ब्रिक्स मुद्राओं का इस्तेमाल कितना व्यावहारिक?

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दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन से स्पष्ट है कि विश्व की पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ चाहती हैं कि आपसी व्यापार बढ़े और इसके लिए वे अमरीकी डॉलर की जगह अपनी ही मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहते हैं.

लेकिन ये कितना व्यावहारिक है?

भारत, चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाएँ पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था का 28 प्रतिशत हैं. केवल 12 साल पहले ये आंकड़ा केवल 17 प्रतिशत था.

जहाँ विश्व के अमीर देशों की अर्थव्यवस्थाएँ वित्तीय मंदी की मार झेल रही हैं, वहीं ये उभरती अर्थव्यवस्थाएँ फैल रही हैं और विकास की ओर अग्रसर हैं.

उत्पादक-निर्यातक तय करेंगे मुद्रा

पिछले दस साल में इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर नजर डाले तो चीन 10 प्रतिशत, भारत लगभग आठ प्रतिशत, ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका लगभग चार प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं. लेकिन औसत आमदन देखी जाए तो भारत इन सभी देशों में सबसे पीछे है.

विश्व अर्थव्यवस्था में ये ग्रुप बड़ी ताकत है और इसका आर्थिक लेन-देन अमरीका या यूरोपीय संघ से भी अधिक है.

इस ग्रुप की एक अहम बात यह है कि इन सभी देशों से सामान खरीदने में चीन की अहम भूमिका है. कुछ आंकड़े दिखाते हैं कि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के लिए चीन सबसे बड़ा बाजार है.

जैसे जैसे इन देशों का व्यापार बढ़ता है वैसे-वैसे इनकी मुद्राओं की अंतरराष्ट्रीय भूमिका भी बढ़ेगी.

लेकिन डॉलर या यूरो की जगह जब ये देश अपनी ही मुद्रा में व्यापार करना चाहते हैं तो मूल सवाल ये पैदा होता है कि क्या सामान बनाने वाला, बेचने वाला या निर्यातक खुशी-खुशी भारत के रुपए या रूस के रूबल को स्वीकार करेगा?

यदि वह भारतीय या रूसी होगा तो संभवत: जरूर करेगा. लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि खरीदार के पास ये मुद्रा उपलब्ध होनी चाहिए.

ये असंभव तो नहीं, लेकिन शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाली मुद्राएँ - डॉलर या यूरो - शायद ज्यादा आसानी से उपलब्ध हों.

ये समझना जरूरी है कि अंतत: ब्रिक्स मुद्राओं का वर्तमान से अधिक इस्तेमाल व्यवसायी, निर्यातक और उत्पादक तय करेंगे और वो तब ऐसा करेंगे जब वे पाएँगे कि ऐसा करना ज्यादा आसान है.

ये बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और नई वित्तीय प्रणालियों का भी सूचक होगा.

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