क्या पश्चिमी पूँजीवाद असफल रहा है?

खोसे अंखेल गूरिया
Image caption ओईसीडी के महासचिव खोसे अंखेल गूरिया का ख़ास विश्लेषण

इस सवाल पर मेरा जवाब है, नहीं!

हालांकि मैं ये भी सोचता हूँ कि क्या कठघरे में खड़ा कर के पूछे जाने पर ख़ुद पूँजीवाद को इस सवाल का जवाब देना चाहिए.

मैं बाज़ारों और साफ़ तौर पर खुली बाज़ार व्यवस्था पर बात करना चाहूँगा.

मुझे लगता है कि नियामक के तौर पर हम असफल रहे, निरीक्षक के तौर से असफल रहे और कॉरपोरेट व्यवस्थापक के तौर पर भी असफल रहे.

साथ ही अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ बांटने में भी हम असफल ही रहे हैं.

हमारी वित्तीय असफलता तुरंत ही असल अर्थव्यवस्था तक फैल गई. वित्तीय संकट से हम सीधे आर्थिक अपंगता और उसके बाद सीधे बेरोज़गारी के संकट तक पहुँच गए.

10 से शुरू होकर बेरोज़गारी दर पहले 20 और फिर सीधे 40% तक पहुँच गई.

हालांकि कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आगे आने वाले वितीय संकट का आभास हो गया था.

कुछ एक ने तो चेतावनी भी जारी की. लेकिन किसी ने भी अपने आकलन को दिशा नहीं दी और एकजुट होकर इससे लड़ने के लिए नहीं खड़े हुए.

संस्थाएं नज़रंदाज़

इसीलिए समृद्धि के दौर में इन संस्थाओं को नज़र अंदाज़ किया गया.

उस दौर में हर कोई पैसा बना रहा था और सभी को लग रहा था कि नवीनता ही सफलता की कुंजी है.

इस दौरान जो भी व्यक्ति या संस्थाएं भविष्य में गड़बड़ी की आशंका व्याप्त करते थे, उन्हें प्रगति के रास्ते में रोड़ा डालने वालों की नज़र से देखा जाता था.

ख़ुशहाली के उस दौर में प्रचलित सोच यही थी कि बाज़ार प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में सरकारी हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए.

हालांकि इस सोच का ये अर्थ बिलकुल नहीं था कि बिना हस्तक्षेप के भी बाज़ार प्रणाली काम कर सकती थी या फिर ये पर्याय कतई नहीं था कि भविष्य के खतरों से आगाह न कराया जाए.

गहरी विरासत

शायद इसीलिए इस वित्तीय संकट ने एक गहरी विरासत छोड़ दी है. विरासत बढ़ी बेरोज़गारी की, आसमान छूते वित्तीय घाटे की और हम अभी भी जमा हुए सरकारी क़र्ज़ से निपटने की योजनाएँ बना रहे हैं.

ओईसीडी देशों में कई ऐसे भी हैं जिनका सरकारी क़र्ज़ सकल घरेलू उत्पाद के औसत से 100% तक पहुँच गया है.

वैसे आपको ये भी बता दूँ कि ये राशि पहले एक समाधान के तौर पर इस्तेमाल होती थी.

इसी लिहाज़ से अब ये बहुत ज़रूरी हो गया है कि उन्नति और रोज़गार से समझौता किए बिना क़र्ज़ से निपटने के प्रयासों के स्पष्ट संकेत दिए जाएं.

'संरचनात्मक बनो'

यही वजह है कि ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनोमिक कोओपरेशन (ओईसीडी) का नया नारा है 'संरचनात्मक बनो'.

हमारा संदेश यही है कि शिक्षा, नवीनीकरण, पर्यावरण का प्रसार, कर और स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्रों पर प्रमुखता से ध्यान देने की ज़रुरत है.

इन पर ध्यान देने के बाद ही रोज़गार पैदा होगा और क़र्ज़ से निपटने में मदद मिलेगी.

इन सब बातों की वजह से ही मुझे नहीं लगता कि पश्चिमी पूँजीवाद या बाज़ारवाद असफल रहा है. मेरे हिसाब से सवाल ये है कि बाज़ार पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में ज़रूरी संचालन कैसे किया जाए.

मैं इस बात से भी पूरी तरह सहमत हूँ कि अर्थव्यवस्थाएं सिर्फ़ खुले बाज़ार की प्रणाली के हाथों नहीं सौंप दी जानीं चाहिए.

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