क्यों लगातार पिट रहा है रूपया?

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Image caption रूपये की कीमत में लगातार छटवें दिन भी गिरावट दर्ज की गई.

बुधवार को लगातार छठे दिन डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में गिरावट दर्ज की गई और एक समय वो अपने रिकार्ड स्तर 56 रूपया प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था जिसके बाद खबरों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार में हस्तक्षेप किया. बाजार बंद होने के समय रूपये की कीमत 56.18 थी. मंगलवार को वो 55.46 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. शेयर बाजार में भी उथल पुथल का दौर रहा और बॉम्बे स्टॉक सूचकांक जनवरी के सबसे निचले स्तर 15,928.77 अंक पर बंद हुआ. एनएसई में 0.51 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.

रूपए के मूल्य में जो लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है उसके कुछ स्थानीय और वैश्विक कारण हैं.

सरकारी नीतियों और कई वजहों से उपजी स्थिति की वजह से व्यापार और उद्योग का भरोसा कम होना जिसकी वजह से वो किसी किस्म के जोखिम लेने से बचने की कोशिश करता है, मुद्रा और कमोडिटी के क्षेत्र में वैश्विक ट्रेंड, साथ ही साथ भारत का व्यापार घाटा.

अमरीका की अर्थव्यवस्था में धीमापन और यूरोप में जारी कर्ज संकट की वजह से उद्योग और व्यापार बड़े जोखिम लेने को तैयार नहीं है. साथ ही साथ अमीर देशों के केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति ने कमोडिटी क्षेत्र में कीमतों को बढ़ाया है.

कुछ सामरिक कारणों से कच्चे तेल की कीमतें भी बढ़ी हैं.

भारत में कच्चे तेल की मांग का अस्सी प्रतिशत मांग आयात पर निर्भर है और तेल का अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है.

जब बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका व्यापार घाटा भी उसी अनुपात में ऊपर चला जाता है.

भारत में सोने का आयात भी बड़े पैमाने पर किया जाता है जिसके लिए भी डॉलर की जरूरत होती है.

चूंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उद्योग जोखिम उठाने को तैयार नहीं है इसलिए वर्तमान व्यापार घाटे को कम कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है. इसके कारण रूपए के मूल्य पर भारी दबाव आया है.

ये दिक्कत सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था में नहीं बल्कि कई दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में भी देखने में आईं हैं.

आयात-निर्यात

व्यापार घाटे का अर्थ है आयात की तुलना में निर्यात का कम होना यानी आयात अधिक है और निर्यात कम.

जाहिर है जब आयात अधिक होगा तो डॉलर में पेमेंट होने के कारण देश में डॉलर की कमी होगी. जो अगर निर्यात भी अधिक होता तो पूरी हो जाती क्योंकि भारतीय निर्यातकों को भी पेमेंट डॉलर में ही होते.

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Image caption भारतीय रिजर्व बैंक अप्रवासी भारतीयों के लिए बांड लाने पर विचार कर रहा है.

जब रूपए की कीमत में गिरावट होती है तो आयातकों को माल के लिए अधिक कीमत अदा करनी पड़ती है. यानी कच्चे तेल के लिए अधिक रूपए, उत्पादन में उन चीजों के लिए अधिक पैसे देना जिनका कुछ हिस्सा आयात करना होता है. कोयले के की कीमत अधिक देनी पड़ती है, वगैरह.

अब कोयले की कीमत अधिक देनी पड़ेगी तो जाहिर है कि बिजली की कीमतें बढ़ सकती हैं.

कर्ज संकट

यूरोप में जारी कर्ज संकट का प्रभाव भारत समेत सभी देशों में देखने को मिल रहा है. लोगों का विश्वास कम हुआ है और निवेश के प्रति भावना नकारात्मक है.

इनका असर डॉलर की आमद पर पड़ा है जैसे विदेशी संस्थागत निवेश कम हुआ है. साथ ही साथ विदेशी निवेश भी नीचे जा रहा है.

इसके साथ ही कर्ज संकट से निपटने के लिए यूरोजोन के देशों ने खर्च में जो कटौतियां लागू करने की शुरूआत की हैं उसका असर भारतीय निर्यात पर पड़ा है.

विश्व बैंक ने चीन के विकास दर मे कमी की जो बात की है उसका असर कमोडिटी जैसे कोयला, उद्योग में इस्तेमाल होनेवाली वस्तुओं वगैरह की कीमतों में कमी के तौर पर देखा जाएगा जो रूपए के संभलने में थोड़ी मदद करेगा.

इसका असर ये होगा कि घरेलू उत्पादकों को थोड़ी बेहतर कीमत मिलेगी. साथ ही साथ मंहगाई में भी थोड़ी कमी देखी जा सकती है.

ये व्यापार घाटे को कम करने में भी सहायक होगा.

बाजार में हस्तक्षेप

मुद्रा बाजार में रूपए की गिरती कीमत को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार में डॉलर बेचा है. पिछले कुछ दिनों में कुछ 20 अरब डॉलर बाजार को उपलब्ध करवाया गया.

रिजर्व बैंक ने अप्रवासी भारतीयों को मिलने वाले ब्याज दर में भी ढिलाई दी है ताकि डॉलर की उपलब्धता बढ़ाई जा सके.

कहा जा रहा है कि केंद्रीय बैंक और भी कुछ विकल्पों पर विचार कर रहा है जैसे अप्रवासी भारतीयों के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के माध्यम से विशेष बांड और पेट्रोलियम पदार्थ का निर्यात करने वाली कंपनियों को सीधे डॉलर की सप्लाई किया जाना.

माना जा रहा है कि इससे मुद्रा बाजार में मची उथल-पथल थोड़ी थमेगी.

मेरे हिसाब से सरकार को आर्थिक सुधार की दिशा में कुछ अहम कदम जल्द उठाने चाहिएं ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशकों का भरोसा बहाल हो सके.

सरकार को भूमि अधिग्रहण, खनिज क्षेत्र में नीतियों पर शीघ्र ही फैसला लेना होगा. साथ ही कई ऐसे क्षेत्र है जहां विदेशी निवेशक की भागेदारी के प्रतिशत को लेकर विवाद है उसे भी जल्द हल किया जाना चाहिए.

इससे संस्थागत और विदेशी निवेश फिर से देश में आना शुरू होगा जिससे वर्तमान व्यापार घाटा कम करने में मदद मिलेगी.

(बीबीसी संवाददाता फैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित)

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