ग्रीस के संकट का मतलब

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Image caption ग्रीस के बैंकों की भी स्थिति ख़राब है

ग्रीस और उसका कर्ज़ पिछले एक वर्ष से यूरोज़ोन के लिए मुसीबत बना हुआ है.

ग्रीस को दो बार आर्थिक सहायता दी जा चुकी है लेकिन निवेशकों को अभी भी भुगतान न कर पाने का डर सता रहा है.

अक्तूबर में यूरोपियन आयोग, यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ़) ने कहा था कि आर्थिक सुधार कार्यक्रमों और देश को वापस पटरी पर लाने को लेकर ग्रीस के साथ एक नया समझौता हो गया है.

इस तीन सूत्रीय फ़ॉर्मूले में आर्थिक सहायता पैकेज को बढ़ाकर एक ख़रब यूरो करना, बैंकों पर ये दबाव डालना कि वे भविष्य में भुगतान न होने की स्थिति में होने वाले घाटे को सहने के लिए अपनी पूंजी बढ़ाएँ और कुछ बैंकों की ओर से ग्रीस के कर्ज़ का 50 प्रतिशत घाटा सहने के लिए राज़ी होना शामिल था.

लेकिन इस पर जल्दी ही संदेह के बादल मंडराने लगे जब ग्रीस के प्रधानमंत्री ने इस पैकेज पर जनमत संग्रह करवाने की घोषणा कर दी.

हालांकि ये मामला अब शांत हो गया है लेकिन ये आशंका अभी भी मंडरा रही है कि क्या ग्रीस को यूरोज़ोन छोड़ने के लिए बाध्य किया जाएगा?

सवाल: क्या है ग्रीस की मुसीबत?

जवाब: यूरोज़ोन में शामिल होने और उसके पहले से ही ग्रीस अपने संसाधनों से अधिक ख़र्च करता रहा है. बढ़ते कर्ज़ ने देश के अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया था.

यूरो को अपनी मुद्रा के रूप में स्वीकार करने के बाद से ग्रीस मनमाना ख़र्च करता रहा और इसके लिए सरकार कर्ज़ लेती रही.

सरकारी ख़र्च लगातार बढ़ता रहा और सार्वजनिक क्षेत्रों में तनख़्वाह पर होने वाला ख़र्च पिछले एक दशक में दोगुना हो गया है. ग्रीस की आबादी तो सिर्फ़ एक करोड़ 10 लाख है लेकिन उस पर कर्ज़ पर 340 अरब यूरो से ज़्यादा का कर्ज़ है.

एक ओर सरकारी ख़ज़ाने से पैसा ख़र्च हो रहा था और दूसरी ओर करों यानी टैक्स से होने वाली आय घट रही थी क्योंकि व्यापक पैमाने पर करों की चोरी हो रही थी.

जब आर्थिक मंदी का दौर शुरु हुआ तो ग्रीस उससे निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था.

मई में उसे 110 अरब यूरो का राहत कर्ज़ दिया गया जिससे कि वो संकट से उबर सके लेकिन इससे बात नहीं बनी तो जुलाई 2011 में एक बार फिर 109 अरब यूरो देने का फ़ैसला किया गया.

लेकिन ये राशि भी पर्याप्त नहीं साबित हुई. तब अक्तूबर में ब्रशल्स में इस संकट को एक बार में निपटाने के लिए एक सम्मेलन बुलाया गया.

ग्रीस का दिया गया राहत पैकेज पर्याप्त साबित क्यों नहीं हुआ?

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Image caption सरकार की ओर से की गई कटौतियों का जनता ने भारी विरोध किया है

जो पहला राहत कर्ज़ ग्रीस को दिया गया था उसका लक्ष्य संकट पर क़ाबू पाना था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

पुर्तगाल और आइरिश रिपब्लिक को भी अपने कर्ज़ से छुटकारा पाने के लिए सहायता की ज़रूरत थी.

इस बीच ग्रीस को 109 अरब यूरो के एक और राहत पैकेज की घोषणा की गई.

इस वर्ष जुलाई में यूरोज़ोन के नेताओं ने एक योजना का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया था कि ग्रीस को कर्ज़ देने वाली निजी संस्थाएँ मूल राशि का 20 प्रतिशत माफ़ कर देंगीं.

लेकिन इस बीच स्पेन और इटली के कर्ज़ संकट ने समस्या को और बढ़ा दिया और ये आशंका व्याप्त हो गई कि इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी शायद राहत पैकेज देने की ज़रूरत पड़े.

