रुपए के साथ-साथ सेंसेक्स में भी गिरावट क्यों?

डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमज़ोर होता जा रहा है.

एक डॉलर के मुकाबले में रुपए की क़ीमत इस साल एक जनवरी में 44.67 रुपए से घटकर 22 नवबंर की सुबह तक 52.73 रुपए हो गई, जो 18 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट है.

मतलब ये कि भारत में आयात किए जाने वाली वस्तुओं की कीमत और बढ़ सकती है. लेकिन इसका मुख्य कारण क्या है?

रुपए की क़ीमत में लगातार गिरावट की वजह ये है कि कमज़ोर और संकट से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था में विश्व की पूंजी अमरीका की तरफ़ भाग रही है.

'मरा हाथी भी सवा लाख का'

चाहे अमरीकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं लेकिन इस समय में भी लोगों का सबसे ज़्यादा भरोसा अमरीका पर ही है...उन्हें अमरीका ज़्यादा सुरक्षित दिखता है.

अमरीका की अपनी समस्याओं के बावजूद लोग इसे नज़रअंदाज़ कर, डालर को ही अन्य मुद्राओं की तुलना में सुरक्षित मान रहे हैं. यही कारण है रुपए की क़ीमत घट रही है.

ये बात सही है कि अमरीका की अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है.

बेराज़गारी भी ज़्यादा है लेकिन मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है, इस तर्क के आधार पर अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में निवेशकों को अमरीका पर संकट कम दिख रहा है.

इसी वजह से विदेशी निवेशक भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं से अपनी पूंजी हटाकर वापस अमरीका में लगा रहे हैं.

विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं और यही कारण है कि शेयर बाज़ार और रुपए की क़ीमत साथ-साथ गिर रही है.

असर

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डॉलर के मुकाबले रुपए के कमज़ोर होने का तात्कालिक असर ये होगा कि जब पूंजी भारत से जाएगी तो आयात महँगे हो जाएँगे.

जो माल भारत विदेश से खरीदता है जैसे उर्वरक आदि, ये सारे सामान डॉलर के मँहगे होने से महँगे हो जाएँगे.

भारत भारी तादाद में तेल का आयात करता है इसलिए वो भी मँहगा होगा.

लेकिन ये असर अन्य चीज़ों पर कम ही दिखाई देगा क्योंकि भारत बहुत ज़्यादा आयात पर निर्भर नहीं रहता.

ये संकट कम से कम तीन महीने से छह महीने तक ख़त्म होता नहीं दिख रहा.

लेकिन असली प्रश्न ये है कि आख़िरकार अमरीका की अर्थव्यवस्था का भविष्य में क्या होगा?

जब तक अमरीकी वित्तीय संकट खुलकर सामने नहीं आता तब तक गिरावट का ये दौर जारी रहेगा.

अगर अमरीका की अर्थव्यवस्था फिर से लड़खड़ाती है तो लोग ये जान जाएँगे की चीन, भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्रा सुदृढ़ है और फिर इस विदेशी पूंजी का बहाव फिर से भारत की ओर होगा.

ये अलग बात है कि भारत और चीन की अर्थव्यवस्था तो मौलिक तौर पर मज़बूत है लेकिन विश्व स्तर पर निवेशकों ने इन देशों को ऐसा दर्जा नहीं दिया है और ऐसा होने में समय लगेगा.

(बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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