अर्थव्यवस्था सुधरने के आसार नहीं: वेणु

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Image caption एक डॉलर के मुकाबले रुपया 55 पर आ सकता है

जिस तरह रॉयटर्स ने जनवरी मार्च के तिमाही में 5.3 प्रतिशत का विकास दर दिखाया है, पिछले दस वर्षो में इतना खराब विकास दर कभी नहीं रहा है. इसकी वजह यह है कि हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था काफी धीमी हो गई है.

अगर हम 2011-12 के विकास दर के आकड़ों को देखें तो पाएगें कि इसके पहले की तिमाही, अप्रैल-मई में यह 8 प्रतिशत था, जो अगले तिमाही में घटकर छह-साढ़े छह फीसदी हो गया था और अब जो आकड़ें आएं हैं, वह बहुत ही खराब है.

इस आकड़े का सीधा सा मतलब यह है कि देश की अर्थव्यवस्था काफी खराब हो गई है. मांग लगातार घट रहा है और स्थिति ऐसी हो गई है लोगों ने बाजार से सामान खरीदना भी बंद कर दिया है.

सर्विस सेक्टर

अर्थशास्त्री ऐसे समय में कहते हैं कि जब मुद्रास्फीति होती है तो विकास और मांग दोनों अपने आप घट जाता है. हमारे देश में यही हो रहा है.

पिछले दो- ढ़ाई साल से जो हमारे देश की आर्थिक स्थिति रही है, इससे आम लोगों में मानसिक रुप से यह दवाब हो गया है कि वे कम खर्च करें, क्योंकि पता नहीं आगे क्या हो. इसे आर्थिक शब्दावली में ‘फुलफीलिंग प्रोफेसी’ कहा जाता है.

मैनुफैक्चरिंग सेक्टर का विकास दर काफी कम है. यह कुल मिलाकर ढ़ाई फीसदी हो गया है. भारतीय अर्थव्यवस्था काफी विचित्र है. आप देखेगें कि हमारे देश में 55 प्रतिशत हिस्सा सर्विस सेक्टर से आता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि हमने दूसरे सेक्टर की तरफ ध्यान नहीं दिया और सारा कुछ सर्विस सेक्टर में लगा दिया. मैनुफैक्चरिंग सेक्टर को हमने विकसित नहीं किया और सर्विस सेक्टर को हमने काफी बड़ा कर दिया है.

माइनिंग सेक्टर

देश में पूंजीनिवेश हो नहीं रहा है, कॉरपोरेट सेक्टर देश में नई पूंजी नहीं लगा रही है.

इसके लिए क्या देश के नियम कायदे को दोषी ठहराया जा सकता है. क्या मान लिया जाय कि भारत में नीतियां ही खराब हैं. मेरा मानना है कि नीतियां तो खराब है ही, इसे ठीक से लागू भी नहीं किया जा रहा है.

अगर पूरानी नीतियों को ही ठीक से लागू किया जाय तो विकास दर बेहतर हो सकता था.

उदाहरण के लिए माइनिंग सेक्टर को लीजिए. इसमें ‘निगेटिव ग्रोथ’ है. ‘ग्रोइंग इकॉनोमी’ में कहीं ऐसा नहीं हो सकता है कि वह घटे. लेकिन अपने यहां हो रहा है.

इसका मतलब यह हुआ कि कोयला और दूसरे मिनरल्स की माइनिंग ही नहीं हो रही है. इसकी भी किसी की जवाबदेही होनी चाहिए. पिछले दो वर्षो से कोयले के खदान नहीं दिए जा रहे हैं. हालांकि भ्रष्टाचार के मसले को इससे हटाया नहीं जाना चाहिए, इसमें भ्रष्टाचार भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

बढ़ सकती है मंहगाई

मुझे डर इस बात का है कि महंगाई और बढ़ सकती है. विकास दर में लगातार कमी हो रही है, लेकिन मुद्रास्फीति बढ़ रही है.

रुपए में गिरावट लगातार जारी है. सरकार ने अभी पेट्रोल की कीमत बढ़ा दी है. इसका परिणाम यह होगा कि आयात करने वाले सामान और भी मंहगें होगें और मुद्रास्फीति और बढ़ेगीं.

मुद्रास्फीति में अगर इसी तरह गिरावट जारी रही तो विकास दर और ज्यादा घट सकती है.

रही बात भारतीय मुद्रा की कीमत में कमी आने की, तो मुझे नहीं लगता है कि 56 रुपए का भाव ज्यादा दिनों तक चलेगा. भारतीय मुद्रा को 55 पर आकर ठहर जाना चाहिए.

बढ सकता है रुपया

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Image caption बढ़ रही मुद्रास्फीति से सामान की कीमतें और बढ़ सकती हैं

रुपए की कीमत गिरने के पीछे मनोविज्ञान कारण भी हैं. अभी लोगों को लगता है कि पता नहीं कल क्या हो, इसलिए इसकी कीमत लगातार कम हो रही है.

देश की अर्थव्यवस्था काफी धीमी हो गई है. पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत के कारण अर्थव्यवस्था में ‘फिजिकल डेफिसिट’ है, सरकार का कर्ज काफी ज्यादा हो गया है, व्यापार का घाटा पेट्रोलियम की खरीददारी के चलते काफी ज्यादा हो गई है.

शेयर बाजार और यूरोपीय मार्केट में आई गिरावट का असर भी हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

भूमंडलीकरण का लाभ 2003-2008 तक उन सभी देशों ने उठाया जो इमर्जिंग इकॉनोमी थी. यह भूमंडलीकरण का खराब दौर चल रहा है.

बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्था घाटे में चल रही है, फाईनेंसियल मार्केट काफी खराब चल रहा है. अमरीका खुद अभी संकट में है. उपर से यूरो संकट शुरु हो गया.

लेकिन हमारी घरेलू आर्थिक हालात जो भी हों, यूरो संकट ने हमारी अर्थव्यवस्था को 50 फीसदी तो प्रभावित किया ही है..

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