महंगाई को लेकर एडीबी की चेतावनी

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एशियन डेवलपमेंट बैंक ने एशिया में उपभोक्ता सामग्री की बढ़ती क़ीमतों को लेकर चेतावनी दी है और कहा है कि इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर पर असर पड़ सकता है.

पूर्वी एशिया की दस उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पहली तिमाही में विकास की दर का आकलन 8.4 प्रतिशत किया गया था लेकिन पिछले तीन महीनों में इसे घटाकर 8.1 प्रतिशत कर दिया गया है.

खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती क़ीमतों की वजह से इन देशों में महंगाई लगातार बढ़ रही है.

पूर्वी एशिया में दुनिया की कुछ तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाएँ हैं जिनमें चीन भी एक है.

एशियन डवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने कहा है, "कई देशों में महंगाई दस साल के औसत से अधिक हो गई है और अब यह या तो केंद्रीय बैंकों के लक्ष्य को पार कर गई है या उसके बेहद क़रीब है."

इस क्षेत्र में अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है और इसकी वजह से घरेलू स्तर पर उपभोक्ता सामग्री की मांग बढ़ती जा रही है.

हालांकि ये विकास के लिए अच्छा है लेकिन ये सरकारों के लिए चुनौती बन गया है कि वे बढ़ती क़ीमतों पर किस तरह से क़ाबू पाएँ.

चेतावनी

इन अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे बुरी बात ये है कि महंगाई की वजह से पूरे क्षेत्र में ज़रुरी उपभोक्ता सामग्री की क़ीमत भी बढ़ गई है.

एडीबी ने चेतावनी दी है कि यदि क़ीमतों में बढ़ोत्तरी नहीं थमी तो ये क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के लिए और मुश्किलें खड़ी कर देगी.

बैंक ने कहा है, "खाद्यान्न और उपभोक्ता सामग्रियों की बढ़ती क़ीमतों और घरेलू बाज़ार में बढ़ती मांग की वजह से महंगाई और बढ़ सकती है."

बढ़ती महंगाई पर क़ाबू पाने के लिए कई देशों में बैंकों ने ब्याज़ दरों में बढ़ोत्तरी की है.

मौद्रिक नीति में सख़्ती की वजह से इन देशों की विकास दर पर विपरीत असर पड़ रहा है.

इस महीने की शुरुआत में चीन ने कहा था कि जून में ख़त्म होने वाली तिमाही में आर्थिक विकास की दर 9.5 प्रतिशत रही जो पिछली तिमाही के 9.7 प्रतिशत की तुलना में कम है.

एडीबी ने कहा है कि इसके बावजूद देशों को महंगाई पर क़ाबू पाने के प्रयास जारी रखने होंगे.

इस रिपोर्ट में बैंक ने कहा है, "अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे मौद्रिक नीति और सख़्त करना जारी रखेंगे और मंदी से उबरने के लिए दी गई सहायता को वापस लेना जारी रखेंगे जिससे कि मंहगाई पर नियंत्रण रखा जा सके और अर्थव्यवस्था को अनियंत्रित होने से रोका जा सके."

नीति को लेकर उहापोह

Image caption भारत में भी रिज़र्व बैंक ने मंहगाई पर क़ाबू पाने के लिए ब्याज़ दरों में कई बार बढ़ोत्तरी की है

हालांकि केंद्रीय बैंकों की ओर से ब्याज़ दर में बढ़ोत्तरी बढ़ती क़ीमतों को पर क़ाबू पाने के लिए एक कारगर हथियार रहा है लेकिन इसे लेकर एक असमंजस भी रहा है.

जिस समय पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है उसी समय अमरीका और यूरोप की कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं कठिन दौर से गुज़र रहे हैं.

इन देशों ने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अपनी ब्याज़ दरें ऐतिहासिक रुप से नीचे गिरा दी हैं.

एडीबी का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में दो तरह की परिस्थितियों से एशियाई अर्थव्यवस्था में लोग अपने निवेश पर बेहतर परिणाम चाहते हैं और इससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है.

अपनी रिपोर्ट में एडीबी ने कहा है, "इसकी वजह से अल्पावधि के पूंजी निवेश में बढ़ोत्तरी हुई है और नक़दी की उपलब्धता बढ़ी है और इसके परिणाम स्वरूप क़ीमतें बढ़ रही हैं."

बैंक का कहना है कि पूंजी निवेश बढ़ने से न केवल उपभोक्ता क़ीमतों पर असर पड़ रहा है बल्कि इससे आर्थिक विकास पर भी असर पड़ रहा है.

जबकि विकसित देशों में लोग कर्ज़ की ख़राब स्थिति और बाज़ार की डाँवाडोल हालत को देखते हुए पूंजी निवेश से डर रहे हैं.

एडीबी ने चेतावनी दी है कि जैसे ही विकसित देशों की अर्थव्यवस्था सुधरेगी लोग विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से अपनी पूंजी निकालेंगे और तब इन देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका विपरीत असर पड़ेगा.

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