चीनी अर्थव्यवस्था में धीमापन जारी: विश्व बैंक

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Image caption चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है.

विश्व बैंक का कहना है कि चीन में आर्थिक विकास की दर धीमी रहेगी.

चीन में पिछले साल भी विकास दर साल 2010 के 10.4 प्रतिशत से गिरकर 9.2 पर पहुंच गई थी. विश्व बैंक का कहना है कि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में इस वर्ष विकास की दर 8.2 फीसद रहेगी.

बैंक का कहना है कि चीन की अर्थव्यवस्था मुख्यत: निर्यात पर निर्भर है, इसलिए आर्थिक विकास की दर को कायम रखने के लिए सरकारी खर्च को बढ़ाया जाना चाहिए.

अमरीका और यूरोपीय देशों में जारी आर्थिक सुस्ती के कारण चीन के निर्यात में कमी आई है जिसका असर देश के आर्थिक विकास पर पड़ रहा है.

पूर्वी एशिया

बैंक ने एशिया महाद्वीप के विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति की एक अर्ध-वार्षिक समीक्षा में कहा है कि चीनी अर्थव्यवस्था में धीमेपन का झटका पूर्वी एशिया के दूसरे विकासशील देशों में भी महसूस किया जाएगा और जरूरत इस बात की है कि ये मुल्क आंतरिक मांग को बढ़ावा देने की तरफ ध्यान दें.

बैंक ने कहा है कि पूर्वी एशिया क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर 8.2 फीसद से गिरकर 7.6 प्रतिशत हो जाएगी.

इस क्षेत्र के देशों में चीन, दक्षिणी कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया के मुल्कों को शामिल किया जाता है. हालांकि जापान इसका हिस्सा नही माना जाता.

साल की पहली तिमाही में चीन का विकास दर तीन सालों के सबसे नीचे स्तर 8.1 प्रतिशत पर पहुंच गया. इसकी मुख्य वजह निर्यात में आई गिरावट थी. साथ ही मंहगाई को कम करने के लिए अपनाई गई सख़्त मौद्रिक नीति को भी इसकी एक और वजह बताया गया था.

चीन में निर्माण क्षेत्र में भी अप्रैल में गिरावट दर्ज की गई थी.

हालांकि विश्व बैंक ने चीन में संभावित विकास दर को 8.2 प्रतिशत बताया है लेकिन कई दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि ये आठ प्रतिशत के आसपास रहेगा.

संपत्ति बाजार प्रभावित

बैंक का कहना है कि आंतरिक मांग में धीमेपन का असर चीन की संपत्ति बाजार (रियल स्टेट) पर पड़ेगा.

इस बीच हुकुमत ने मौद्रिक क्षेत्र में बैंको को कुछ ढिलाई दी है. सरकार ने विकास के लिए साढ़े सात प्रतिशत का लक्ष्य रखा है.

विश्व बैंक का कहना है कि चीन के पास वो उपाय हैं जिसके जरिए आर्थिक धीमेपन से उबरा जा सकता है लेकिन उसे निर्माण क्षेत्र में भारी निवेश से बचना चाहिए जैसा कि उसने 2008 की मंदी के दौरान किया था.

बैंक का मानना है कि टैक्स दर में कटौती, सामाजिक क्षेत्र में खर्च को बढावा जैसे कदम को प्राथमिकता दिया जाना ज्यादा कारगर होगा.

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