पैसे लगाने से हिचक रहे हैं.

संकेत

इस समय स्टॉक मार्केट भी निचले स्तर पर ही है और इसके ऊपर जाने के संकेत हैं.

औद्योगिक उत्पादन धीमा हो गया है. इतना ही नहीं देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी गिरावट हुई है.

2009-10 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 25 अरब डॉलर था जो इस वर्ष घटकर 19 अरब डॉलर हो गया है.

ज़ाहिर है इसके लिए अंदरूनी और बाहरी कारण ज़िम्मेदार हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चेतावनी दी है कि देश के आर्थिक विकास को मंहगाई के कारण ‘बड़ा ख़तरा’ है.

भारत के गरीबों के लिए और भी बुरी स्थिति है. जहां चार में से एक आदमी एक डॉलर से भी कम पैसे में एक दिन बिता रहा है वहां मंहगाई की सबसे बड़ी मार खाद्य पदार्थों पर पड़ रही है. प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ, सब्ज़ियां, फल और डेयरी उत्पाद सबसे अधिक मंहगे हुए हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की बढ़ती क़ीमतें भी मंहगाई को बढ़ा रही हैं. भारत अपनी तेल ज़रुरतों का 84 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है.

सरकार का कहना है कि वो तेल की क़ीमतें बढ़ाने पर बाध्य हुई है क्योंकि आयातित तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं जिसके कारण सरकारी तेल शोधन कंपनियों और मार्केटिंग को नुकसान हो रहा है.

नियंत्रण

महंगाई पर नियंत्रण के लिए देश में मौद्रिक नीति को कसा गया है और ब्याज़ दरें मार्च 2010 से अब तक दस बार बढ़ाई जा चुकी हैं.

माना जाता है कि ब्याज़ दरें बढ़ने से लोग बैंकों से कर्ज़ कम लेंगे और निवेश कम होगा जिससे क़ीमतों पर काबू पाया जा सकेगा.

वर्ष 2008 में जब वैश्विक मंदी का दौर था तो भारत सरकार ने गांवों में विकास योजनाएं चलाई थीं जिससे काफी लोगों को लाभ हुआ और देश मंदी की चपेट में आने से बच गया.

मंदी से पहले अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले चार वर्षों से नौ प्रतिशत रही थी सिर्फ़ 2008-09 को छोड़कर जब यह दर 6,5 प्रतिशत पर पहुंची और उसके अगले साल आठ प्रतिशत रही.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की लगातार इस बात के लिए आलोचना होती रही है कि वो मंहगाई पर काबू नहीं कर पा रहे हैं ख़ास कर खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों पर.

पिछले कुछ समय में सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे हैं जिससे उसकी छवि भी ख़राब हुई है.

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