अर्थव्यवस्था: भारत किस मुकाम पर, आगे क्या होगा?

Image caption वैश्वीकरण के दौर में जो चर्चा यूरोप, अमरीका में होती है, वही भारत में भी होती है

दो साल पहले जब मैं अमरीका से भारत सरकार का सलाहकार बनकर नई दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में आया तब मैंने तय किया कि बीबीसी के स्तंभकार के रूप में लिखना बंद किया जाए.

लेकिन ये काफ़ी कमाल का समय रहा है और इसके बारे में काफ़ी कुछ लिखा जा सकता है.

पहले ही हफ़्ते में मुझे संकेत मिला कि मैं नए माहौल में हूँ. दफ़्तर की गाड़ी में जब मैंने सीट बेल्ट लगाने के लिए हाथ बढ़ाया तो मेरा सरकारी ड्राइवर, जो ये जानता था कि मैं एक शिक्षण संस्थान से 'बड़े दफ़्तर' में आया हूँ, बोला - "रहने दीजिए साहब, आप अब मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं, आपको सीट बेल्ट लगाने की ज़रूरत नहीं."

लेकिन जल्द ही ये भी स्पष्ट हो गया कि जहाँ तक नीति निर्धारण का सवाल है, भारत विश्व के किसी भी औद्योगिक देश से भिन्न नहीं है. वैश्वीकरण ने भारत के खुले समाज में ये सुनिश्चित किया है कि जो चर्चा यूरोप और उत्तरी अमरीका में होती है, वही नॉर्थ ब्लॉक में होती है.

मुश्किल दौर

जिस समय मैं ये लिख रहा हूँ, उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुज़र रही है. पिछले छह महीने में औद्योगिक विकास दर घट गई है और महँगाई ऊँचे स्तर पर बनी हुई है.

इसके लिए ज़िम्मेदार कुछ कारणों के बारे में तो पता ही है. राष्ट्रमंडल खेलों से शुरु हो कर, 2जी स्पैक्ट्रम की बिक्री तक, भ्रष्टाचार के आरोपों ने भारत के व्यावसायिक वातावरण में जैसे विष घोल दिया है.

नागरिक समाज में भ्रष्टाचार के 'सर्वविद्यमान' होने के ख़िलाफ़ गुस्सा उबाल खा रहा है.

इसका स्वागत है लेकिन इससे एक 'विच-हंट' यानी संदिग्ध व्यक्तियों की खोज को प्रोत्साहन मिला है. ये अंग्रेजी नाटककार आर्थर मिलर के 'द क्रुसिबल' की तरह है जिसमें हर व्यक्ति हर व्यक्ति को संदिग्ध मानता है.

इसका नतीजा ये हुआ है कि नौकरशाह फ़ैसले लेने से हिचकिचा रहे हैं क्योंकि काम न करने से कम से कम ये तो सुनिश्चित हो जाता है कि आप कुछ ग़लत नहीं कर रहे.

चाहिए ये कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम चलाई जाए. लेकिन ऐसा समझबूझ से बनाए गए एनफ़ोर्समेंट सिस्टम यानी प्रवर्तन प्रणाली के साथ होना चाहिए जो क़ानून और अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों से समकालीन विचारों का इस्तेमाल कर बनाई गई हो.

हमें 'रेड राज' के दिनों में लौटना नहीं है क्योंकि तब सरकार जमाखोरों को खोजने के लिए शत्रु-रूपी नौकरशाही को खुली छूट दे देती थी जिससे वैध व्यापारिक और भंडारन गतिविधियाँ रुक जाती थीं.

अर्थव्यवस्था में सुस्ती

यूरोज़ोन संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती भारत के लिए भी नकारात्मक हवाएँ लाए हैं. जी-20 देशों में सामान्य तौर पर ख़ासी आर्थिक सुस्ती दिख रही है.

केवल एक देश - ऑस्ट्रेलिया में दूसरी तिमाही (1.4 प्रतिशत) में पहली तिमाही (एक प्रतिशत) के मुकाबले में विकास की गति बढ़ी है.

लेकिन इन सभी मुश्किलों के बावजूद जब हम मौलिक बातों की ओर ध्यान देते हैं तो ऐसे कई कारण पाते हैं जिनसे भारत के बारे में आशावादी होना चाहिए. आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.5 प्रतिशत से ज़्यादा है.

इसके आगे, जिस बात पर ज़्यादा टिप्पणी नहीं होती वह है कि भारत की राष्ट्रीय आमदनी का 30 प्रतिशत से ज़्यादा, वर्ष 2003 से ही, बचत और निवेश में जा रहा है. ये पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के विकास की चरमसीमा के दौर की याद दिलाता है.

जैसे-जैसे भारत जनसांख्यकी संबंधी लाभ उठाता है, वैसे-वैसे उम्मीद है कि बचत और बढ़ेगी. जनसांख्यकी संबंधी लाभ का मतलब है अगले बीस साल में काम करने के लायक जनसंख्या में वृद्धि.

उभरती शक्ति

इनमें से कोई भी बदलाव किसी 'तानाशाह' सरकार के कारण नहीं आए हैं. आज़ादी के बाद ऐसा समय था जब भारत ने सामान और सेवाओं के देश में आने पर रोक लगाई लेकिन भाग्यवश विचारों के आने पर कभी रोक नहीं लगी. इस खुलेपन से ही लोकतंत्र का पोषण हुआ और इसमें व्यापक भागीदारी हुई. इसी के कारण भारत में वो स्थिरता नज़र आती है जो कई अन्य 'इमरजिंग' यानी उभरते हुए अर्थव्यवस्थाओं में नहीं दिखती.

