'मल्टी-ब्रांड' खुदरा व्यापार में एफ़डीआई को हरी झंडी

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Image caption वालमार्ट जैसी कंपनियों को भारत में कारोबार की इजाज़त मिल सकती है

भारत के मंत्रिमंडल ने आर्थिक सुधारों में एक बड़ा फ़ैसला करते हुए खुदरा व्यापार क्षेत्र में एक से ज़्यादा ब्रांड के लिए विदेशी पूँजी निवेश (एफ़डीआई) को हरी झंडी दिखा दी है.

भारत के सरकारी टेलीविज़न दूरदर्शन के मुताबिक कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है.

इस फ़ैसले के बाद दुनिया के कई बड़े खुदरा ब्रांड जैसे वालमार्ट, टेस्को इत्यादी को भारत में अपनी दुकानें खोलने का मौक़ा मिल सकता है.

जहाँ कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने एनडीटीवी के साथ बातचीत में इस फ़ैसले को 'वाजिब' ठहराया है, वहीं विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने इसी चैनल के साथ बातचीत में इसकी कड़ी आलोचना की है.

इससे सुपरमार्केट्स को भारत के अनुमानित 450 अरब डॉलर के इस क्षेत्र में काम करने का मौक़ा मिल जाएगा.

भीषण बहस

पर्यवेक्षकों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यव्स्था में पहले की तुलना में आ रही सुस्ती और महँगाई को देखते हुए पिछले दिनों इस विषय पर बहस तेज़ हो गई थी.

कुछ जानकारों कहते हैं कि सरकार का मानना है कि इस फ़ैसले से विदेशी निवेश बढ़ेगा और आपूर्ति भी बढ़ेगी. इससे महँगाई पर काबू पाने में सरकार को मदद मिल सकती है.

उनका मानना है कि इस क़दम से आने वाले समय में महंगाई पर रोक लगाने मदद मिलेगी.

लेकिन भारत के खुदरा व्यापारी इस कदम का विरोध करते रहे हैं. उन्हें डर है कि बड़ी कंपनियों के आने से उनकी दुकानें बंद हो सकती है और रोज़गार पर भी असर पड़ सकता है.

छोटे व्यापारियों और किसानों के संगठनों इस फ़ैसला का कड़ा विरोध किया है. इन दोनों वर्गों के लाखों लोगों को चिंता है कि उनकी रोज़गार प्रभावित हो सकती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक भारत के खुदरा व्यापार के वार्षिक 450 खरब ड़ॉलर में लगभग 90 फ़ीसदी हिस्सा परिवारों द्वारा चलाए जा रही छोटी दुकानों का होता है.

रायटर्स के अनुसार व्यवस्थित खुदरा व्यापारियों के पास सिर्फ़ दस प्रतिशत का हिस्सा है लेकिन भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग को देखते हुए इस श्रेणी में तेज़ी से विकास हो रहा है.

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