बालवधू से करोड़पति व्यापारी

कल्पना सरोज
Image caption कल्पना सरोज आज करोड़ो रुपए की कंपनी की मालिक हैं

भारत की एक दलित महिला जिसने पक्षपात, गरीबी और शोषण से बचने के लिए कभी आत्महत्या करने की कोशिश की थी, आज करोड़ों की कंपनी की सीईओ हैं.

उनकी जिंदगी बॉलीवुड की फिल्म की उस कहानी की तरह है जिसमें बहुत सारी मुश्किलें आती हैं और फिर सुखद अंत.

यह कहानी है कल्पना सरोज की जिसका जन्म गरीब दलित परिवार में हुआ, स्कूल में सताया गया, 12 साल की उम्र में शादी हो गई. उन्होंने पति को छोड़ने के लिए सामाजिक दबावों का सामना किया और फिर अपनी जान देने की कोशिश की.

आज वो करोड़पति हैं. एक कामयाब कंपनी के शिखर पर बैठकर वो जाने माने कारोबारियों से कंधा मिलाती हैं. अपने पेशेवराना अंदाज के लिए इन्हें कई ईनाम मिल चुके हैं.

छोटे गांव से

यह बताते हुए कि उनकी जिंदगी किस हद तक बदली है, 52 वर्षीय कल्पना कहती हैं, ''जब पहली बार मैं मुंबई आई तो मुझे नहीं मालूम था कि मैं कहां जाऊं. मैं एक छोटे से गांव से थी. आज इस शहर की दो सड़कों के नाम मेरी कंपनी के नाम पर रखे गए हैं.''

भारत में छोटी जाति में पैदा होने वाले लोगों को पक्षपात का सामना करना पड़ा है.

वे कहती हैं, ''मेरे बहुत से दोस्तों के अभिभावक मुझे अपने घरों में नहीं घुसने देते थे और मुझे स्कूल की कई गतिविधियों में भाग नहीं लेने दिया जाता था क्योंकि मैं दलित थी. मुझे बहुत गुस्सा आता था. मुझे लगता था कि मैं भी तो इंसान हूं.''

हालांकि उनके पिता ने उन्हें पढ़ने की इजाजत दी लेकिन पारिवारिक दबावों के चलते 12 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई.

झुग्गी में रही

अपने 10 साल बड़े पति के साथ वे मुंबई आ गईं जहां एक झुग्गी में रहने पर उन्हें बहुत बड़ा झटका लगा. लेकिन उनकी जिंदगी में केवल यही मुश्किल चीज नहीं थी.

वे बताती हैं, ''पति के बड़े भाई और भाभी मुझसे बुरा सलूक करते थे. वे मेरे बालों को नोचते थे और पीटते थे, कई बार तो छोटी छोटी बातों को लेकर. मैं इस शारीरिक और मानसिक शोषण से टूट गई थी.''

एक बार जब मिलने के लिए कल्पना के पिता आए तो फटे कपड़े पहनी बेटी की ऐसी हालत देख कर दंग रह गए और उसे घर ले गए.

कल्पना को एक नाकाम औरत मानते हुए गांव में बहुत सारे लोग उसके घर वापस आने पर शक की निगह से देखने लगे.

लेकिन यह सब कुछ नजरअंदाज करते हुए कल्पना ने पैसा कमाने के लिए सिलाई सीखी. लेकिन आर्थिक आजादी के बावजूद उनपर बहुत अधिक दबाव था.

कल्पना ने अपने सबसे कमजोर क्षण के बारे मे बताया, ''एक दिन मैंने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया. मैंने एक कीटनाशक दवा की तीन बोतलें पी लीं.''

लेकिन कल्पना की मुंह में झाग और उसे बुरी तरह से कांपती देख उसकी एक आंटी ने उसे बचा लिया.

इस घटना ने उनका जीवन बदल दिया. वे कहती हैं, ''मैंने फैसला किया कि मैं मरने से पहले जिंदगी में कुछ बड़ा करूंगीं.''

मुंबई वापस

सोलह साल की उम्र में वे एक अंकल के पास वापस मुंबई चली गई और दर्जी का काम करने लगी.

शुरू में उसे एक दिन में 50 रुपए से भी कम मिलते थे लेकिन फिर उसने औद्योगिक सिलाई की मशीन चलानी सीखी जिससे उसके आय में बढ़ोतरी हुई.

लेकिन इतने पैसे से कल्पना की बहन का इलाज नहीं हो सकता था जी बीमार थीं. यह क्षण कल्पना के उद्यमी स्वभाव को परिभाषित करने वाला था.

वे बताती हैं, ''मैं बहुत निराश हुई और मुझे अहसास हुआ कि जिंदगी में पैसा बहुत मायने रखता है और मुझे और कमाने की जरूरत है.''

उन्होंने फर्नीचर का व्यापार करने और सिलाई के काम को बढ़ाने के लिए सरकारी ऋण लिया. उसने दिन में 16 घंटे काम किया जो वो आज तक भी करती हैं.

दोबारा शादी

बाद में कल्पना ने एक व्यापारी से शादी कर ली और उनके दो बच्चे हैं. अपनी पहचान बना चुकी कल्पना को कमानी टयूबस नाम की कंपनी चलाने का मौका मिला जो कर्ज में थी.

लेकिन कल्पना ने नवीनीकरण करते हुए कंपनी की हालत बदल दी. वे कहती हैं, ''मैं यहां काम करने वालों को न्याय दिलाना चाहती थी. मैं कर्मचारियों की स्थिति समझ सकती थी जो अपने परिवार के लिए भोजन जुटाना चाहते थे.'' आज कमानी ट्यूब्स 500 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की एक बढ़ती हुई कंपनी है.

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