बजट पेश कर रहे हैं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी

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Image caption प्रणब मुखर्जी सातवीं बार आम बजट पेश करेंगे

राजनीतिक और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही यूपीए सरकार के वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी आम बजट पेश कर रहें हैं.

जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है सरकार न तो वित्तीय घाटे को कम करने का लक्ष्य हासिल कर सकी है और न कर राजस्व वसूलने का लक्ष्य पूरा कर सकी है.

उस पर आर्थिक विकास दर में लगातार हो रही गिरावट की चुनौती है जो दिसंबर में ख़त्म होने वाली तिमाही में 6.1 प्रतिशत तक जा पहुँची थी. सरकार का कहना है कि औद्योगिक उत्पादन में गिरावट की वजह से विकास दर प्रभावित हो रही है.

इस बीच विदेशी निवेश में भी गिरावट हुई है और निर्यात भी घटा है.

उधर रेलबजट के बाद उपजे विवाद ने साफ़ कर दिया है कि महंगाई झेल रही जनता पर और बोझ लादने की ज़रा भी कोशिश हुई तो ये यूपीए की गठबंधन सरकार के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा.

वित्तीय चुनौतियाँ

यूपीए-2 सरकार का चौथा बजट पेश कर रहे प्रणब मुखर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर वापस लाने की होगी और उन उपायों की तलाश करना जिससे कि वित्तीय घाटा कम करने का लक्ष्य हासिल किया जा सके और कर राजस्व में बढ़ोत्तरी के उपाय ढूँढ़ें जा सकें.

एक ओर उन पर कर राजस्व बढ़ाने का दबाव है दूसरी ओर आयकर में छूट की सीमा बढ़ाने की मांग की जा रही है. संसदीय समिति ने तो इसकी सीमा तीन लाख तक कर देने की सिफ़ारिश की है.

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Image caption औद्योगिक विकास की दर पिछले दिनों धीमी पड़ी है

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार का आर्थिक स्वास्थ्य अभी ऐसा नहीं है कि छूट की सीमा तीन लाख की जा सके.

माना जा रहा है कि वित्तमंत्री प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) के बारे में बजट भाषण के दौरान औपचारिक ऐलान कर सकते हैं, जो 2013-14 से अस्तित्व में आएगा

मुद्रास्फीति की दर हालांकि पिछले कुछ समय में कम हुई है लेकिन उसका बोझ जनता अभी भी महसूस कर रही है. प्रणब मुखर्जी के सामने एक चुनौती ये भी होगी कि वे महंगाई को फिर बढ़ने से किस तरह रोकेंगे.

उन्हें औद्योगिक विकास दर को तेज़ करने के अलावा एक चुनौती कृषि विकास की दर को बरकरार रखना भी है.

राजनीतिक चुनौतियाँ

काले धन की समस्या और कर चोरी से निपटने के लिए प्रणब मुखर्जी को ठोस क़दमों की घोषणा करनी होगी क्योंकि पिछला एक साल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलनों में गुज़रा है और इन आंदोलनों के निशाने पर प्रकारांतर से केंद्र सरकार रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को कई बार आड़े हाथों लिया है.

मल्टीब्रांड एफ़डीआई को लेकर सरकार को एक बार क़दम वापस खींचने पड़े हैं. और इस समय जिस तरह की परिस्थितियाँ नज़र आ रही हैं उससे लगता है कि वित्तमंत्री आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर बचकर ही चलना चाहेंगे.

विनिवेश की लगभग रुकी प्रक्रिया को तेज़ करना भी एक चुनौती है लेकिन हाल ही में ओएनजीसी के पब्लिक इश्यू पर जिस तरह से एलआईसी को सहायता के लिए आगे आना पड़ा उसने सरकार की चुनौती को बढ़ाया ही है.

सरकार संसाधन जुटाने के लिए लक्जरी वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा सकती है लेकिन आम लोगों पर बोझ न बढ़े ये उनकी प्राथमिकता होगी.

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