फ़्रांस और बेल्जियम कर्ज़ देने वाली वित्तीय संस्था डेक्सिया के दीवाला हो जाने ने संकट को और बढ़ा दिया. फ़्रांस और जर्मनी के बैंकों ने ग्रीस को सबसे ज़्यादा कर्ज़ दिया हुआ है.

यूरोज़ोन में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए जो फंड स्थापित किया गया है वह 440 अरब यूरो का है, और जो परिस्थितियाँ हैं, उसमें इससे तो काम चलने वाला नहीं था.

इसलिए अक्तूबर में इसे एक ख़रब यूरो तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया और बैंकों ने ग्रीस के कर्ज़ में 50 प्रतिशत तक की कटौती करना स्वीकार किया.

लेकिन तभी ग्रीस के प्रधानमंत्री जॉर्ज पॉपेंड्र्यू ने यूरोपीय नेताओं को यह घोषणा करके चौंका दिया कि वे यूरोपीय पैकेज पर जनमत संग्रह करेंगे.

इसके बाद फ़्रांस, जर्मनी और आईएमएफ़ ने घोषणा कर दी कि उनकी ओर से ग्रीस को दी जाने वाली सहायता तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक जनमत संग्रह के परिणाम नहीं आ जाता.

अपने पद पर बने रहने की चुनौतियों के बीच पॉपेंड्र्यू ने जनमत संग्रह करवाने का अपना फ़ैसला वापस ले लिया और अब ऐसा लगता है कि अब नए पैकेज को अमल में लाया जा सकता है.

लेकिन नाराज़ यूरोज़ोन नेताओं ने ग्रीस को यूरोज़ोन से हटाने की जो बात कही थी, उसका असर आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.

क्या होगा यदि ग्रीस भुगतान करने में विफल होता है?

सच कहें तो भुगतान न करने की स्थिति तब आती है जब कर्ज़दार मौजूदा या किसी अन्य कर्ज़ की शर्तों का उल्लंघन करता है. मसलन वह किस्तों का भुगतान न कर सके. या ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि कर्ज़दार पूरी तरह से भुगतान करने की स्थिति में ही न हो. इसकी वजह दीवालिया होना भी हो सकता है.

Image caption ग्रीस के सामने अभी यूरोज़ोन से निकाले जाने का ख़तरा मंडरा रहा है

भुगतान न करने के कई परिणाम हो सकते हैं. एक तो ये कि सारे लेनदार कहें कि कर्ज़दार या देनदार तुरंत भुगतान करे. ये भी हो सकता है कि लेनदार कर्ज़ के रूप में दी गई राशि पर हुए सारे घाटे को माफ़ करने के लिए तैयार हो जाए.

ग्रीस को दिए कर्ज़ का बड़ा हिस्सा यूरोप के बैंकों से आया है और इस समय उनकी लेनदारी शायद 50 से 60 अरब डॉलर के क़रीब है. यदि समान्य रूप से भुगतान न करने की स्थिति आती है तो इसके भुगतान का खाका फिर से तैयार किया जाएगा और हो सकता है कि भुगतान की अवधि कुछ दशकों के लिए आगे बढ़ा दिया जाए.

लेकिन भुगतान न करने की असामान्य स्थिति में ये हो सकता है कि ज़्यादातर कर्ज़ की राशि कभी अदा ही न की जाए.

दोनों ही स्थितियों में ये बैकों और अंशधारकों के लिए कष्टप्रद होगा.

इसके अलावा ग्रीस के बैंकों पर अपने देश के कर्ज़ों का बोझ है. उन्हें नई पूंजी की ज़रूरत होगी और हो सकता है कि कुछ बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी करना पड़े. चूंकि लोगों का भरोसा कम हो रहा है वे बैंकों से अपने पैसे निकालने लगेंगे और इससे मुसीबत और बढ़ेगी.

कुछ लोगों को लगता है कि यूरोज़ोन से ग्रीस का हटना अपरिहार्य है. ऐसी स्थिति में सवाल ये उठेगा कि यूरोज़ोन के बाक़ी देशों का क्या जिन पर भारी भरकम कर्ज़ है.

ये अमरीकी बैंक लीमेन ब्रदर्स की तरह की स्थिति हो सकती है, जिसके कर्ज़ की स्थिति की वजह से अमरीका और यूरोप में आर्थिक संकट की शुरुआत हुई.

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