2014 में फिर से वैश्विक मंदी का खतरा: बसु

यूरो इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption कर्ज संकट ने यूरोपीय संघ के भीतर संकट पैदा कर दिया है.

अगले दो सालों में विश्व पर फिर से एक बड़ी आर्थिक मंदी का खतरा मंडरा रहा है.

भारतीय प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने कहा है कि यूरोजोन में कर्ज संकट को लेकर पिछले चार सालों में मंदी का जो दूसरा दौर चल रहा है वो एक बार अगले तीन सालों में फिर से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले सकता है.

चार सालों पहले यानी साल 2008 में मंदी ने विश्व भर को अपनी चपेट में ले लिया था, इसके तकरीबन तीन सालों बाद - साल 2011, से विश्व में फिर से मंदी शुरू हो गई है.

कौशिक बसु ने दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट जारी करने के दौरान कहा कि यूरोजोन के कई सदस्य देशों को कर्ज संकट से उबारने के लिए यूरोपीयन सेंट्रल बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जो कर्ज की राशि दी है उसे साल 2014 में वापस किया जाना है.

यूरोजोन मुद्रा का इस्तेमाल करने वाले कई देश जैसे ग्रीस, ऑयरलैंड, पुर्तगाल और दूसरे कई मुल्क कर्ज के संकट से घिर गए हैं. यहां तक की इटली और फ्रांस जैसे मुल्कों की हालत भी बहुत बेहतर नहीं बताई जाती है.

'संकट को टालना'

इन देशों को कर्ज संकट से उबारने के लिए उन्हें यूरोपीय और आर्थिक संस्थाओं ने दिंसबर 2011 और फरवरी 2012 में लगभग 1.3 खरब डॉलर की भारी रकम दो किस्तों में दी है.

आर्थिक सलाहकार ने बयान की व्याख्या करते हुए कहा, 'ये सभी कम अवधि के कर्ज थे जिन्हें तीन साल के बाद से वापस किए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ होनी है. स्थानीय बैंको ने इस फंड के बड़े हिस्से को सरकारी बांड में लगा दिया है. लेकिन यूरोजोन मामले में जिस तरह हस्तक्षेप किया गया है वो मौजूदा संकट को टालने की ही प्रक्रिया है.'

लेकिन दो किस्तों में रिलीज किए गए 1.3 खरब डॉलर की जो रकम दी गई है उसे वापस करने का समय साल 2014 के अंत और 2015 के प्रारंभ में है.

इमेज कॉपीरइट 1
Image caption ग्रीस में कर्ज संकट से उपजे सरकारी खर्च कटौती का भारी विरोध हुआ है.

कौशिक बसु का मानना है कि खतरा ये है कि अगर यूरोप में आर्थिक विकास की गति अगर रफ्तार नहीं पकड़ती है, सुधार की दिशा में कदम नहीं बढ़ते है तो कर्ज वापस करने की अवधि आने के बाद दसूरा संकट फिर से दुनियां को अपनी चपेट में ले लेगा.

भारत

मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार कहते हैं कि यही वो समय होगा जब दुनियां में आर्थिक प्रगति को तेज करने की जिम्मेदारी मुख्यत: एशिया-प्रशांत क्षेत्र के हिस्से उस रूप में आएगी जो अबसे पहले उसपर उस तरीके से नहीं आई थी.

कौशिक बसु कहते हैं, "साल 2015-16 के आसपास से शुरू होने वाले इस दौर में भारत दूसरे के मुकाबले सबसे अहम रोल अदा करेगा."

उनका कहना था कि भारत में पहले से ही एक मजबूत राजनीतिक व्यवस्था मौजूद है, लेकिन फिलहाल जरूरत है कुछ बेहतर नीतिगत फैसलों को लेने का.

दिल्ली में जारी संयुक्त राष्ट्र की संस्था की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि हालांकि विश्व में जारी मंदी के मद्देनजर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर पहले के मुकाबले कम होती रहेगी लेकिन ये दर दुनियां में सबसे अधिक रहेगी और वो क्षेत्र वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के धूरी के तौर पर काम करेगा.

रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि वर्तमान वर्ष में भारत का विकास दर पिछले साल के मुकाबले बढ़कर साढ़े सात प्रतिशत होगा.

पिछले वित्तीय वर्ष में देश में विकास दर 6.9 फीसद रही थी.

संबंधित समाचार