क्या ऊर्जा का दाम बढ़ाना ही एक उपाय है?

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Image caption भारत में कुल ऊर्जा उत्पाद का 25 फ़ीसदी निजी कंपनियों के प्लांट में होता है.

ऊर्जा के उत्पादन में लगी बड़ी निजी कंपनियों के मालिक आज कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल से मिले. देर शाम उनकी ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंडे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मुलाकात होगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक अनिल अंबानी और साइरस मिस्त्री समेत टाटा, हिन्दुजा ग्रुप और एस्सार कंपनी के प्रतिनिधि बुधवार सुबह योजना आयोग के सदस्य बी के चतुर्वेदी से भी मिले.

इन सभी चर्चाओं का उद्देशय ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी दिक्कतें, जैसे ईंधन की कमी, उसके बढ़ते दाम और उत्पादन के लिए अनिवार्य सरकारी स्वीकृति मिलने में परेशानी, को सामने लाना बताया जा रहा है.

बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने कहा, “हमने कोयले, गैस और ऊर्जा मंत्रालय से जुड़ी उनकी सभी मांगें सुनी हैं, सरकार देश में कोयले का उत्पादन बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है.”

उन्होंने दावा किया कि सबसे बड़े सरकारी उपक्रम, कोल इंडिया लिमिटिड का आधुनिकीकरण कर उसका उत्पाद बढ़ाया जाएगा.

ऊर्जा क्षेत्र में आए मौजूदा संकट की वजह बड़े तौर पर कोयले का उप्लब्ध ना होना माना जा रहा है.

ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2011 में ऊर्जा के उत्पाद में 55,904 यूनिट की कमी थी.

भारत के ऊर्जा उत्पादन का क़रीब 56 फ़ीसदी कोयले से, 21 फ़ीसदी पनबिजली और क़रीब 10 फ़ीसदी गैस से होता है.

कोयले पर निर्भरता

उद्योग संघ कॉनफ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) की ऊर्जा पर राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष, अनिल सरदाना के मुताबिक निजी क्षेत्र को सरकार की ओर से मदद की ज़रूरत है.

एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उन्होंने कहा, “देश में कोयला उत्पादन नाकाफ़ी होने की वजह से आयात पर निर्भरता बढ़ रही है, और ये ख़ास तौर पर निजी क्षेत्र के लिए आर्थिक संकट पैदा कर रहा है.”

दरअसल जानकारों का मानना है कि जिस वक्त सरकार ने ऊर्जा के ठेकों को प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के तहत बांटा, निजी कंपनियों ने ज़रूरत से कम दामों की बोली लगाई.

ऊर्जा मंत्रालय में पूर्व सचिव अनिल वधवा ने बीबीसी से विशेष बातचीत में कहा, “निजी कंपनिया बहुत हद तक कोयले के आयात पर निर्भर हैं, लेकिन ठेके मिलने के बाद से स्थिति बदली है, इंडोनीशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने अपने क़ायदे बदले हैं और आयात महंगा हो गया है.”

उपभोक्ता पर दबाव

वधवा के मुताबिक, "सरकार को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन की बढ़ती कीमत को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा का दाम भी बढ़ाना चाहिए ताकि उपभोक्ता भी उसे किफ़ायत से इस्तेमाल करना सीखे."

साथ ही वो कहते हैं कि सरकार को जनता में से सबसे ज़रूरतमंद वर्गों को ही ऊर्जा के दाम में रियायत देनी चाहिए.

सरकार ने ईंधन के तौर पर कोयले का इस्तेमाल करनेवाली निजी कंपनियों को अपने इस्तेमाल के लिए कोयले का उत्पादन करने की मंज़ूरी भी दी थी. लेकिन ऐसा बहुत कम कंपनियां ही कर पाईं.

वधवा के मुताबिक, “राज्य सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए ताकि इस विकल्प का इस्तेमाल करने की कोशिश करनेवाली कंपनियों को भूमि अधिग्रहण और अन्य अनुमति प्राप्त करने में परेशानी ना हो.”

इसी वजह से समय के साथ ऊर्जा उत्पादन के लिए पनबिजली का उपयोग भी कम हुआ है. साथ ही सौर ऊर्जा और वायु से ऊर्जा पैदा करने की तकनीक के विकसित होने में समय लगने की स्थिति में फ़िलहाल भारत का ऊर्जा क्षेत्र ईंधन के लिए कोयले पर ही निर्भर रहेगा.

सीआईआई के मुताबिक देश की विकास दर को आठ फ़ीसदी तक लाने के लक्ष्य को पाने में भी ऊर्जा क्षेत्र की अहम भूमिका रहेगी और इसके लिए सरकार को कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे.

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