क्या भारत उबार पाएगा दुनिया को मंदी से?

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ये स्पष्ट है कि विश्व अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है.

वैश्विक वित्तीय संकट के बाद जर्मनी, चीन और ब्राज़ील जैसी अर्थव्यवस्थाओं के दम पर विश्व अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा था लेकिन ताज़ा संकेतों से पता लग रहा है कि अब ये भी धीमी पड़ रही हैं.

विश्व बैंक को उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा और विश्व विकास दर 2.5 फीसदी रहेगी. लेकिन इसमें भी विकसित और विकासशील देशों में अंतर साफ़ है. जहां विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में 5.3 फीसदी विकास का पूर्वानुमान है, वहीं विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास दर केवल 1.4 फीसदी रहेगी.

ऐसे में अर्थशास्त्री हालात में सुधार के लिए दुनिया की किन अर्थव्यवस्थाओं की ओर देखें? चलिए दुनिया की मुख्य अर्थव्यवस्थाओं के हालात और उनकी संभावनाओं पर डालते हैं एक नज़र.

भारत

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Image caption एशियन डेवलपमेंट बैंक के मुताबिक इस वर्ष भारत का सकल घरेलू उत्पाद के 6.5 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है.

इस साल जनवरी से मार्च के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था 5.3 फीसदी की सालाना दर से बढ़ी जो कि पिछले नौ सालों में सबसे धीमी बढ़ोत्तरी थी.

पिछले दो सालों में बढ़ती महंगाई भारतीय नीतिनिर्धारकों की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक रही है. बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए रिज़र्व बैंक ने कई कदम भी उठाए. इनमें से एक कदम मार्च 2010 के बाद से 13 बार ब्याज दरें बढ़ाना था.

इससे हाल के महीनों में मंहगाई दर कुछ कम तो हुई है लेकिन ये अब भी बाकी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं ज़्यादा है.

पिछले हफ़्ते जारी हुए आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष मई की तुलना में इस वर्ष मई में थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 7.55 फीसदी हो गया जो कि ब्रिक समूह के देशों में सबसे ज़्यादा है.

थोक मूल्य सूचकांक मंहगाई मापने का मुख्य पैमाना है.

विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंची महंगाई दर और धीमी होती अर्थव्यवस्था की वजह से रिज़र्व बैंक के लिए अपनी नीतियां बनाना मुश्किल हो गया है क्योंकि ब्याज़ दर घटाने से विकास तो बढ़ेगा लेकिन साथ ही इससे महंगाई और भी बढ़ सकती है.

एशियन डेवलपमेंट बैंक के मुताबिक इस वर्ष भारत का सकल घरेलू उत्पाद के 6.5 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है. भारतीय सरकार की कोशिश ज़्यादा विदेशी निवेश जुटाने, बुनियादी ढाँचे और बिजली परियोजनाओं में तेज़ी लाने की है.

चीन

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Image caption चीन ने इस वर्ष सालाना विकास दर घटाकर 7.5 फीसदी कर दी है जो 2004 के बाद पहला मौका है जब उसकी विकास दर 8 फीसदी से कम रही हो.

चीन में दूसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी, आंकड़े निरंतर मंदी की ओर इशारा करते हैं. इस दौरान जीडीपी दर कम होकर 7.6 फीसदी हो गई जबकि एक दशक में पहली बार सालाना विकास दर गिरकर 8 फीसदी से कम हो गई.

चीन, बरबेरी, कैरेफोर और बीएमडब्ल्यू जैसी कई बड़ी कंपनियों के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है और इसमें मंदी से इन कंपनियों के मुनाफ़े के लिए बुरी ख़बर है.

चीन और भारत में धीमी होती विकास दर का मतलब है कि थाईलैंड और फिलीपींस जैसे एक या दो देशों को छोड़कर ये मंदी एशिया क्षेत्र में भी आएगी.

चीन ने इस वर्ष मार्च में सालाना विकास दर घटाकर 7.5 फीसदी की. वर्ष 2004 के बाद ये पहला मौका है जब चीन की विकास दर 8 फीसदी से कम रही हो.

विकास की गति बढ़ाने के लिए चीन के केंद्रीय बैंक ने भी एक महीने से कम समय में ब्याज़ दरों में दो बार कटौती की है.

अब तक प्रॉपर्टी बाज़ार में तेज़ी और सरकारी खर्चे के दम पर चीन की अर्थव्यवस्था तेज़ी से विकास कर रही थी. लेकिन अब गोदामों में जमा हो रहे उत्पादों की वजह से उसका कर्ज़ बढ़ रहा है.

लेकिन विश्लेषकों को उम्मीद है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में ये मंदी के अंतिम संकेत हैं और तीसरी तिमाही में वित्तीय नीतियों में ढील देने से चीन में विकास की गति तेज़ होगी.

यूरोज़ोन

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Image caption दो सालों में पहली बार यूरो मुद्रा डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है.