उभरने के साथ-साथ मौजूद इस ताकत और भारत के वैश्विक स्तर पर मुकाम पाने की वजह से भारत अब दुनिया में मुद्रा और वित्तीय चुनौतियों से मुँह नहीं फेर सकता और इनका सीधा असर भारत पर भी पड़ता है.

बैंकों के बीच तालमेल की ज़रूरत

मैं मुद्रा और वित्तीय जगत से एक-एक उदाहरण देना चाहता हूँ.

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Image caption तील सौ साल पहले ये एहसास हो गया था कि एक अर्थव्यवस्था का एक ही बैंक होना चाहिए.

कम से कम 300 साल पहले ये एहसास हो गया था कि एक अर्थव्यवस्था का ज़्यादा से ज़्यादा एक ही केंद्रीय बेंक होना चाहिए.

स्वीडन में रिक्सबैनकेन 1664 में और फिर 1694 में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड इसी मक़सद से खोले गए थे. जल्द ही ये एक मानक ही बन गया और फिर हर देश का अपना राष्ट्रीय बैंक बना.

इस प्रणाली ने दुनिया की काफ़ी सेवा की लेकिन वैश्विकरण के बाद - पैसा और सामान राष्ट्रीय सरहदों को आसानी से पार करने लगा और अब दुनिया की अर्थव्यवस्था भी एक ही अर्थव्यस्था नज़र आने लगी है.

लेकिन क्योंकि दुनिया में कई केंद्रीय बैंक हैं तो हम जाने-अनजाने में उसी व्यवस्था में वापसी कर रहे हैं जिसे हमने 17वीं सदी में छोड़ने की कोशिश की थी.

इससे हर देश की मौद्रिक नीति की शक्ति कमज़ोर हुई है और इससे 'स्पिलओवर' यानी ज़रूरत से अधिक आगे बढ़ने का रूझान बढ़ा है.

चाहे ब्रिटेन ने 75 अरब डॉलर अपनी अर्थव्यवस्था में डाले हैं लेकिन इसका विकास दर बढ़ाने में वैसा असर नहीं हुआ जैसे कि पहले हुआ करता है.

लेकिन इसके कारण भारत, चीन, ब्राज़ील में वस्तुओं पर दाम बढ़ाने का दबाव ज़रूर आया है.

स्पष्ट है कि केंद्रीय बैंकों के बीच ऐसे तालमेल की ज़रूरत है जो फ़िलहाल तो विश्व में नहीं है.

मुश्किल

जब हम वित्तीय प्रणाली की बात करें तो एक अहम मुश्किल है - कहावत - टू बिग टु फ़ेल - यानी इतना बड़ा कि ये असफ़ल नहीं हो सकता, और ये बार-बार दोहराया जाता है.

इस बात का तर्क बहुत ही सरल है. कुछ बैंक इतने बड़े हैं कि यदि वे 'फ़ेल' यानी ठप्प हो जाते हैं तो इसका आम उपभोक्ता और मज़दूर पर बहुत ही बुरा असर होगा.

इसलिए उपभोक्ता और मज़दूर को बचाने के लिए माना जा सकता है कि कुछ बैंकों को 'फ़ेल' नहीं होने दिया जाएगा.

जब इस समस्या को समझा गया तो वित्तीय मसलों पर पुनर्विचार शुरु हुआ और वित्तीय बाज़ारों के लिए नए क़ानून लाए गए.

लेकिन हमने एक ग़लती कर दी है.

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Image caption बैंकों और वित्तीय प्रणाली के नियमों के बारे में दुनिया क्या फ़ैसला करती है, ये भारत के लिए महत्वपूर्ण है.

'टू रिच टु फ़ेल' का मतलब लोगों ने 'टू रिच टु बी पू्अर' लगाया है. इसीलिए सरकारी बीमा न केवल बैंकों को उपलब्ध कराया गया बल्कि उनके मालिकों और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को भी इसका लाभ दिया गया.

इस समय ऐसी नीति की ज़रूरत है जो ये सुनिश्चित करे कि जब कोई बड़ा बैंक 'फ़ेल' होता है तब हमारे पास इतना पैसा हो कि हम बैंक को ध्वस्त होने से बचा लें लेकिन वो मालिक और मुख्यकार्यकारी अधिकारी जिनके फ़ैसलों के कारण बैंक फ़ोल हुआ, उन्हें जाने दिया जाए.

ऐसा न करना केवल नैतिक आधार पर ही ग़लत नहीं है बल्कि वह ग़लत फ़ैसलों और ज़रूरत से ज़्यादा ख़तरे लेने को प्रोत्साहित करता है.

भारत का महत्व

दुनिया केंद्रीय बैंकों और वित्तीय प्रणाली के नियमों के बारे में क्या फ़ैसला करती है, ये भारत के लिए अत्यंत महत्व का विषय है.

हमेशा से यही रहा है. इस बार फ़र्क केवल इतना है कि भारत पहली बार इन बहसों पर असर डाल सकता है और इस बारे में नियम क्या होंगे, इस बारे में मदद कर सकता है.

वैश्विक राऊंडटेबल यानी दुनिया की गोलमेज़ पर भारत को ये चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और इसमें एक योग्य सदस्य की तरह भाग लेना चाहिए.

(कौशिक बासु भारतीय सरकार के वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं. वो कॉर्नेल विश्वविध्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर है. उनकी 'कि़ताब बियोन्ड द इनविसिबल हैंड: ग्राउंटवर्क फॉर न्यू इकोनोमिक्स' इसी साल छपी है)

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