सरकारी मदद क्यों...किंगफिशर डूबती है तो डूबे:विशेषज्ञ

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Image caption विशेषज्ञों के मुताबिक किंगफिशर की परेशानी नई नहीं है और इस पर आंतरिक मंथन होना चाहिए था

विशेषज्ञों की मानें तो सरकार किंगफिशर को बचाने की कोशिश न करे, और अगर कंपनी डूबती है तो उसे डूबने दिया जाए.

उनका कहना है कि एअर इंडिया की तुलना किंगफिशर से करना गलत है क्योंकि एअर इंडिया सरकारी कंपनी है.

विशेषज्ञ इस तर्क से भी सहमत नहीं हैं कि किंगफिशर के डूबने पर किराए बढ़ेंगे, विमानन सेक्टर पर जेट एअरवेज का एकाधिकार होगा और हजारों नौकरियाँ जाएँगी.

उनका कहना है कि जब निजी कंपनियाँ मुनाफे नहीं बांटती तो घाटे में क्यों मदद की उम्मीद रखती हैं.

किंगफिशर एयरलाइन के कर्ताधर्ता विजय माल्या यूबी ग्रुप के मालिक हैं, आईपीएल और फॉर्मूला वन में उनकी टीमें हैं. वो खुद ही कह चुके हैं कि उन्हें सरकारी बेलआउट यानी पैकेज नहीं चाहिए. लेकिन क्या बिना सरकारी मदद के कंपनी का बचना संभव है?

ये विजय माल्या ही थे जिन्होंने कैप्टेन गोपीनाथ की एअर डेकन को खरीदा था.

बीबीसी से बातचीत में कैप्टन गोपीनाथ कहते हैं, "सरकार को नीतिगत बातों पर ध्यान देना चाहिए, ना कि किंगफिशर की मदद करने पर और अगर किंगफिशर संसाधन नहीं जुटा पाती तो किंगफ़िशर खत्म हो जाएगी. दुनिया भर में किसी भी विमानन कंपनी ने अगर गलती की है तो उसे भरपाई करनी पड़ी है और फिर उसने उसका फल भी भुगता है."

गोपीनाथ ने बताया कि और कर्ज लेने से किंगफिशर की समस्या का समाधान नहीं होगा और इक्विटी यानी शेयर लाने में कंपनी के मूल्यांकन और उसके नियंत्रण को लेकर सवाल पैदा होंगे.

इक्विटी का मतलब होता कि किंगफिशर के शेयर बाज़ार में अन्य लोगों के पास जा सकते हैं और माल्या का नियंत्रण कंपनी पर घट सकता है.

गोपीनाथ कहते हैं, “माल्या को शुरुआत से ही कर्ज की बजाय इक्विटी का रास्ता चुनना चाहिए था. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि अगर वो इक्विटी का रास्ता चुनते तो कंपनी पर उनका नियंत्रण कम होता. वो कंपनी को अपने हिसाब से चलाना चाहते थे.”

'जेट, किंगफिशर का मॉडल गलत'

माल्या की इस शिकायत पर कि तेल और एटीसी के दर ज्यादा हैं, देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र के पूर्व महानिदेशक कानू गोहेन कहते हैं कि ये बात सभी कंपनियों पर लागू है और इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी कंपनियाँ मुनाफे में क्यो हैं?

गोपीनाथ के अनुसार जेट एअरवेज और किंगफिशर का मॉडल गलत है और उन्हें सस्ती, बिना खर्च वाली एअरलाइनों पर ध्यान देना चाहिए था.

तो सरकार क्या करे?

पूर्व महानिदेशक कानू गोहेन कहते हैं, "सरकार देश में सभी जगह तेल पर लगने वाले करों को समान करे और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में विदेशी निवेश पर रोक को हटाए."

वो कहते हैं, "सरकार को निजी विमानन कंपनियों की मदद नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे दूसरी कंपनियाँ भी समान व्यवहार की बात करेंगी. कंपनी की अव्यवस्था इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है. ये अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है. कंपनी को आंतरिक समीक्षा करनी चाहिए थी."

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