'आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की सही स्थिति'

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Image caption भारतीय निर्माण क्षेत्र में विकास की दर सुस्त पड़ी है.

साल 2008 की वैश्विक मंदी से खुद को बचा ले जाने में सक्षम दुनिया की तेजी से उभरती दो अर्थव्यवस्थाएं - भारत और चीन अब आर्थिक मुश्किलों के दौर में नजर आ रहे हैं.

शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 की पहली तिमाही में दुनियां की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चीन, के आर्थिक विकास दर में लगातार पांचवी बार गिरावट दर्ज की गई.

सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 8.1 फीसद की ये बढ़ोतरी पिछले तीन सालों में सबसे कम है.

इधर भारत में औद्योगिक विकास की दर पहले अनुमानित 6.7 के मुकाबले 4.1 प्रतिशत रही. जनवरी के लिए तो ये मात्र 1.1 फीसद थी.

हालांकि उद्योग जगत का कहना है कि हकीकत में यही आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की सही स्थिति बयान करते हैं और जरूरत इस बात की है कि उन चर्चाओं को रोक दिया जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में बेहतरी का दौर शुरू हो गया है.

भारतीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि इन आंकड़ों का असर अगले सप्ताह जारी होनेवाली मौद्रिक नीति पर पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि सरकार रिजर्व बैंक के साथ मिलकर अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए जरूरी कदम उठाएगी.

प्रणव मुखर्जी के इस बयान से समझा जा रहा है कि रिजर्व बैंक अप्रैल 17 की बैठक के बाद ऋण दर में कटौती कर सकता है.

तब्दीली

चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के एक प्रवक्ता शुंग लेऊन ने कहा, "हमें चीन के आर्थिक विकास में बहुत सारी दिक्कतें नजर आ रही हैं. उदाहरण के तौर पर विकास में क्षेत्रीय असंतुलन, अस्थिरता वगैरह. इसलिए हमें विकास को लेकर पहले जो कदम उठाए हैं उसमें बदलाव करने होंगे. पहले हमने संसाधन के अधिक उपभोग और सस्ती मजदूरों पर बहुत जोर दिया था. उसमें तब्दीली करनी होगी."

विश्व बैंक ने गुरूवार को अपने एक बयान में कहा है कि अगामी माह में चीनी अर्थव्यवस्था की गति और धीमी होगी.

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Image caption चीन ने स्वीकार किया है कि उसे अपनी नीति में बदलाव लाने की जरूरत है.

चीन के लिए बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री आरडो हैनसन ने कहा, "चीन की अर्थव्यवस्था में साल 2012 में क्रमश: धीमापन जारी हेगा क्योंकि मांग में कमी आएगी, निवेश में हो रही कमी को और अधिक महसूस किया जाएगा और बाहर से माल की जो मांग है वो कम रहेगी."

चीन की अर्थव्यवस्था के धीमेपन की वजह अमरीका और यूरोप जैसे बाजारों से माल की मांग में आई कमी है. साथ ही आंतरिक मांग भी नहीं बढ़ पा रही.

विश्व बैंक ने साल 2012 में चीनी अर्थव्यस्था की विकास दर के पहले घोषित किए आंकड़े को घटाकर 8.2 प्रतिशत कर दिया है.

विश्व बैंक ने कहा है कि चीन के निर्यात क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में आया धीमापन और चीन की प्रॉपर्टी बाजार में गिरावट आने वाले दिनों में विकास के लिए खतरा बन सकते हैं.

देश के मुख्य बैंक ने हाल के दिनों में कर्ज मिलने को मंहगा बनाया है ताकि प्रॉपर्टी बाजार और मंहगाई को काबू में रखा जा सके.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि सरकार के निर्णयों का सकारात्मक प्रभाव हुआ है ये जरूरी है कि विकास दर बनाए रखने और मंहगाई को काबू रखने के लक्ष्य में संतुलन कायम किया जाए.

दिक्कतें

उद्योग और वाणिज्य समूह फेडेरेशन ऑफ इंडियन चैमबर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के रिसर्च और इकोनामी सेल के प्रमुख सौम्यकांति घोष का कहना है कि सरकार की हाल में घोषित कई नीतियों ने उद्योग और व्यापार जगत के मनोबल पर भारी प्रभाव डाला है.

सौम्यकांति घोष कहते हैं, "अगर आप वार्षिक बजट पर ध्यान दे तो सरकार ने आबकारी कर में 30 प्रतिशत अधिक उगाही का लक्ष्य रखा है जो जाहिर है निर्माण क्षेत्र से ही आना है, लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं किए हैं. उद्योग जगत सरकार से ठोस नीतियों और रिजर्व बैंक से ब्याज दर में कटौती की घोषणा का बेसब्री से इंतजार कर रहा है."

उनका कहना है कि बजट में कर कानून में लाए गए उस प्रावधान जिसमें किसी केस को 16 सालों बाद भी खोला जा सकता है उद्योग और व्यवसाय जगत के मनोबल पर भारी प्रभाव डाला है.

वो कहते हैं कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए लाए जाने वाले जरूरी कानूनों में हाल के दिनों में जो रोक सी लग गई है उसे जल्द ही दूर किया जाए.

भारतीय उद्योग जगत हाल के दिनों में बार-बार कहा जाता रहा है कि जमीन अधिग्रहण में आ रही दिक्कतों, पर्यावरण नीतियों और सरकार के कई फैसलों - जैसे 2जी, के अदालत के समक्ष होने से निवेश धीमा पड़ रहा है.

मंहगाई की बढ़ी दर के कारण भी ब्याज की दर ऊंची रही थी जिसने जानकारों के मुताबिक उद्योग जगत पर अपना प्रभाव डाला.

देश की सबसे बड़ी प्लेसमेंट एजेंसियों में से एक एबीसी कंसल्टेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शिव अग्रवाल कहते हैं, "पिछले चार से छह महीनों के दौरान कंपनियों में भर्ती की दर पिछले दो सालों के मुकाबले 20 से 25 प्रतिशत धीमी रही है."

"अप्रैल में सामान्यत: कंपनियों में वेतनमान में बढ़ोतरी का समय होता है लेकिन मुझे नहीं लगता ये उसके बहुत अधिक ऊपर जाने की संभावना है. कुछ कंपनियां तो किसी तरह के लाभ न देने की बात भी कह रहे हैं."

असर

जानकारों का मानना है कि दुनियां की इन दो अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती का दौर अगर जारी रहा तो ये विश्व के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं होंगे.

चीन और भारत ने साल 2008 की वैश्विक मंदी से न सिर्फ खुद को काफी हद तक साफ बचा लिया था बल्कि चीन तो हाल के सालों में अमरीका सरकार के बांड खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मदद पहुंचाता रहा है.

रही बात भारत की तो दो साल पहले भारत दौरे के बीच राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि भारत अमरीकी अर्थव्यवस्था की बेहतरी में भारी सहयोग कर सकता है.