यूरोप का क़र्ज़ संकट और गहराया

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Image caption स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के फ़ैसले के बाद निधि को लिए धन की उगाही मुश्किल हो जाएगी.

क़र्ज़ चुकाने की क्षमता का आंकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स, ने यूरोज़ोन सहायता राशि निधि की रेटिंग को कम कर दिया है.

रेटिंग एजेंसी ने इस फंड को पहले 'ट्रिपल-ए' स्तर पर रखा था जिसे अब नीचे कर 'डबल-ए' कर दिया गया है.

स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के इस फ़ैसले का प्रभाव ये होगा कि निधि को बाज़ार से पैसा उठाने में दिक्क़तों का सामना करना पड़ सकता है.

उसे कर्ज़ के लिए अधिक ब्याज देना पड़ सकता है.

ये निधि क़र्ज़ संकट से जुझ रहे यूरो मुद्रा मुल्कों को आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार की गई थी.

गारंटी

इस निधि की रेटिंग उन देशों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है जिन्होंने इस सहायता राशि फंड के लिए या तो धन दिया है या देने का वायदा कर रखा है.

ऐसे कई मामलों में क़र्ज़ चुकाने की गारंटी भी बाज़ार में काम कर सकती है.

लेकिन पिछले हफ़्ते स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने ही यूरो मुद्रा का इस्तेमाल करने वाले 16 देशों में से नौ देशों की क्रेडिट रेटिंग कम कर दी थी.

इस खेप में कम रेटिंग दिए जाने वाले मुल्कों में यूरो मुद्रा क्षेत्र के आर्थिक तौर पर दूसरे सबसे बड़े शक्तिशाली देश फ़्रांस का नाम भी शामिल था.

एजेंसी ने ऑस्ट्रिया की रेटिंग को भी गिरा दिया था.

इतना ही नहीं, रेटिंग एजेंसी ने ये चेतावनी भी दी थी कि यूरो मुद्रा वाले 14 देशों की क्रे़डिट रेटिंग और भी कम की जा सकती है.

क्षमता

यूरोप केंद्रीय बैंक के प्रमुख मॉरियो ड्रागी ने कहा है कि बेहतर रेटिंग वाले सदस्य देशों को सहायता राशि निधि में अधिक योगदान करना होगा ताकि फंड की क़र्ज़ दे सकने की क्षमता पूर्व स्थिति में बहाल रह सके.

स्टैंडर्ड एंड पुअर्स का कहना कि अगर फंड सदस्य देशों से अतिरिक्त गारंटी लेने में सफल होता है तो उसका आकलन बेहतर दर्जे पर किया जा सकता है.

ऑयरलैंड और पुर्तगाल को निधि से 40 अरब यूरो की सहायता मिल रही है जबकि ग्रीस के दूसरे खेप में 100 अरब यूरो की दरकार हो सकती है.

बीबीसी के आर्थिक मामलों के संवाददाता एंड्र्यू वॉकर का कहना है कि स्पेन और इटली को भी फंड से मदद की दरकार हो सकती है.

वैश्वीकरण के इस दौर में एक क्षेत्र ख़ासतौर पर यूरोप के शक्तिशाली देशों में आर्थिक संकट का असर दुनियां के दूसरे मुल्कों पर भी पड़ेगा क्योंकि उनके माल का निर्यात इस क्षेत्र में कम हो जाएगा.

साथ ही ये देश विकासशील देशों जैसे भारत में निवेश करने की स्थिति में भी नहीं रहेंगे.

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