शोध और विकास के लिये भारत पर नजर

Image caption रिटेल सेक्टर में भी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अपने शोध कार्य के लिए भारत का रुख कर रही हैं.

अश्विन कंडोई अपनी तकनीकी कंपनी को सॉफ्टवेयर ढाबा कहते हैं. अश्विन और उनके साझेदार अभिजित जूनागड़े ने आठ साल पहले जब विनजित टेक्नोलॉजीज़ को शुरु किया था, तब उनके दिमाग में ढाबे वाली धारणा ही थी.

महाराष्ट्र के नासिक शहर में ये साफ्टवेयर ढाबा महज 200 डॉलर की लागत से शुरु किया गया था. आज इसमें 100 से ज्यादा लोग काम करते हैं और ये 40 मुल्कों में निर्यात भी करता है.

विनजित टेक्नोलॉजीज़ के मूल में एक छोटी सी शोध और विकास प्रयोगशाला है जहां गेम्स जैसे साधारण उत्पादों से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए 'कस्टम-मेड प्रोग्राम' तक तैयार किये जाते हैं.

ई-मैनेजमेंट टूल इस कंपनी की बड़ी सफलताओं में से एक है. ये एक अंतर-सरकारी संगठन के कर्मचारियों के लिये तैयार किया गया है ताकि वे आपदा राहत कार्यों के दौरान दान की राशि सही तरीके से खर्च कर सकें.

बदलाव का प्रतिनिधित्व

इस टूल की लागत ऐसे ही दूसरे प्रोग्राम के मुकाबले बहुत कम है और इसका इस्तेमाल लगभग पूरी दुनिया में हो रहा है. 'डिजास्टर रिस्क रिडक्शन' नाम की इस तकनीक का इस्तेमाल संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में हो रहा है.

विनजित टेक्नोलॉजीज़ ने 'आई-विनजित' नामक अपने एक उत्पाद के पेटेंट के लिए हाल ही में आवेदन किया है. इसकी खासियत ये है कि इसकी मदद से टैबलेट कम्प्यूटर चीजों की पहचान करता है.

Image caption गूगल के इंजीनियरों की टीम भी बैंगलूर और हैदराबाद में मौजूद है.

जैसे एक हाथी का खिलौना है जो स्क्रीन पर है. 'आई-विनजित' इसकी पहचान करके इससे संबंधित सूचना, ध्वनि और दृश्यों को दिखाता है. ये फर्म उस बदलाव का प्रतिनिधित्व कर रही है जो भारत में हो रहा है.

गैराज के भी कम जगह वाले कार्यालयों या प्रयोगशालाओं में इस तरह की कंपनियां आधुनिक शोध पर काम कर रही हैं और रोमांचित करने वाले नए उत्पाद विकसित कर रही हैं.

बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश में शोध और विकास की गतिविधियों को बढ़ावा दे रही हैं जो सालाना 9.3 अरब डॉलर के उद्योग में बदल चुका है. इसमें सालाना 23 प्रतिशत की बढोत्तरी हो रही है.

ज़िन्नोव मैनेजमेंट कन्सलटेंसी के अध्ययन के मुताबिक, शोध और विकास गतिविधियों से जुड़ी दुनिया की ज्यादातर बड़ी कंपनियों के केंद्र भारत में हैं.

बिज़नेस सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ सैप लैब्स, भारत को ठिकाना बनाने वाली शुरुआती बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक है. कंपनी ने वर्ष 1998 में बैंगलोर में अपना सेंटर खोला. यहां शोध होते हैं और सॉफ्टवेयर भी विकसित किए जाते हैं.

सैप के ग्लोबल हेड क्लास न्यूमेन कहते हैं कि कंपनी भारत को इनोवेशन-इंजन के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. कंपनी का भारत में कारोबार भी बढ़ रहा है. सैप के अलावा माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, सिस्को, ओरेकल, एडोब और इंटेल जैसी कंपनियों के भी सेंटर हैं.

चीन की टेलीकॉम कंपनी हुआवेई ने भी भारत में बीते दस वर्षों में 40 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश किया है.

फार्मविले और माफिए वॉर्स जैसे लोकप्रिय ऑनलाइन गेम्स बनाने वाली कंपनी जिंगा ने भी बैंगलोर में अपना सेंटर खोला है जहां 200 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं.

वहीं गूगल के इंजीनियरों की टीम भी बैंगलोर और हैदराबाद में मौजूद है जो गूगल ड्राइव का काम देखती है जिसे कंपनी ने हाल ही में शुरु किया है.

रिटेल सेक्टर पर भी नजर

रिटेल सेक्टर में भी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अपने शोध कार्य के लिए भारत का रुख कर रही हैं.

टेल्को हिंदुस्तान सर्विस सेंटर ऐसी एक जगह है जहां हजारों भारतीय इंजीनियर और अन्य कर्मचारी काम कर रहे हैं.

उनके काम में प्रॉप्रटी डिजाइन से लेकर मोबिलिटी सॉल्यूशंस तक सब कुछ शामिल है.

फॉर्मास्यूटिकल्स ऐसा ही एक दूसरा क्षेत्र हैं जहां शोध और विकास कार्य के लिए दुनियाभर की कंपनियां भारत आ रही हैं.

अप्रैल में ही भारत की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी रेनबैक्सी लेबोरेटरीज़ ने मलेरिया के उपचार के लिये सिनरियाम नामक दवा पेश की थी जिसे कंपनी ने भारत की पहली सबसे सस्ती दवा बताया है.

लेकिन आचोलकों का कहना है कि भारत में नयी दवाओं की खोज कम होती है और दवाओं का परीक्षण कार्य ज्यादा होता है.

इसकी एक वजह ये है कि शोध के लिए 'पब्लिक फंडिंग' अभी भी बहुत कम है.

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