बंगाल में सत्ता तो बदली, निवेश नहीं हुआ

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Image caption टाटा के जाने के बाद वहां खेती भी नहीं हो रही है.

गुस्से से भरे मुनिमोहन बांगल बताते हैं- एक इलेक्ट्रिशियन के रूप में यहां मेरा कोई काम नहीं है, क्योंकि यहां फैक्टरी नहीं है और एक किसान के रूप में भी मेरा कोई काम नहीं हैं, क्योंकि अब मेरे पास जमीन ही नहीं बची है.

पश्चिम बंगाल के सिंगूर के 29 वर्षीय इस किसान के परिवार ने सात बीधा (लगभग 2.5 एकड़) जमीन अपने क्षेत्र की सबसे पहली औद्योगिक परियोजना के लिए दे दिया था.

वहां टाटा मोटर ने अपनी सबसे सस्ती कार नैनो की फैक्टरी लगाई थी और उनकी योजना उस फैक्टरी से हर साल 2,50,000 कार तैयार करने की थी.

शुरुआती पूंजी निवेश के बाद वहां वाहन बनाने वाली और कई छोटी-मोटी फैक्टरियां भी लगी थी, जो कार के लिए सहायक उपकरण तैयार करनेवाली थी.

उस क्षेत्र में लगातार निर्माण का काम हुआ और सैकड़ों ट्रकों से सीमेंट, ईंट और बालू की आवाजाही होने लगी.

लोगों में आशा

इससे उस क्षेत्र के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों को आशा जगी कि उन्हें नौकरी मिलेगी.

उनमें बांगल जैसे कुछ खुशनसीब लोग भी थे जिन्हें काम भी मिल गया और उन्हें ट्रेनिंग दी जाने लगी. उन्हें एक कार की फैक्टरी में बतौर इलेक्ट्रिशियन नौकरी भी मिल गई.

फैक्टरी में नौकरी और पैसे के वायदे के बाद उन्होंने अपनी जमीन खुशी-खुशी बेच दी. लेकिन फैक्टरी सिर्फ दो महीने चली. हिंसक विरोध के बाद टाटा को उस जगह से निकल जाना पड़ा.

पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने 2006 में इस परियोजना के लिए एक हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था.

रूके हैं काम

Image caption नैनो बनाने वाली टाटा को सिंगुर से निकल जाना पड़ा

वहां कार फैक्टरी वाली जगह पर मशीनें तो पड़ी हैं लेकिन उसके आसपास घास उग आए हैं.

दस हजार से अधिक किसानों ने जमीन के बदले हर्जाना लिया था, लेकिन सिर्फ दो हजार लोगों ने हर्जाना लेने से इनकार किया है और वे अपनी जमीन वापस करने की मांग कर रहे हैं.

साल भर पहले ममता बनर्जी ने इतिहास रच दिया जब उन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 साल पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया. उन्होंने घोषणा की थी कि सत्ता में आते ही वह राज्य में आर्थिक सुधार लागू करेंगी.

ममता का वायदा

देश की इस शक्तिशाली राजनेता ने चुनाव प्रचार के दौरान इस बात की घोषणा की थी कि चुनाव जीतते ही वह किसानों को उनकी जमीन वापस कर देंगी. क्षेत्र के किसानों ने उनके उस वायदे पर भरोसा किया और उनके पक्ष में जमकर मतदान किया.

साल भर बीत गए हैं, लेकिन अनेकों ऐसे किसान हैं जो अपनी जमीन वापसी की आस में टकटकी लगाए हुए हैं.

इस बीच टाटा अपनी नैनो की फैक्टरी को वहां से उठाकर गुजरात लेकर चला गया, लेकिन वहां भी जमीन अब कानूनी दाव-पेंच में फंस गया है.

बांगल का कहना है कि वे अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं.

जमीन वापसी नहीं

उनका कहना है, “हमारे पास अब इतनी ही जमीन बची है जिस पर हम अपने परिवार के लिए सब्जी उगा सकते हैं.”

वे आगे बताते हैं, “हमारे लिए कमाई का एक मात्र जरिया यही जमीन थी, जिस पर अब भवन का निर्माण हो गया है, जिसपर अब खेती हो नहीं सकती है. हमने यह जमीन उस वायदे के बाद दी थी जिसमें कहा गया था कि वे मेरे और मेरे परिवार के बच्चों को रोजगार देगें, लेकिन अब तो हमारे पास कुछ रह ही नहीं गया है.”

अब बहुत सी कंपनियों को लगने लगा है कि पूरा पश्चिम बंगाल ही राजनीति रूप से बीमार पड़ गया है.

हिलेरी कोलकाता में

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Image caption हिलेरी क्लिंटन का कोलकाता जाना भी गतिरोध नहीं तोड़ पाया

अभी थोड़े दिन पहले अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन जब भारत आईं थीं तो सबसे पहले वह कोलकाता गईं.

हिलेरी क्लिंटन ने बाद में बताया कि वह खुदरा व्यापार को खोलने में सबसे बड़ी बाधक रही ममता बनर्जी से यह अपील करने आई हैं कि इस क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश होने दें, अब व्यवधान उत्पन्न न करें.

लेकिन ममता बनर्जी ने ऐसा नहीं किया. केंद्र सरकार की प्रमुख सहयोगी रही ममता बनर्जी ने कई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों पर असहमति जताई है जिसमें सुपर मार्केट को भारत में आने की अनुमति न दिया जाना भी शामिल है.