यूरोज़ोन देशों में एक तरफ़ जर्मनी, हॉलैंड, फिनलैंड और कुछ हद तक फ्रांस जैसे अमीर देश हैं तो दूसरी तरफ़ ग्रीस, इटली, पुर्तगाल और स्पेन जैसी कमज़ोर पड़ती अर्थव्यवस्थाएं. इस अंतर की वजह से वहां एक के बाद एक संकट पैदा हो रहे हैं.

साथ ही इन दो गुटों में इस संकट से निपटने के तरीके को लेकर भी विरोध है.

कमज़ोर आंकड़ों और यूरोज़ोन संकट से निपटने की योजनाओं की वजह से निवेशक परेशान हैं और इसी वजह से दो सालों में पहली बार यूरो मुद्रा डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है.

और अब श्रम बाज़ार में भी मंदी दिखाई दे रही है, बेरोज़गारी दर लगातार तीन महीनों से बढ़ रही है और चीन की निर्यात दर भी सिर्फ़ 6 फीसदी रह गई है.

अमरीका

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Image caption अमरीकी अर्थव्यवस्था में जून के महीने में सिर्फ़ 80,000 नई नौकरियां जुड़ीं जो श्रम बाज़ार में जारी कमज़ोरी की ओर इशारा करता है

अमरीकी अर्थव्यवस्था में जून के महीने में सिर्फ़ 80,000 नई नौकरियां जुड़ीं जो श्रम बाज़ार में जारी कमज़ोरी की ओर इशारा करता है और राष्ट्रपति ओबामा के फिर से चुने जाने में ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा साबित हो सकता है.

यूरोपीय देशों की ही तरह अमरीका भी कर्ज़ से जूझ रहा है जो उसके सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 70 फीसदी है. साथ ही उसे अगले साल से बढ़ते टैक्स और खर्चों में कटौती से भी जूझना है.

और यूरोप की ही तरह अमरीका के दोनों राजनीतिक दल- रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, इस स्थिति से निपटने के लिए एक योजना पर सहमति नहीं बना पा रहे.

हालांकि अमरीकी कारोबारी वॉरन बफ़े का कहना है कि अब भी अमरीका, दुनिया की किसी और बड़ी अर्थव्यवस्था से बेहतर स्थिति में है.

साथ ही अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए अमरीकी सरकार ने कई गैर-पारंपरिक तरीके अपनाए हैं जिनमें कर्ज़े और ब्याज़ दरों को घटाने के लिए बॉन्ड खरीदने का कार्यक्रम शामिल है.

ब्राज़ील

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Image caption दुनिया की छठी सबसे बड़ी और लातिनी अमरीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, ब्राज़ील, में विकास अब धीमा हो गया है.

वर्ष 2010 में 7.5 फीसदी विकास दर दर्ज करने वाली दुनिया की छठी सबसे बड़ी और लातिनी अमरीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ब्राज़ील में विकास अब धीमा हो गया है.

मई में खुदरा बिक्री में अनपेक्षित गिरावट से अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया. पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद केवल 0.2 प्रतिशत ही बढ़ा. ये लगातार तीसरी तिमाही है जब ब्राज़ील का जीडीपी लगभग शून्य फीसदी रहा.

यहां तक कि मई में ऐसे कर्ज़ों की संख्या सबसे ज़्यादा रही जो तय समय सीमा तक नहीं चुकाए जा सके.

इन सब कारणों से बैंकों ने कर्ज़ें कम कर दिए हैं और ब्राज़ील के केंद्रीय बैंक ने लगातार आठवीं बार ब्याज़ दर घटाकर जुलाई में आठ फीसदी कर दी.

जापान

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Image caption बैंक ऑफ़ जापान के अनुसार पिछले साल की प्राकृतिक आपदाओं के बाद पुर्नवास-संबंधी मांग स्थिर रहने की वजह से जापान में आर्थिक गतिविधियां तेज़ हो रही हैं.

किसी समय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा जापान अब तक पिछले वर्ष आई सुनामी और परमाणु संकट से उबर रहा है.

ताज़ा आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया के शीर्ष निर्यातकों में से एक, जापान, अब पहले जितना निर्यात नहीं कर रहा है. उल्टे, जापान बड़े पैमाने पर आयात कर रहा है जिनमें परमाणु रिएक्टरों के बंद होने के बाद बिजली का आयात शामिल है.

साथ ही डॉलर के मुकाबले येन की मज़बूती से भी निर्यातकों को नुकसान हुआ है क्योंकि इससे उनके उत्पाद विदेशी खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत महंगे हो गए हैं.

लेकिन जापान में हालात सुधर रहे हैं. बैंक ऑफ़ जापान के पूर्वानुमानों के अनुसार इस वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था 2.2 फीसदी और अगले साल 1.7 फीसदी की दर से बढ़ेगी.

बैंक के मुताबिक, "पिछले साल की प्राकृतिक आपदाओं के बाद पुर्नवास-संबंधी मांग स्थिर रहने की वजह से जापान में आर्थिक गतिविधियां तेज़ हो रही हैं. लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब भी अनिश्चितता है."

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