मेट्रो योजना पर चढ़ा राजनीति का रंग

Image caption विरोध करने वालों का कहना है कि मेट्रो से हैदराबाद की ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट हो जाएँगी

हैदराबाद में 12 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक खर्चे से बनने वाली मेट्रो रेल परियोजना को कई ओर से कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. हैदराबाद के दो सौ वर्ष पुराने सुल्तान बाज़ार इलाके के व्यापारियों की समिति ने इस परियोजना के ख़िलाफ़ शुक्रवार को बंद का आह्वान किया है.

पर्यावरण और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और व्यपारियों के बाद अब राजनीतिक दल भी इसके विरोध में शामिल हो गए हैं.

अब यह पूरा मामला क्षेत्रीय रंग लेता दिखाई दे रहा है क्योंकि तेलंगाना वादी दलों का कहना है की इस परियोजना का मकसद हैदराबाद के ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट कर देना है.

सुल्तान बाज़ार परिरक्षण समिति के संयोजक गोविन्द राठी ने कहा है कि इलाके के निवासी और व्यापारी किसी कीमत पर मेट्रो लाइन को उस इलाके से गुज़रने नहीं देंगे चाहे इसके लिए उन्हें खून ही क्यों न बहाना पड़े.

राठी ने बीबीसी से कहा, "अगर यह लाइन इस इलाके से गुज़रती है तो हज़ारों लोगों का रोज़गार नष्ट हो जाएगा. हम कह रहे हैं कि अगर इस लाइन को यहाँ से ले जाना ही है तो सरकार को भूमिगत लाइन बिछानी चाहिए या फिर उसका रास्ता बदल देना चाहिए. लेकिन सरकार हमारी बात सुनने के मूड में ही नहीं है".

स्थानीय लोगों का विरोध

इसी समिति के सचिव किशन यादव ने कहा कि परियोजना से इस इलाके में दस हज़ार परिवार प्रभावित होंगे, सैंकड़ों दुकानें उजड़ जाएँगी और फ़ुटपाथ पर व्यापार करने वाले तीन हज़ार लोग बेरोज़गार हो जाएंगे.

इन व्यापारियों के अनुसार उस तंग इलाके में मेट्रो रेल लाइन की ज़रूरत ही नहीं है और कई दूसरे ऐसे इलाके हैं जहाँ इसकी ज्यादा ज़रुरत है.

इधर मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी और हैदराबाद के दो मंत्री डी नगेंदर और मुकेश गौड़ ने कहा है की मेट्रो परियोजना हर कीमत पर बनेगी और अगर कोई उसे रोकने की कोशिश करता है तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

इस पर व्यापारियों ने कड़ी प्रतिक्रया देते हुए बंध का आह्वान किया है और अपनी इस लड़ाई में तेलंगना राष्ट्र समिति जैसे कुछ ऐसे संगठनों के शामिल कर लिया है जो तेलंगाना राज्य के लिए लड़ रहे हैं.

टीआरएस के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव ने राज्य सरकार से मांग की है कि वो इस परियोजना पर विचार के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाए. उनका कहना है कि न केवल सुल्तान बाज़ार में बल्कि हैदराबाद नगर के कई दूसरे भागों में भी इस परियोजना के कारण ऐतिहासिक स्मारक बर्बाद हो जाएँगे और हैदराबाद का अतीत मिट कर रह जाएगा.

इसी आधार पर कई प्रयावरण और दुसरे कार्यकर्ता भी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं.खुद व्यापारी भी मानते हैं कि सरकार की ज़िद्द के कारण यह मुद्दा अब राजनीतिक और क्षेत्रीय रंग ले सकता है.

'समस्या सुलझा ली जाएगी'

राज्य सरकार पहले ही इस परियोजना के निर्माण का का एल एंड टी कंपनी को दे चुकी है और वो काम शुरू करने की तैयारी में लगी है.

हैदराबाद मेट्रो रेल के अध्यक्ष एन वी एस रेड्डी का कहना है की इस योजना का विरोध उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना कि उसे बताया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि केवल आधे किलोमीटर की लंबाई तक ही इस का विरोध किया जा रहा है जबकि हैदराबाद मेट्रो रेल की कुल लंबाई 71 किलो मीटर है.

हैदराबाद मेट्रो रेल के अध्यक्ष का कहना है कि शहर के इतिहास में किसी परियोजना के लिए ज़मीन के लिए सबसे ज़्यादा मुआवज़ा अदा किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि जिन लोगों की संपत्ति प्रभावित हो रही है उन्हें 45000 या पचास हज़ार रुपये प्रति गज के हिसाब से पैसे दिए जा रहे हैं.लेकिन गोविन्द राठी कहते हैं कि ये केवल पैसे का सवाल नहीं है बल्कि हैदराबाद के इतिहास और संस्कृति का भी सवाल है.

दोनों ही पक्षों के कड़े तेवर से ऐसा लगता है की यह टकराव और भी बढ़ेगा और हैदराबाद मेट्रो रेल के लिए समस्याएँ भी बढेंगी.

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