पश्चिम बंगाल में जमीन सबसे बड़ा मसला है.

सरकारी हस्तक्षेप नहीं

ममता बनर्जी सरकार ने घोषणा की है कि वह उद्योग के लिए किसानों के जमीन का अधिग्रहण नहीं करेगी और जिन्हें उद्योग लगाना हो वे सीधे किसानों या जमीन के मालिकों से जमीन खरीदें.

सरकार के इस निर्णय को लोग औद्योगिक विकास में अवरोधक मानते हैं.

राज्य की मुख्य मंत्री ने घोषणा की है कि वह विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के खिलाफ हैं. एसईजेड ऐसी परियोजना है जिससे काफी तेजी से पूंजी निवेश हुआ है और अन्य राज्यों में हजारों रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं.

विप्रो-इंफोसिस भी

इससे देश की दो बड़ी आईटी कंपनियां- इंफोसिस और विप्रो भी प्रभावित हुई हैं क्योंकि वे अपनी परियोजनाएं शुरt नहीं कर पाई है.

वे दोनों कोलकाता के बाहर राजरहाट में अपना कैंपस शुरू करना चाह रहे थे. कंपनियों ने आशा जताई थी कि इससे 30 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा.

चूंकि मुख्यमंत्री ने एसईजेड बनाने को खारिज कर दिया है इसलिए अब ये दोनों परियोजनाएं रूक गई हैं.

नया बिल

हालांकि एक महत्वपूर्ण काम यह हुआ है कि पिछले महीने अप्रैल में सरकार ने राज्य विधानसभा में एक बिल पास करके जमीन से जुड़े कानून को उदार किया है.

पश्चिम बंगाल भूमि सुधार कानून के तहत अब ढाँचागत परियोजनाओं को मंजूरी मिलेगी और उत्पादन करने वाली फैक्टरियों को अपना व्यापार बढ़ाने के लिए जमीन खरीदने की इजाजत होगी.

लेकिन यह पूंजी निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए काफी नहीं है.

बना रहे कूलिंग मशीन

इस बीच पुराने कोलकाता के नजदीक एक फैक्टरी में मजदूरों ने लकड़ी के तख्ते को काटकर कूलर टावर का उपकरण बनाने का काम शुरू कर दिया है क्योंकि इससे गर्मी से राहत मिलती है और इसकी दूसरे उद्योग समूहों में काफी मांग है.

कूलिंग टावर गर्मी को कम करता है और अपने चारों ओर के वातावरण को ठंडा करता है. इसका उपयोग तेल शोधक कारखानों, थर्मल पावर स्टेशनों और अन्य दूसरे एयर कंडिशनिंग इकाइयों में होता है.

इस तरह की फैक्टरियां यहां कई पीढ़ियों से है. इसे उस वक्त लगाया गया था जब पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास का केंद्र था.

उस पहाड़पुर कूलिंग टावर का मुख्यालय कोलकाता में हैं. लेकिन उसकी मांग राज्य में दस फीसदी घट गई है.

उद्योगपति निराश हैं क्योंकि वहां आर्थिक सुधार के हालात नहीं बदल रहे हैं जिससे कि वहां पूंजी निवेश हो.

गौरव स्वरूप का कहना है, “मेरे पिता ने पश्चिम बंगाल में अपनी कंपनी 50 साल पहले शुरु की, जब वह आर्थिक रूप से व्यापार का सबसे प्रमुख केंद्र था, लेकिन आज हालात ये है कि अगर मेरे पास काम करने के लिए पैसे हों तो मैं अपना काम कहीं और जाकर शुरू करना चाहूंगा.”

गौरव स्वरूप का आगे कहना है, “भारत में कई ऐसे राज्य हैं जिसने काफी विकास किया है. अगर पश्चिम बंगाल को अपने राज्य में पूंजी निवेश करवाना है तो उसे अन्य राज्यों में दिए जा रही सुविधाओं से ज्यादा सुविधा देनी पड़ेगी, जिससे पूंजी निवेशक उसकी तरफ आकर्षित हो सके.”

परिवर्तन था नारा

ममता बनर्जी परिवर्तन के नाम पर सत्ता में आई थीं. लेकिन वह अपनी पहले की सरकार के उस कर्ज से परेशान है जो वामपंथी दलों ने तीन दशक तक सत्तासीन रहने के दौरान लिया था.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरा खजाना खाली है. हमारी सरकार का पूरा राजस्व तनख्वाह देने और सूद चुकाने में खर्च हो जाता है जो दो खरब रूपए हैं.’’

लेकिन कोलकाता में सड़कों का रंग रोगन हो रहा है. इसे नीले और उजले रंग में रंगा जा रहा है. यह रंग तृणमुल कांग्रेस का रंग है. पूरे कोलकाता में रवींद्र संगीत को हर ट्रैफिक पर सुनाया जा रहा है.

हुगली नदी के दो किलोमीटर के रास्ते को भी रंग दिया गया है. वहां नए बेंच लगा दिए गए हैं. लोगों को चिंता होने लगी है कि सरकार की प्राथमिकता बदल गई है. क्योंकि राजस्व बढ़ाने के लिए अनेक तरह के सुधार की जरूरत है.

जानकारों का मानना है कि अभी तक जो भी परिवर्तन हुए हैं, निवेश के आसार बढ़ाने के लिए काफी नहीं है.

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